सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड में DGP नियुक्ति नियम पर उठाए सवाल, छह महीने से कम सेवा वाले अधिकारियों की पात्रता पर जताई आपत्ति

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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर 2026। झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति से जुड़े नियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने उस प्रावधान की वैधता पर चिंता जताई है, जिसके तहत किसी ऐसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी राज्य के DGP पद के लिए विचार योग्य माना जा सकता है, जिसकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से कम समय बाकी हो। अदालत का प्रथम दृष्टया मानना है कि यह व्यवस्था प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की भावना से टकराती दिखाई देती है।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन शामिल हैं, ने मामले की सुनवाई करते हुए झारखंड सरकार के नियम पर स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यों द्वारा बनाए गए नियम सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों को कमजोर नहीं कर सकते, जिनका उद्देश्य पुलिस प्रमुख की नियुक्ति में पारदर्शिता, स्थिरता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।

छह महीने से कम सेवा वाले अधिकारी को DGP पद के लिए पात्रता पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा झारखंड के उस नियम से जुड़ा है, जिसमें DGP पद के लिए अधिकारी की शेष सेवा अवधि को लेकर अलग व्यवस्था की गई है। अदालत के समक्ष यह सवाल आया कि क्या ऐसा अधिकारी, जिसकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से भी कम समय बचा हो, राज्य के पुलिस प्रमुख के पद के लिए नियुक्ति का पात्र हो सकता है।

पीठ ने प्रथम दृष्टया संकेत दिया कि इस प्रकार की व्यवस्था प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुरूप नहीं दिखाई देती। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पुलिस सुधारों से जुड़े इस ऐतिहासिक मामले में DGP की नियुक्ति और कार्यकाल को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए थे।

अदालत का कहना है कि यदि किसी राज्य का नियम उन सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है, जो पुलिस प्रमुख की नियुक्ति और कार्यकाल में स्थिरता के लिए बनाए गए हैं, तो ऐसे प्रावधान को कायम रखना मुश्किल हो सकता है।

झारखंड के DGP की नियुक्ति भी मामले के केंद्र में

इस मामले का असर झारखंड की मौजूदा DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नोटिस जारी किया है, क्योंकि यदि अदालत संबंधित नियम को अमान्य घोषित करती है तो इसका सीधा प्रभाव उनकी नियुक्ति पर पड़ने की संभावना है।

पीठ ने सुनवाई के दौरान इस पहलू को भी ध्यान में रखा कि नियुक्ति के बाद किसी अधिकारी के पक्ष में अधिकार की स्थिति बन चुकी है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि नियम को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है तो मौजूदा नियुक्ति पर उसके परिणाम सामने आ सकते हैं। दूसरी ओर, अदालत भविष्य के लिए नियम में बदलाव का रास्ता भी अपना सकती है, ताकि पहले से की गई नियुक्तियों पर अनावश्यक असर न पड़े।

इसलिए मामले में केवल नियम की वैधता ही नहीं, बल्कि उसके संभावित प्रभावों को लेकर भी न्यायिक संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है।

केंद्र सरकार ने नियम को दी चुनौती

यह मामला केंद्र सरकार की ओर से दायर आवेदन के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। केंद्र ने Selection and Appointment of Director General and Inspector General of Police, Jharkhand (Head of Police Force) Regulations, 2025 को चुनौती दी है। इसके साथ ही इन नियमों के आधार पर की गई DGP नियुक्तियों को भी चुनौती के दायरे में रखा गया है।

केंद्र का मूल तर्क यह है कि राज्य के नियम सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। यदि कोई राज्य ऐसा प्रावधान बनाता है जो शीर्ष अदालत के निर्देशों के विपरीत जाता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

झारखंड सरकार ने नियम पर पुनर्विचार की इच्छा जताई

सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि राज्य सरकार को नियम पर दोबारा विचार करने में आपत्ति नहीं है। हालांकि उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि केंद्र सरकार ने विशेष रूप से झारखंड के नियम को चुनौती क्यों दी, जबकि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हो सकती हैं।

यह तर्क मामले को व्यापक संदर्भ देता है। यदि किसी एक राज्य के नियम पर सवाल उठाया जाता है, तो भविष्य में दूसरे राज्यों में लागू समान प्रावधानों की भी समीक्षा का रास्ता खुल सकता है। इसी कारण अदालत के सामने केवल झारखंड का मुद्दा नहीं, बल्कि देशभर में DGP नियुक्ति से संबंधित नियमों की एकरूपता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को सर्वोपरि बताया

