पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA): ज़ूनोटिक बीमारियों से निपटने की दिशा में भारत की बड़ी तैयारी

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नई दिल्ली: संक्रामक और पशुजन्य (ज़ूनोटिक) रोगों का बढ़ता खतरा आज पूरी दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। हाल के वर्षों में कई ऐसी बीमारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पशुओं, मनुष्यों और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी सोच को मजबूत आधार देते हुए भारत ने 29 जून से 3 जुलाई 2026 के बीच मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के खारी गांव में ‘पशुजन्य युद्ध अभ्यास (Pashujanya Yudh Abhyas – PYA)’ का आयोजन किया। यह अभ्यास देश की पशु स्वास्थ्य आपदा प्रबंधन क्षमता को सुदृढ़ करने और संभावित महामारी से प्रभावी ढंग से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

वन हेल्थ अवधारणा पर आधारित पहल

यह अभ्यास ‘वन हेल्थ’ (One Health) सिद्धांत पर आधारित था, जिसके अनुसार मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं बल्कि एक समग्र प्रणाली के रूप में देखा जाता है। बदलती जलवायु, वन्यजीवों के आवास में हस्तक्षेप और बढ़ते पशुपालन के कारण ज़ूनोटिक रोगों का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यह दृष्टिकोण समय की आवश्यकता बन चुका है।

अभ्यास का मुख्य उद्देश्य

पशुजन्य युद्ध अभ्यास का प्रमुख उद्देश्य देश की तैयारियों का मूल्यांकन करना और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को बेहतर बनाना था। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया गया—

  • पशु स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत बनाना।
  • पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम और नियंत्रण की क्षमता विकसित करना।
  • रोग की शीघ्र पहचान और निगरानी प्रणाली का परीक्षण करना।
  • विभिन्न विभागों के बीच समन्वित कार्रवाई का अभ्यास करना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और जोखिम संचार व्यवस्था को बेहतर बनाना।

काल्पनिक प्रकोप के माध्यम से तैयारियों की जांच

अभ्यास के दौरान इन्फ्लुएंजा A (H1N1) के संभावित प्रकोप का काल्पनिक परिदृश्य तैयार किया गया। इसमें यह मानकर अभ्यास किया गया कि संक्रमण पशुओं से मनुष्यों और वन्यजीवों तक फैल सकता है। इसके बाद रोग की पहचान, संक्रमित क्षेत्रों का सर्वेक्षण, नमूना संग्रह, प्रयोगशाला परीक्षण, संक्रमित पशुओं के नियंत्रण, जैव सुरक्षा उपायों और आम जनता तक सही जानकारी पहुंचाने जैसी सभी प्रक्रियाओं का चरणबद्ध अभ्यास किया गया।

इस प्रकार प्रतिभागियों ने वास्तविक आपदा जैसी परिस्थितियों में निर्णय लेने और संसाधनों के समुचित उपयोग का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।

विभिन्न संस्थानों की संयुक्त भागीदारी

इस राष्ट्रीय अभ्यास में अनेक केंद्रीय और राज्य स्तरीय संस्थानों ने मिलकर भाग लिया। इनमें प्रमुख रूप से—

  • पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD)
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
  • राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC)
  • भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR)
  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC)
  • मध्य प्रदेश का राज्य प्रशासन और जिला स्तरीय विभाग

सभी संस्थानों ने अपने-अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता साझा करते हुए एकीकृत प्रतिक्रिया प्रणाली का प्रदर्शन किया।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष महत्व

भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। ऐसे में यदि किसी पशुजन्य रोग का प्रकोप फैलता है तो उसका असर केवल पशुधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

यह अभ्यास ग्रामीण समुदायों को समय रहते सतर्क करने, पशुपालकों को सुरक्षित व्यवहार अपनाने और स्थानीय प्रशासन को प्रभावी प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

भविष्य की महामारी से निपटने की मजबूत तैयारी

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि संक्रामक रोगों के विरुद्ध केवल उपचार पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समय रहते तैयारी और समन्वित कार्रवाई सबसे महत्वपूर्ण होती है। पशुजन्य युद्ध अभ्यास इसी दिशा में भारत की सक्रिय रणनीति को दर्शाता है।

रोग निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, प्रयोगशाला नेटवर्क, जैव सुरक्षा और जनसंपर्क व्यवस्था को एक साथ परखकर यह अभ्यास भविष्य की संभावित महामारी के जोखिम को कम करने में सहायक होगा।

