इजरायल की राजनीति में नया विवाद: आइजेनकोट, याइर गोलान और मंसूर अब्बास को लेकर तेज हुई बहस

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इजरायल की आगामी राजनीति में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व और संभावित गठबंधन को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खेमे की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि आइजेनकोट के नेतृत्व में बनने वाली किसी भी विपक्षी सरकार को याइर गोलान और अरब पार्टी राम के नेता मंसूर अब्बास के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी राजनीतिक समीकरण को आधार बनाकर सत्तारूढ़ खेमे ने आरोप लगाया है कि ऐसी सरकार अंततः फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

हालांकि, इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक आरोपों, चुनावी प्रचार और नेताओं की वास्तविक नीतिगत स्थितियों के बीच अंतर किया जाए। फिलिस्तीनी राज्य का प्रश्न इजरायल की राजनीति में लंबे समय से सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल रहा है और अलग-अलग दल इस विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं।

आइजेनकोट क्यों बने नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी?

गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके हैं और सैन्य पृष्ठभूमि के कारण उन्हें सुरक्षा मामलों में अनुभवी नेता के रूप में देखा जाता है। 2026 के चुनावी परिदृश्य में वह प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में उभरे हैं। उनकी राजनीति का केंद्र राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन में सुधार और इजरायली समाज के भीतर बढ़ते राजनीतिक विभाजन को कम करना बताया जाता है।

आइजेनकोट का राजनीतिक आधार केवल वामपंथी मतदाताओं तक सीमित नहीं माना जाता। वह केंद्र और अपेक्षाकृत नरम दक्षिणपंथी मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि उनके संभावित गठबंधन को लेकर इजरायल की राजनीति में काफी चर्चा हो रही है।

इजरायल की संसदीय व्यवस्था में किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बन जाना अपने आप में सरकार बनाने की गारंटी नहीं देता। सरकार बनाने के लिए नेसेट में बहुमत जुटाना आवश्यक होता है। इसलिए चुनाव के बाद अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन और समर्थन की राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

याइर गोलान का नाम क्यों जुड़ रहा है?

डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता याइर गोलान इजरायल के राजनीतिक परिदृश्य में अपेक्षाकृत उदार और वामपंथी आवाज के रूप में पहचाने जाते हैं। वह फिलिस्तीनियों से अलगाव की नीति और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान की चर्चा करते रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार गोलान ने भविष्य के संदर्भ में दो-राज्य समाधान की संभावना पर भी बात की है, हालांकि विपक्ष के कई अन्य नेता इस मुद्दे पर अधिक सावधानी बरतते हैं।

यही अंतर नेतन्याहू समर्थक खेमे को राजनीतिक हमला करने का अवसर देता है। उनका तर्क है कि आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए गोलान जैसे नेताओं का समर्थन लेना पड़ सकता है और इससे सरकार की फिलिस्तीन नीति बदल सकती है।

लेकिन यह कहना कि किसी संभावित गठबंधन का बनना अपने आप फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना सुनिश्चित कर देगा, एक राजनीतिक निष्कर्ष है, स्थापित तथ्य नहीं। सरकार बनने के बाद वास्तविक नीति कई दलों के बीच समझौते, सुरक्षा परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय दबाव और संसद में समर्थन पर निर्भर करेगी।

मंसूर अब्बास की भूमिका

इस विवाद का दूसरा प्रमुख नाम मंसूर अब्बास है, जो अरब पार्टी राम के नेता हैं। इजरायल की राजनीति में अरब दलों की भूमिका पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण हुई है। 2021 में राम पहली बार इजरायल की गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी थी, जिससे यह साबित हुआ कि अरब राजनीतिक दल सरकार बनाने के समीकरण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

अब्बास की राजनीति को अक्सर इजरायल के अरब नागरिकों के अधिकारों, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और राजनीतिक भागीदारी से जोड़ा जाता है। फिलिस्तीनी प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण इजरायल के दक्षिणपंथी दलों से काफी अलग है।