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र उन राज्य कानूनों और नियमों का विरोध करेगा, जो प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के विपरीत होंगे। उन्होंने यह रुख राजनीतिक दल या राज्य में सत्ता में मौजूद सरकार से अलग रखते हुए कानूनी सिद्धांतों पर आधारित बताया।

इससे स्पष्ट है कि केंद्र और राज्यों के बीच पुलिस प्रशासन से जुड़े नियमों की सीमा का प्रश्न इस मामले में अहम भूमिका निभा रहा है।

प्रकाश सिंह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

पुलिस सुधारों से संबंधित प्रकाश सिंह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को अधिक पेशेवर, जवाबदेह और राजनीतिक हस्तक्षेप से अपेक्षाकृत मुक्त बनाने के उद्देश्य से कई दिशा-निर्देश जारी किए थे।

DGP की नियुक्ति और उनके कार्यकाल की स्थिरता भी इन्हीं सुधारों का हिस्सा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्य के पुलिस प्रमुख की नियुक्ति केवल प्रशासनिक सुविधा या तत्काल परिस्थितियों के आधार पर न हो, बल्कि निर्धारित मानकों और प्रक्रिया के अनुसार की जाए।

झारखंड के मामले में सुप्रीम कोर्ट अब यह देख रहा है कि राज्य द्वारा बनाया गया 2025 का नियम इन मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।

राज्यों में DGP नियुक्ति की व्यवस्था पर व्यापक असर संभव

इस मामले का फैसला केवल झारखंड तक सीमित नहीं रह सकता। यदि सुप्रीम कोर्ट संबंधित प्रावधान को असंवैधानिक या अपने पुराने निर्देशों के विपरीत घोषित करता है, तो दूसरे राज्यों में मौजूद समान नियमों पर भी सवाल उठ सकते हैं।

इसके अलावा, अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो सकता है कि DGP नियुक्ति के लिए न्यूनतम शेष सेवा अवधि को लेकर राज्यों को किस प्रकार के मानकों का पालन करना चाहिए। इससे भविष्य में पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के दौरान राज्यों और केंद्र के बीच होने वाले मतभेदों को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मांगी विशेषज्ञ राय

सुनवाई के दौरान पीठ ने अमीकस क्यूरी से भी यह जानकारी लेने की बात कही कि देश के अलग-अलग राज्यों में DGP की नियुक्ति से जुड़े कानून और नियम सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।

इससे संकेत मिलता है कि अदालत मामले को केवल एक राज्य के विवाद के रूप में नहीं देख रही है। न्यायालय व्यापक स्तर पर यह समझना चाहता है कि विभिन्न राज्यों में पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए कौन-कौन से प्रावधान लागू हैं और उनमें शीर्ष अदालत के पुराने निर्देशों का कितना पालन किया जा रहा है।

राज्य को एक सप्ताह का समय

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है। इस अवधि में राज्य या तो विवादित प्रावधान पर पुनर्विचार कर सकता है या फिर अदालत के सामने अपना जवाब दाखिल कर सकता है।

अब आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि झारखंड सरकार अपने नियम में बदलाव करती है या उसकी वैधता का बचाव करती है। साथ ही, अदालत यह भी तय कर सकती है कि यदि प्रावधान में बदलाव या उसे निरस्त करने की जरूरत पड़ती है, तो वर्तमान DGP की नियुक्ति पर उसका प्रभाव किस तरह पड़ेगा।

निष्कर्ष

झारखंड में DGP नियुक्ति को लेकर सामने आया यह विवाद देश में पुलिस सुधार और प्रशासनिक स्वतंत्रता से जुड़े बड़े सवालों को फिर सामने ले आया है। सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस यह सुनिश्चित करने पर दिखाई दे रहा है कि राज्यों के नियम प्रकाश सिंह फैसले में निर्धारित सुरक्षा उपायों को कमजोर न करें।

छह महीने से कम सेवा अवधि वाले अधिकारी को DGP पद के लिए पात्र बनाने वाला प्रावधान अदालत की जांच के केंद्र में है। आने वाले दिनों में झारखंड सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के आगे के निर्देश से इस मामले की दिशा स्पष्ट होगी। यदि अदालत कोई व्यापक फैसला देती है, तो उसका प्रभाव देश के अन्य राज्यों में DGP नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड में DGP नियुक्ति नियम पर उठाए सवाल, छह महीने से कम सेवा वाले अधिकारियों की पात्रता पर जताई आपत्ति

