ओडिशा की पारंपरिक बुनाई को मिला फैशन का मंच, टाइम्स फैशन वीक में 14 महिला बुनकरों ने बिखेरा हुनर
सुदाम बाबू स्टेट ब्यूरो ओडिशा
हिट एंड हॉट न्यूज़
भुवनेश्वर, 11 अक्टूबर 2026। ओडिशा की समृद्ध हथकरघा परंपरा, पारंपरिक हस्तशिल्प और ग्रामीण कारीगरों की कलात्मक प्रतिभा को व्यापक पहचान दिलाने के उद्देश्य से ओडिशा रूरल डेवलपमेंट एंड मार्केटिंग सोसाइटी (ORMAS) ने भुवनेश्वर टाइम्स फैशन वीक 2026 में विशेष भागीदारी की। इस आयोजन में राज्य की पारंपरिक बुनाई और हस्तशिल्प को आधुनिक फैशन के साथ प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम ने स्थानीय उत्पादों को नए ग्राहकों तक पहुंचाने और ग्रामीण महिलाओं को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया।

10 और 11 अक्टूबर को भुवनेश्वर के मेफेयर सैंक्चुअरी में आयोजित दो दिवसीय फैशन कार्यक्रम में ORMAS ने सह-प्रमुख भागीदार के रूप में हिस्सा लिया। इस मंच पर ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक वस्त्र निर्माण की बारीकियों और स्थानीय हस्तशिल्प की विविधता को दर्शाया गया। आयोजन का उद्देश्य केवल फैशन का प्रदर्शन करना नहीं था, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बुनकरों और शिल्पकारों के उत्पादों को बड़े बाजारों से जोड़ने की संभावनाएं भी तलाशना था।
पारंपरिक साड़ियों और हस्तशिल्प ने खींचा ध्यान
फैशन वीक के दौरान लगभग 40 मॉडल रैंप पर उतरे। इनमें ओलिवुड अभिनेत्री संगीता शिवानी भी शामिल रहीं। मॉडलों ने ORMAS द्वारा प्रोत्साहित विभिन्न पारंपरिक वस्त्र संग्रहों को प्रदर्शित किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से ओडिशा की स्थानीय कलाओं को आधुनिक परिधान शैली के साथ जोड़कर पेश किया गया।
कार्यक्रम में संबलपुरी रेशमी साड़ियों, कटक की खंडुआ सिल्क साड़ियों, मणिआबंधा साड़ियों और पट्टचित्र कला से सजी रेशमी साड़ियों को प्रमुखता मिली। इसके साथ ही जीआई टैग प्राप्त कोटपद हथकरघा उत्पादों, ढलापथर की पारंपरिक बुनाई, ढोकरा शिल्प और कपड़े से तैयार आभूषणों को भी प्रदर्शित किया गया।
इन उत्पादों की विशेषता उनकी पारंपरिक निर्माण तकनीक, विशिष्ट डिजाइन और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान है। प्रत्येक क्षेत्र की बुनाई और हस्तकला अपनी अलग शैली के लिए जानी जाती है। ऐसे में फैशन वीक जैसे आयोजनों के माध्यम से इन उत्पादों को उन लोगों तक पहुंचाया जा सकता है, जो पारंपरिक वस्त्रों को आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहते हैं।
प्रदर्शनी में केंद्र सरकार की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) पहल के अंतर्गत आने वाले उत्पादों को भी स्थान दिया गया। इससे स्थानीय स्तर पर तैयार वस्तुओं की पहचान बढ़ाने और क्षेत्रीय उत्पादों के व्यावसायिक अवसरों को प्रोत्साहित करने का संदेश सामने आया।
14 महिला बुनकरों ने खुद प्रदर्शित की अपनी कला
इस आयोजन का सबसे उल्लेखनीय पक्ष खुर्दा और कटक जिलों की 14 महिला बुनकरों की भागीदारी रही। इन महिलाओं ने अपने हाथों से तैयार किए गए पारंपरिक हथकरघा परिधानों को पहनकर रैंप पर प्रस्तुति दी। उन्हें पेशेवर मॉडलों के साथ एक ही मंच साझा करने का अवसर मिला।
आमतौर पर बुनकरों की पहचान उनके बनाए गए कपड़ों और साड़ियों तक सीमित रह जाती है। वे लंबे समय तक मेहनत करके सुंदर वस्त्र तैयार करते हैं, लेकिन कई बार उनके पास अपने उत्पादों को सीधे बड़े उपभोक्ता वर्ग के सामने प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर नहीं होते। इस कार्यक्रम ने इस अंतर को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल प्रस्तुत की।
