भारतीय धान किस्मों से वैश्विक लाभ: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने ₹8.22 करोड़ का लाभांश राज्यों और अनुसंधान संस्थानों को किया वितरित

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भारत की समृद्ध जैव विविधता केवल प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि देश की कृषि, खाद्य…

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भारत की समृद्ध जैव विविधता केवल प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि देश की कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी मजबूत नींव है। विशेष रूप से भारतीय धान (चावल) की पारंपरिक किस्में विश्वभर में अपनी गुणवत्ता, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और विविध जलवायु में अनुकूलन के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हीं अमूल्य आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और उनके न्यायसंगत उपयोग को सुनिश्चित करने की दिशा में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority – NBA) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने धान अनुसंधान संस्थानों और प्रमुख धान उत्पादक राज्यों को ₹8.22 करोड़ की लाभ-साझेदारी (Benefit Sharing) राशि जारी की है। यह राशि एक अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी से प्राप्त हुई है, जिसने भारतीय धान की पारंपरिक किस्मों का उपयोग करके उच्च उत्पादकता वाले संकर (Hybrid) बीज विकसित किए और उनका व्यावसायिक उपयोग किया। इसे भारत में धान के क्षेत्र में लाभ-साझेदारी का अब तक का सबसे बड़ा एकल वितरण माना जा रहा है।

जैव विविधता संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक पहल

भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहां जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। देश में हजारों वर्षों से किसान विभिन्न प्रकार की धान की किस्मों का संरक्षण करते आए हैं। इन किस्मों में जलवायु परिवर्तन का सामना करने, कम पानी में उत्पादन देने, रोगों से लड़ने और विशेष स्वाद एवं पोषण जैसे अनेक गुण पाए जाते हैं।

जब कोई कंपनी इन पारंपरिक किस्मों का उपयोग करके नए बीज या अन्य व्यावसायिक उत्पाद विकसित करती है, तो जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत उसे लाभ का एक हिस्सा भारत के साथ साझा करना होता है। इसी व्यवस्था को Access and Benefit Sharing (ABS) कहा जाता है।

₹8.22 करोड़ की राशि क्यों है महत्वपूर्ण?

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा वितरित ₹8.22 करोड़ की राशि केवल आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि यह किसानों, वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों के योगदान का सम्मान भी है।

यह लाभांश उस अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी से प्राप्त हुआ जिसने भारतीय धान की आनुवंशिक सामग्री का उपयोग कर उन्नत संकर बीज विकसित किए। इन बीजों की व्यावसायिक सफलता से प्राप्त आय का एक हिस्सा भारत को लाभ-साझेदारी के रूप में मिला।

यह कदम इस बात का उदाहरण है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने वाली कंपनियों को स्थानीय समुदायों और मूल संसाधन प्रदाताओं के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

किन संस्थानों और राज्यों को मिलेगा लाभ?

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा जारी राशि धान अनुसंधान से जुड़े प्रमुख संस्थानों और धान उत्पादन में अग्रणी राज्यों के बीच वितरित की जाएगी।

इसका उद्देश्य है—

  • धान अनुसंधान को और अधिक प्रोत्साहित करना।
  • पारंपरिक किस्मों का संरक्षण करना।
  • किसानों की सहभागिता बढ़ाना।
  • नई जलवायु-अनुकूल किस्मों का विकास करना।
  • जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रमों को मजबूत बनाना।

इस राशि का उपयोग अनुसंधान परियोजनाओं, बीज संरक्षण, जर्मप्लाज्म बैंक, वैज्ञानिक अध्ययन तथा किसानों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किया जा सकता है।

भारतीय धान की वैश्विक पहचान

भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देशों में से एक है। देश में हजारों स्थानीय धान किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें बासमती, सुगंधित धान, सूखा-सहनशील, बाढ़-सहनशील और लवणीय मिट्टी में उगने वाली अनेक किस्में शामिल हैं।

इन्हीं किस्मों का उपयोग वैश्विक कृषि कंपनियां नई संकर प्रजातियां विकसित करने के लिए करती हैं।

भारतीय धान की आनुवंशिक विविधता विश्व की खाद्य सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि बदलती जलवायु परिस्थितियों में मजबूत और टिकाऊ फसलें विकसित करने में इनका योगदान अत्यधिक है।

लाभ-साझेदारी (Benefit Sharing) क्या है?