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अक्टूबर 8, 2026

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर 2026। झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति से जुड़े नियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने उस प्रावधान की वैधता पर चिंता जताई है, जिसके तहत किसी ऐसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी राज्य के DGP पद के लिए विचार योग्य माना जा सकता है, जिसकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से कम समय बाकी हो। अदालत का प्रथम दृष्टया मानना है कि यह व्यवस्था प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की भावना से टकराती दिखाई देती है।

AI Generated photo

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन शामिल हैं, ने मामले की सुनवाई करते हुए झारखंड सरकार के नियम पर स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यों द्वारा बनाए गए नियम सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों को कमजोर नहीं कर सकते, जिनका उद्देश्य पुलिस प्रमुख की नियुक्ति में पारदर्शिता, स्थिरता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।

छह महीने से कम सेवा वाले अधिकारी को DGP पद के लिए पात्रता पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा झारखंड के उस नियम से जुड़ा है, जिसमें DGP पद के लिए अधिकारी की शेष सेवा अवधि को लेकर अलग व्यवस्था की गई है। अदालत के समक्ष यह सवाल आया कि क्या ऐसा अधिकारी, जिसकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से भी कम समय बचा हो, राज्य के पुलिस प्रमुख के पद के लिए नियुक्ति का पात्र हो सकता है।

पीठ ने प्रथम दृष्टया संकेत दिया कि इस प्रकार की व्यवस्था प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुरूप नहीं दिखाई देती। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पुलिस सुधारों से जुड़े इस ऐतिहासिक मामले में DGP की नियुक्ति और कार्यकाल को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए थे।

अदालत का कहना है कि यदि किसी राज्य का नियम उन सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है, जो पुलिस प्रमुख की नियुक्ति और कार्यकाल में स्थिरता के लिए बनाए गए हैं, तो ऐसे प्रावधान को कायम रखना मुश्किल हो सकता है।

झारखंड के DGP की नियुक्ति भी मामले के केंद्र में

इस मामले का असर झारखंड की मौजूदा DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नोटिस जारी किया है, क्योंकि यदि अदालत संबंधित नियम को अमान्य घोषित करती है तो इसका सीधा प्रभाव उनकी नियुक्ति पर पड़ने की संभावना है।

पीठ ने सुनवाई के दौरान इस पहलू को भी ध्यान में रखा कि नियुक्ति के बाद किसी अधिकारी के पक्ष में अधिकार की स्थिति बन चुकी है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि नियम को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है तो मौजूदा नियुक्ति पर उसके परिणाम सामने आ सकते हैं। दूसरी ओर, अदालत भविष्य के लिए नियम में बदलाव का रास्ता भी अपना सकती है, ताकि पहले से की गई नियुक्तियों पर अनावश्यक असर न पड़े।

इसलिए मामले में केवल नियम की वैधता ही नहीं, बल्कि उसके संभावित प्रभावों को लेकर भी न्यायिक संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है।

केंद्र सरकार ने नियम को दी चुनौती

यह मामला केंद्र सरकार की ओर से दायर आवेदन के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। केंद्र ने Selection and Appointment of Director General and Inspector General of Police, Jharkhand (Head of Police Force) Regulations, 2025 को चुनौती दी है। इसके साथ ही इन नियमों के आधार पर की गई DGP नियुक्तियों को भी चुनौती के दायरे में रखा गया है।

केंद्र का मूल तर्क यह है कि राज्य के नियम सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। यदि कोई राज्य ऐसा प्रावधान बनाता है जो शीर्ष अदालत के निर्देशों के विपरीत जाता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

झारखंड सरकार ने नियम पर पुनर्विचार की इच्छा जताई

सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि राज्य सरकार को नियम पर दोबारा विचार करने में आपत्ति नहीं है। हालांकि उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि केंद्र सरकार ने विशेष रूप से झारखंड के नियम को चुनौती क्यों दी, जबकि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हो सकती हैं।

यह तर्क मामले को व्यापक संदर्भ देता है। यदि किसी एक राज्य के नियम पर सवाल उठाया जाता है, तो भविष्य में दूसरे राज्यों में लागू समान प्रावधानों की भी समीक्षा का रास्ता खुल सकता है। इसी कारण अदालत के सामने केवल झारखंड का मुद्दा नहीं, बल्कि देशभर में DGP नियुक्ति से संबंधित नियमों की एकरूपता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को सर्वोपरि बताया

