‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’ : भारतीय हस्तकरघा और हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल
भूमिका भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और विविध हस्तकरघा उत्पादों के लिए विश्वभर…

भूमिका
भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और विविध हस्तकरघा उत्पादों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। देश के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट कला, बुनाई और हस्तशिल्प परंपरा है, जो सदियों से स्थानीय समुदायों की पहचान और आजीविका का आधार रही है। इन पारंपरिक उत्पादों को कानूनी संरक्षण और वैश्विक पहचान प्रदान करने में भौगोलिक संकेतक (Geographical Indications – GI) की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तकरघा) कार्यालय द्वारा हैंडलूम एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (HEPC) के सहयोग से 5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में ‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’ का आयोजन किया जा रहा है। यह सम्मेलन भारत के जीआई-टैग प्राप्त हस्तकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
क्या है ‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’?
‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’ एक ऐसा राष्ट्रीय मंच है, जहां जीआई उत्पादों से जुड़े सभी प्रमुख हितधारक एक साथ आएंगे। इसका उद्देश्य केवल जीआई टैग वाले उत्पादों का प्रचार-प्रसार करना ही नहीं, बल्कि उन्हें वैश्विक व्यापार, आधुनिक विपणन और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी है।
यह सम्मेलन भारतीय हस्तकरघा और हस्तशिल्प उद्योग के लिए नए अवसरों का द्वार खोलने के साथ-साथ कारीगरों, निर्यातकों और निवेशकों के बीच सहयोग को भी मजबूत करेगा।
जीआई टैग क्या होता है?
भौगोलिक संकेतक (GI Tag) किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी गुणवत्ता, विशेषता या प्रतिष्ठा किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है।
भारत में जीआई टैग मिलने से किसी उत्पाद को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं—
- उत्पाद की मौलिकता और पहचान सुरक्षित रहती है।
- नकली और सस्ते उत्पादों पर रोक लगती है।
- कारीगरों और उत्पादकों को उचित आर्थिक लाभ मिलता है।
- वैश्विक बाजार में उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ती है।
- पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है।
भारत के प्रसिद्ध जीआई हस्तकरघा और हस्तशिल्प उत्पाद
भारत में सैकड़ों उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त है, जिनमें कई विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- बनारसी सिल्क साड़ी
- कांचीपुरम सिल्क
- पश्मीना शॉल
- चंदेरी वस्त्र
- महेश्वरी साड़ी
- भागलपुरी सिल्क
- कोटा डोरिया
- पैठणी साड़ी
- कश्मीर कालीन
- मिजोरम और नागालैंड के पारंपरिक वस्त्र
- मधुबनी कला
- कच्छ की कढ़ाई
- चिकनकारी
- ढोकरा कला
- कोंडापल्ली खिलौने
ये उत्पाद केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और शिल्प परंपरा के जीवंत प्रतीक हैं।
समिट का प्रमुख उद्देश्य
‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0’ का मुख्य उद्देश्य भारतीय जीआई उत्पादों को घरेलू और वैश्विक बाजार में नई पहचान दिलाना है।
सम्मेलन के प्रमुख उद्देश्य हैं—
- जीआई हस्तकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पादों का व्यापक प्रचार-प्रसार।
- जीआई पारिस्थितिकी तंत्र (GI Ecosystem) को मजबूत बनाना।
- विदेशी खरीदारों और भारतीय निर्यातकों के बीच व्यापारिक संबंध विकसित करना।
- कारीगरों को आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं से जोड़ना।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स के माध्यम से बिक्री बढ़ाना।
- निवेश, ब्रांडिंग और विपणन के नए अवसर तैयार करना।
किन-किन की होगी भागीदारी?