महिला बुनकरों ने अपने पारंपरिक परिधानों के माध्यम से यह दिखाया कि स्थानीय कारीगरी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पीछे पीढ़ियों से विकसित ज्ञान, अनुभव और रचनात्मकता भी मौजूद है। उनके रैंप पर उतरने से उन कारीगरों को भी पहचान मिली, जिनकी मेहनत से ओडिशा की हथकरघा परंपरा आज तक जीवित है।
इस तरह की भागीदारी महिलाओं के आत्मविश्वास को मजबूत करने, उनके काम को सार्वजनिक पहचान दिलाने और भविष्य में व्यावसायिक संपर्क विकसित करने में सहायक हो सकती है। हालांकि, इन अवसरों का स्थायी लाभ तभी मिलेगा, जब बुनकरों को नियमित ऑर्डर, उचित पारिश्रमिक और अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार भी उपलब्ध हों।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की संभावना
ओडिशा के कई ग्रामीण परिवारों की आजीविका हथकरघा और हस्तशिल्प से जुड़ी है। बुनाई, रंगाई, कपड़ों की सजावट और पारंपरिक आभूषण तैयार करने जैसे कार्य स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करते हैं। इन गतिविधियों से जुड़े कारीगर अपनी पारंपरिक विशेषज्ञता के माध्यम से बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करते हैं।
हालांकि, छोटे उत्पादकों के सामने बाजार तक पहुंच, प्रचार-प्रसार, ग्राहकों से सीधा संपर्क और उत्पादों की बिक्री जैसी चुनौतियां भी रहती हैं। फैशन वीक जैसे आयोजनों में भागीदारी से इन चुनौतियों को कम करने की संभावनाएं पैदा होती हैं।
जब किसी पारंपरिक उत्पाद को फैशन मंच पर प्रदर्शित किया जाता है, तो उसे नए ग्राहक समूहों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। डिजाइनर, व्यापारी, फैशन में रुचि रखने वाले लोग और संभावित खरीदार ऐसे उत्पादों के बारे में जान सकते हैं। इससे स्थानीय शिल्प के प्रति रुचि बढ़ने के साथ भविष्य में बिक्री के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।
ORMAS की इस पहल को ग्रामीण उत्पादकों और शहरी बाजार के बीच संपर्क मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। यदि ऐसे कार्यक्रमों के साथ डिजिटल बिक्री, नियमित प्रदर्शनियों और विपणन सहायता को भी जोड़ा जाए, तो बुनकरों को लंबे समय तक लाभ मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
दो कियोस्क के जरिए उत्पादों की बिक्री
फैशन वीक के आयोजन स्थल पर ORMAS की ओर से दो कियोस्क भी स्थापित किए गए। यहां राज्य के बुनकरों और हस्तशिल्पकारों द्वारा तैयार वस्तुओं को प्रदर्शित करने के साथ बिक्री की व्यवस्था की गई।
आगंतुकों को विभिन्न प्रकार की साड़ियों, पारंपरिक वस्त्रों और हस्तनिर्मित उत्पादों को करीब से देखने तथा खरीदने का अवसर मिला। इन कियोस्क के माध्यम से ग्राहकों को उत्पादों की डिजाइन और कारीगरी समझने का मौका मिला, वहीं स्थानीय उत्पादकों के लिए अपने सामान को सीधे उपभोक्ताओं के सामने प्रस्तुत करने का रास्ता खुला।
फैशन शो और बिक्री केंद्रों का एक साथ होना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि रैंप पर किसी उत्पाद को देखकर आकर्षित होने वाले दर्शक उसे खरीद भी सकते हैं। इस प्रकार प्रचार और बिक्री के बीच सीधा संबंध स्थापित किया जा सकता है।
हालांकि, किसी एक आयोजन में मिली प्रतिक्रिया को स्थायी व्यावसायिक सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। वास्तविक प्रभाव का आकलन बिक्री, दोबारा मिलने वाले ऑर्डर और कारीगरों की आय में होने वाले बदलावों के आधार पर किया जाना चाहिए।