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र उन राज्य कानूनों और नियमों का विरोध करेगा, जो प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के विपरीत होंगे। उन्होंने यह रुख राजनीतिक दल या राज्य में सत्ता में मौजूद सरकार से अलग रखते हुए कानूनी सिद्धांतों पर आधारित बताया।

इससे स्पष्ट है कि केंद्र और राज्यों के बीच पुलिस प्रशासन से जुड़े नियमों की सीमा का प्रश्न इस मामले में अहम भूमिका निभा रहा है।

प्रकाश सिंह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

पुलिस सुधारों से संबंधित प्रकाश सिंह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को अधिक पेशेवर, जवाबदेह और राजनीतिक हस्तक्षेप से अपेक्षाकृत मुक्त बनाने के उद्देश्य से कई दिशा-निर्देश जारी किए थे।

DGP की नियुक्ति और उनके कार्यकाल की स्थिरता भी इन्हीं सुधारों का हिस्सा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्य के पुलिस प्रमुख की नियुक्ति केवल प्रशासनिक सुविधा या तत्काल परिस्थितियों के आधार पर न हो, बल्कि निर्धारित मानकों और प्रक्रिया के अनुसार की जाए।

झारखंड के मामले में सुप्रीम कोर्ट अब यह देख रहा है कि राज्य द्वारा बनाया गया 2025 का नियम इन मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।

राज्यों में DGP नियुक्ति की व्यवस्था पर व्यापक असर संभव

इस मामले का फैसला केवल झारखंड तक सीमित नहीं रह सकता। यदि सुप्रीम कोर्ट संबंधित प्रावधान को असंवैधानिक या अपने पुराने निर्देशों के विपरीत घोषित करता है, तो दूसरे राज्यों में मौजूद समान नियमों पर भी सवाल उठ सकते हैं।

इसके अलावा, अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो सकता है कि DGP नियुक्ति के लिए न्यूनतम शेष सेवा अवधि को लेकर राज्यों को किस प्रकार के मानकों का पालन करना चाहिए। इससे भविष्य में पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के दौरान राज्यों और केंद्र के बीच होने वाले मतभेदों को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मांगी विशेषज्ञ राय

सुनवाई के दौरान पीठ ने अमीकस क्यूरी से भी यह जानकारी लेने की बात कही कि देश के अलग-अलग राज्यों में DGP की नियुक्ति से जुड़े कानून और नियम सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।

इससे संकेत मिलता है कि अदालत मामले को केवल एक राज्य के विवाद के रूप में नहीं देख रही है। न्यायालय व्यापक स्तर पर यह समझना चाहता है कि विभिन्न राज्यों में पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए कौन-कौन से प्रावधान लागू हैं और उनमें शीर्ष अदालत के पुराने निर्देशों का कितना पालन किया जा रहा है।

राज्य को एक सप्ताह का समय

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है। इस अवधि में राज्य या तो विवादित प्रावधान पर पुनर्विचार कर सकता है या फिर अदालत के सामने अपना जवाब दाखिल कर सकता है।

अब आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि झारखंड सरकार अपने नियम में बदलाव करती है या उसकी वैधता का बचाव करती है। साथ ही, अदालत यह भी तय कर सकती है कि यदि प्रावधान में बदलाव या उसे निरस्त करने की जरूरत पड़ती है, तो वर्तमान DGP की नियुक्ति पर उसका प्रभाव किस तरह पड़ेगा।

निष्कर्ष

झारखंड में DGP नियुक्ति को लेकर सामने आया यह विवाद देश में पुलिस सुधार और प्रशासनिक स्वतंत्रता से जुड़े बड़े सवालों को फिर सामने ले आया है। सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस यह सुनिश्चित करने पर दिखाई दे रहा है कि राज्यों के नियम प्रकाश सिंह फैसले में निर्धारित सुरक्षा उपायों को कमजोर न करें।

छह महीने से कम सेवा अवधि वाले अधिकारी को DGP पद के लिए पात्र बनाने वाला प्रावधान अदालत की जांच के केंद्र में है। आने वाले दिनों में झारखंड सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के आगे के निर्देश से इस मामले की दिशा स्पष्ट होगी। यदि अदालत कोई व्यापक फैसला देती है, तो उसका प्रभाव देश के अन्य राज्यों में DGP नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।