यह सम्मेलन विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और संस्थाओं को एक साझा मंच पर लाएगा।
सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख प्रतिनिधियों में शामिल होंगे—
- लगभग 10 देशों से विदेशी खरीदार
- भारत के प्रमुख निर्यातक
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के प्रतिनिधि
- जीआई उत्पादों के पंजीकृत स्वामी
- केंद्र एवं राज्य सरकारों के अधिकारी
- प्रमुख वस्त्र उद्योग विशेषज्ञ
- अग्रणी टेक्सटाइल ब्रांड
- बड़े रिटेल नेटवर्क
- ई-कॉमर्स कंपनियां
- शिक्षाविद और शोधकर्ता
- हस्तकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र से जुड़े संगठन
यह विविध भागीदारी भारत के जीआई उत्पादों के लिए नए व्यापारिक और निवेश अवसरों को बढ़ावा देगी।
कारीगरों के लिए नए अवसर
भारत के लाखों बुनकर और हस्तशिल्प कारीगर पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। लेकिन सीमित बाजार, विपणन की कमी और नकली उत्पादों की चुनौती के कारण उन्हें अपेक्षित आय नहीं मिल पाती।
‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0’ जैसे आयोजन कारीगरों को—
- अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक पहुंच,
- बेहतर मूल्य,
- आधुनिक डिजाइन की जानकारी,
- निर्यात संबंधी मार्गदर्शन,
- डिजिटल विपणन प्रशिक्षण,
- ब्रांड निर्माण के अवसर
प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ई-कॉमर्स की बढ़ती भूमिका
डिजिटल युग में ऑनलाइन व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। आज दुनिया का कोई भी ग्राहक इंटरनेट के माध्यम से भारत के पारंपरिक उत्पाद खरीद सकता है।
सम्मेलन में प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की भागीदारी से—
- जीआई उत्पादों की ऑनलाइन उपलब्धता बढ़ेगी।
- छोटे कारीगर सीधे ग्राहकों तक पहुंच सकेंगे।
- बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।
- वैश्विक बाजार तक पहुंच आसान बनेगी।
- डिजिटल भुगतान और लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा मिलेगा।
निर्यात बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम
भारत का हस्तकरघा और हस्तशिल्प उद्योग लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है। यदि जीआई उत्पादों का प्रभावी ब्रांडिंग और विपणन किया जाए तो निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
विदेशी खरीदारों की भागीदारी से—
- नए व्यापारिक समझौते हो सकते हैं।
- निर्यातकों को नए बाजार मिलेंगे।
- भारत की पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान मिलेगी।
- विदेशी मुद्रा अर्जन बढ़ेगा।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
‘लोकल टू ग्लोबल’ की अवधारणा को मिलेगा बल
भारत सरकार लंबे समय से “वोकल फॉर लोकल” और “लोकल टू ग्लोबल” अभियान को बढ़ावा दे रही है।
जीआई उत्पाद इन अभियानों का सबसे मजबूत आधार हैं क्योंकि—
- इनका निर्माण स्थानीय कारीगर करते हैं।
- प्रत्येक उत्पाद अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान रखता है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
- महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को रोजगार मिलता है।
- पारंपरिक कौशल नई पीढ़ी तक पहुंचता है।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
जीआई केवल आर्थिक पहचान नहीं बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का भी माध्यम है।
यदि पारंपरिक उत्पादों को पर्याप्त बाजार नहीं मिलेगा तो धीरे-धीरे अनेक शिल्प और बुनाई परंपराएं समाप्त होने लगेंगी।
ऐसे सम्मेलन—
- पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण,
- नई पीढ़ी को शिल्प से जोड़ने,
- स्थानीय समुदायों को आर्थिक सुरक्षा,
- भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रचार
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की दिशा में योगदान
हस्तकरघा और हस्तशिल्प उद्योग ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। जीआई उत्पादों को बढ़ावा देकर—
- ग्रामीण रोजगार बढ़ेगा,
- महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा,
- सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मजबूत होंगे,
- निर्यात में वृद्धि होगी,
- आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति मिलेगी।
यह पहल विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है।
भविष्य की संभावनाएं
यदि जीआई उत्पादों के लिए आधुनिक ब्रांडिंग, गुणवत्ता प्रमाणन, डिज़ाइन नवाचार, डिजिटल मार्केटिंग और वैश्विक नेटवर्किंग को निरंतर बढ़ावा दिया जाए, तो भारत विश्व के प्रीमियम हस्तकरघा और हस्तशिल्प बाजार में अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकता है।
इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ब्लॉकचेन आधारित उत्पाद प्रमाणीकरण, डिजिटल कैटलॉग, वर्चुअल प्रदर्शनी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों के माध्यम से भारतीय शिल्प को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।
निष्कर्ष
‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’ केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि भारतीय हस्तकरघा और हस्तशिल्प की वैश्विक पहचान को मजबूत करने का एक व्यापक अभियान है। यह आयोजन कारीगरों, बुनकरों, निर्यातकों, उद्योग जगत, नीति-निर्माताओं और विदेशी खरीदारों को एक साझा मंच पर लाकर भारत की समृद्ध शिल्प परंपरा को नए बाजारों और नई संभावनाओं से जोड़ने का प्रयास करेगा।
यदि इस प्रकार की पहल लगातार जारी रहती है, तो भारत के जीआई-टैग प्राप्त उत्पाद न केवल वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएंगे, बल्कि लाखों कारीगरों की आय, रोजगार और सम्मान में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी। भारतीय संस्कृति, परंपरा और शिल्प कौशल को विश्व पटल पर स्थापित करने की दिशा में ‘जीआई एंड बियॉन्ड 2.0 समिट’ एक महत्वपूर्ण और दूरगामी पहल साबित हो सकती है।