सुबर्णश्री और सुभद्रा शक्ति बाजार में भी मिलेंगे उत्पाद
फैशन वीक में प्रदर्शित संग्रहों को आयोजन समाप्त होने के बाद भी ग्राहकों के लिए उपलब्ध कराने की योजना बताई गई है। इन उत्पादों की खरीद ORMAS के खुदरा बिक्री केंद्र सुबर्णश्री और सुभद्रा शक्ति बाजार के माध्यम से की जा सकेगी।
इस व्यवस्था से उन ग्राहकों को भी पारंपरिक उत्पाद खरीदने का अवसर मिलेगा, जो फैशन वीक में शामिल नहीं हो सके। साथ ही, कारीगरों की कला को केवल दो दिनों के कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय उसे नियमित बाजार से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
पारंपरिक उत्पादों की बिक्री के लिए स्थायी विपणन व्यवस्था जरूरी है। यदि ग्राहकों को अलग-अलग स्थानों पर इन वस्तुओं की उपलब्धता की जानकारी मिलती रहे, तो वे अपनी पसंद के अनुसार उत्पाद चुन सकते हैं। इससे स्थानीय बुनकरों और शिल्पकारों के लिए बाजार में निरंतर उपस्थिति बनाए रखने की संभावना बढ़ेगी।
मंत्री ने बताया विरासत और आजीविका के लिए महत्वपूर्ण पहल
ओडिशा के ग्रामीण विकास, पंचायती राज एवं पेयजल मंत्री रबी नारायण नायक ने इस तरह के आयोजनों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर बुनकरों और शिल्पकारों को नए बाजारों तथा ग्राहकों से जोड़ते हैं। इसके साथ ही राज्य की समृद्ध हस्तकला विरासत को संरक्षित करने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने में सहायता मिलती है।
मंत्री के इस वक्तव्य का मुख्य संदेश यह है कि पारंपरिक कला का संरक्षण केवल सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का विषय नहीं है। यह उन लोगों की आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है, जिनकी मेहनत से ये कलाएं आगे बढ़ रही हैं।
यदि कारीगरों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिले और उन्हें बाजार में अपनी पहचान बनाने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों, तो नई पीढ़ी के बीच भी पारंपरिक व्यवसायों के प्रति रुचि बनी रह सकती है। इससे सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण रोजगार, दोनों को लाभ पहुंचने की संभावना है।
आधुनिक फैशन के साथ आगे बढ़ेगी पारंपरिक कला
भुवनेश्वर टाइम्स फैशन वीक 2026 में ORMAS की भागीदारी ने ओडिशा के पारंपरिक वस्त्रों और हस्तशिल्प को आधुनिक फैशन के संदर्भ में प्रस्तुत करने का अवसर दिया। संबलपुरी और खंडुआ सिल्क से लेकर कोटपद हथकरघा, ढोकरा शिल्प और पारंपरिक आभूषणों तक, इस आयोजन ने राज्य की कलात्मक विविधता को सामने रखा।
खुर्दा और कटक की 14 महिला बुनकरों की सहभागिता ने कार्यक्रम को एक विशेष सामाजिक महत्व भी दिया। इससे यह संदेश सामने आया कि फैशन उद्योग में कारीगरों की भागीदारी केवल पर्दे के पीछे उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी कला का प्रतिनिधित्व करने और उसके लिए पहचान हासिल करने का अवसर भी मिलना चाहिए।
अब इस पहल की सफलता इस बात से भी आंकी जाएगी कि आयोजन के बाद उत्पादों की बिक्री कितनी बढ़ती है, बुनकरों को कितने नए ग्राहक मिलते हैं और उनकी आजीविका पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
ओडिशा की पारंपरिक बुनाई में संस्कृति, कौशल और स्थानीय पहचान का अनूठा मेल दिखाई देता है। यदि फैशन मंचों, खुदरा बिक्री केंद्रों और आधुनिक विपणन माध्यमों के जरिए इसे लगातार प्रोत्साहन मिलता रहा, तो राज्य की यह विरासत नए उपभोक्ताओं तक पहुंचने के साथ ग्रामीण कारीगरों के लिए रोजगार और आर्थिक अवसरों का मजबूत आधार भी बन सकती है।