लाभ-साझेदारी एक ऐसी कानूनी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत यदि कोई संस्था या कंपनी किसी देश की जैविक संपदा का उपयोग कर व्यावसायिक लाभ अर्जित करती है, तो उसे उस लाभ का एक निर्धारित हिस्सा मूल संसाधन उपलब्ध कराने वाले देश या समुदाय के साथ साझा करना होता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य है—

  • जैव संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग।
  • स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा।
  • पारंपरिक ज्ञान का सम्मान।
  • जैव विविधता संरक्षण के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना।

किसानों के लिए क्या है इसका महत्व?

भारतीय किसानों ने सदियों से धान की विभिन्न किस्मों का संरक्षण किया है। अनेक स्थानीय किस्में आज भी गांवों में पारंपरिक खेती के माध्यम से सुरक्षित हैं।

यदि इन किस्मों से विकसित तकनीकों से वैश्विक कंपनियां लाभ कमाती हैं और उसका हिस्सा किसानों एवं अनुसंधान संस्थानों तक पहुंचता है, तो इससे किसानों को भी संरक्षण कार्य जारी रखने की प्रेरणा मिलेगी।

यह व्यवस्था किसानों की भूमिका को केवल उत्पादक के रूप में नहीं बल्कि जैव विविधता के संरक्षक के रूप में भी मान्यता देती है।

अनुसंधान संस्थानों को मिलेगा नया प्रोत्साहन

धान अनुसंधान संस्थानों की भूमिका केवल नई किस्में विकसित करने तक सीमित नहीं होती। वे—

  • आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं।
  • रोग प्रतिरोधी किस्में विकसित करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बीज तैयार करते हैं।
  • किसानों तक नई तकनीक पहुंचाते हैं।

₹8.22 करोड़ जैसी राशि इन संस्थानों को आधुनिक अनुसंधान सुविधाएं विकसित करने और नई परियोजनाओं पर कार्य करने में मदद करेगी।

जैव विविधता अधिनियम की भूमिका

भारत ने वर्ष 2002 में जैव विविधता अधिनियम लागू किया था, जिसका उद्देश्य देश की जैविक संपदा का संरक्षण और उसका सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।

इस अधिनियम के अंतर्गत—

  • विदेशी कंपनियों को भारतीय जैव संसाधनों के उपयोग के लिए अनुमति लेनी होती है।
  • लाभ-साझेदारी अनिवार्य होती है।
  • स्थानीय समुदायों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
  • जैव विविधता प्रबंधन समितियों को भी संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाता है।

यह कानून भारत की प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में भारत की पारंपरिक कृषि विविधता वैश्विक अनुसंधान का महत्वपूर्ण आधार बन रही है।

धान की स्थानीय किस्मों में मौजूद विशेष गुण भविष्य की कृषि को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा की गई यह लाभ-साझेदारी दर्शाती है कि भारत अब केवल जैव संसाधन उपलब्ध कराने वाला देश नहीं, बल्कि उनके न्यायपूर्ण उपयोग और संरक्षण का मजबूत पक्षधर भी है।

भविष्य की दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जैव विविधता आधारित अनुसंधान और अधिक बढ़ेगा। ऐसे में लाभ-साझेदारी की पारदर्शी व्यवस्था किसानों, वैज्ञानिकों, अनुसंधान संस्थानों और सरकार के बीच बेहतर सहयोग स्थापित करेगी।

यदि पारंपरिक कृषि ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय इसी प्रकार आगे बढ़ता रहा, तो भारत न केवल खाद्य सुरक्षा बल्कि जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में भी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा धान अनुसंधान संस्थानों और धान उत्पादक राज्यों को ₹8.22 करोड़ की लाभ-साझेदारी राशि जारी किया जाना भारत की जैविक संपदा के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह निर्णय यह संदेश देता है कि देश की पारंपरिक फसल किस्में केवल कृषि उत्पादन का आधार नहीं हैं, बल्कि वे अमूल्य वैज्ञानिक और आर्थिक संसाधन भी हैं।

यह पहल किसानों, वैज्ञानिकों, अनुसंधान संस्थानों और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग को मजबूत करेगी तथा भारत की जैव विविधता को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। साथ ही यह वैश्विक कंपनियों के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि भारतीय जैव संसाधनों का उपयोग करने पर उनके लाभ का उचित हिस्सा भारत और उसके मूल हितधारकों तक अवश्य पहुंचे।

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