निष्कर्ष

‘पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA)’ केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की वन हेल्थ आधारित राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पहल मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलित समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ देश की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को भी मजबूत बनाती है। यदि ऐसे अभ्यास नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं और उनके अनुभवों को नीतियों में शामिल किया जाता है, तो भारत भविष्य में ज़ूनोटिक रोगों और अन्य जैविक आपात स्थितियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम होगा।

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पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA): ज़ूनोटिक बीमारियों से निपटने की दिशा में भारत की बड़ी तैयारी

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:जुलाई 4, 2026

नई दिल्ली: संक्रामक और पशुजन्य (ज़ूनोटिक) रोगों का बढ़ता खतरा आज पूरी दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। हाल के वर्षों में कई ऐसी बीमारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पशुओं, मनुष्यों और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी सोच को मजबूत आधार देते हुए भारत ने 29 जून से 3 जुलाई 2026 के बीच मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के खारी गांव में ‘पशुजन्य युद्ध अभ्यास (Pashujanya Yudh Abhyas – PYA)’ का आयोजन किया। यह अभ्यास देश की पशु स्वास्थ्य आपदा प्रबंधन क्षमता को सुदृढ़ करने और संभावित महामारी से प्रभावी ढंग से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

वन हेल्थ अवधारणा पर आधारित पहल

यह अभ्यास ‘वन हेल्थ’ (One Health) सिद्धांत पर आधारित था, जिसके अनुसार मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं बल्कि एक समग्र प्रणाली के रूप में देखा जाता है। बदलती जलवायु, वन्यजीवों के आवास में हस्तक्षेप और बढ़ते पशुपालन के कारण ज़ूनोटिक रोगों का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यह दृष्टिकोण समय की आवश्यकता बन चुका है।

अभ्यास का मुख्य उद्देश्य

पशुजन्य युद्ध अभ्यास का प्रमुख उद्देश्य देश की तैयारियों का मूल्यांकन करना और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को बेहतर बनाना था। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया गया—

काल्पनिक प्रकोप के माध्यम से तैयारियों की जांच

अभ्यास के दौरान इन्फ्लुएंजा A (H1N1) के संभावित प्रकोप का काल्पनिक परिदृश्य तैयार किया गया। इसमें यह मानकर अभ्यास किया गया कि संक्रमण पशुओं से मनुष्यों और वन्यजीवों तक फैल सकता है। इसके बाद रोग की पहचान, संक्रमित क्षेत्रों का सर्वेक्षण, नमूना संग्रह, प्रयोगशाला परीक्षण, संक्रमित पशुओं के नियंत्रण, जैव सुरक्षा उपायों और आम जनता तक सही जानकारी पहुंचाने जैसी सभी प्रक्रियाओं का चरणबद्ध अभ्यास किया गया।

इस प्रकार प्रतिभागियों ने वास्तविक आपदा जैसी परिस्थितियों में निर्णय लेने और संसाधनों के समुचित उपयोग का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।

विभिन्न संस्थानों की संयुक्त भागीदारी

इस राष्ट्रीय अभ्यास में अनेक केंद्रीय और राज्य स्तरीय संस्थानों ने मिलकर भाग लिया। इनमें प्रमुख रूप से—

सभी संस्थानों ने अपने-अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता साझा करते हुए एकीकृत प्रतिक्रिया प्रणाली का प्रदर्शन किया।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष महत्व

भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। ऐसे में यदि किसी पशुजन्य रोग का प्रकोप फैलता है तो उसका असर केवल पशुधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

यह अभ्यास ग्रामीण समुदायों को समय रहते सतर्क करने, पशुपालकों को सुरक्षित व्यवहार अपनाने और स्थानीय प्रशासन को प्रभावी प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

भविष्य की महामारी से निपटने की मजबूत तैयारी

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि संक्रामक रोगों के विरुद्ध केवल उपचार पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समय रहते तैयारी और समन्वित कार्रवाई सबसे महत्वपूर्ण होती है। पशुजन्य युद्ध अभ्यास इसी दिशा में भारत की सक्रिय रणनीति को दर्शाता है।

रोग निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, प्रयोगशाला नेटवर्क, जैव सुरक्षा और जनसंपर्क व्यवस्था को एक साथ परखकर यह अभ्यास भविष्य की संभावित महामारी के जोखिम को कम करने में सहायक होगा।

निष्कर्ष

‘पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA)’ केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की वन हेल्थ आधारित राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पहल मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलित समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ देश की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को भी मजबूत बनाती है। यदि ऐसे अभ्यास नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं और उनके अनुभवों को नीतियों में शामिल किया जाता है, तो भारत भविष्य में ज़ूनोटिक रोगों और अन्य जैविक आपात स्थितियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम होगा।