यही वजह है कि यदि भविष्य में किसी विपक्षी गठबंधन को राम के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है, तो नेतन्याहू समर्थक दल इसे चुनावी मुद्दा बना सकते हैं। उनका संदेश यह है कि ऐसी सरकार अरब दलों पर निर्भर होगी और उसके कारण फिलिस्तीनी मुद्दे पर इजरायल की नीति बदल सकती है।

नेतन्याहू खेमे का चुनावी हमला

जुलाई 2026 में नेतन्याहू द्वारा साझा किए गए एक AI-निर्मित राजनीतिक वीडियो ने इस विवाद को और बढ़ा दिया। वीडियो में आइजेनकोट को मंसूर अब्बास के साथ दिखाया गया और संदेश दिया गया कि आइजेनकोट की सरकार याइर गोलान तथा अरब दलों के बिना नहीं बन सकती। इस प्रचार सामग्री पर आलोचना भी हुई और कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि वीडियो में दिखाया गया युवा व्यक्ति आइजेनकोट के दिवंगत बेटे की ओर संकेत करता है। नेतन्याहू के खेमे ने इस आरोप से इनकार किया।

इसके बाद चुनावी बहस केवल नीतियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजनीतिक विज्ञापन और AI तकनीक के इस्तेमाल तक पहुंच गई। आइजेनकोट की पार्टी ने इस तरह की सामग्री को भ्रामक राजनीतिक प्रचार बताया और आरोप लगाया कि चुनाव में तथ्यों की जगह AI आधारित सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है।

क्या आइजेनकोट वास्तव में फिलिस्तीनी राज्य बनाएंगे?

यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। उपलब्ध रिपोर्टों से तस्वीर इतनी सीधी नहीं दिखाई देती। आइजेनकोट को फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे पर पूरी तरह वामपंथी नेता के रूप में पेश करना उनके राजनीतिक रुख को अत्यधिक सरल बना देना होगा। उनका प्रमुख जोर सुरक्षा, इजरायल की राष्ट्रीय एकता और भविष्य में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था पर रहा है।

दूसरी ओर, याइर गोलान फिलिस्तीनियों से अलगाव और संभावित राजनीतिक समाधान पर अधिक खुलकर बात करते हैं। मंसूर अब्बास भी फिलिस्तीनी अधिकारों और राजनीतिक समाधान के प्रश्न पर अलग दृष्टिकोण रखते हैं। इसलिए इन नेताओं के बीच संभावित सहयोग का अर्थ यह हो सकता है कि फिलिस्तीनी प्रश्न सरकार के एजेंडे में अधिक प्रमुखता से आए, लेकिन इससे तत्काल फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

‘फिलिस्तीनी राज्य’ का मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों?

इजरायल में फिलिस्तीनी राज्य का सवाल केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाओं, बस्तियों, यरुशलम, गाजा, वेस्ट बैंक और इजरायल की भविष्य की पहचान से जुड़ा हुआ है।

दक्षिणपंथी दलों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य इजरायल की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, इजरायल के कुछ केंद्र और वामपंथी नेता मानते हैं कि लंबे समय तक फिलिस्तीनी समस्या का राजनीतिक समाधान न होने से इजरायल की सुरक्षा और लोकतांत्रिक चरित्र दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

यही वैचारिक विभाजन आगामी चुनाव को बेहद महत्वपूर्ण बना रहा है।

चुनावी राजनीति में गठबंधन सबसे बड़ा सवाल

इजरायल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली संसदीय व्यवस्था में गठबंधन राजनीति अक्सर निर्णायक होती है। इसलिए किसी नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि वह किन दलों के साथ सरकार बनाने में सक्षम होगा।

नेतन्याहू का चुनावी संदेश यही है कि आइजेनकोट के सामने सरकार बनाने के लिए ऐसे दलों का सहारा लेने की स्थिति आ सकती है जिनकी फिलिस्तीनी मुद्दे पर अलग सोच है। दूसरी तरफ आइजेनकोट का खेमे से यह तर्क सामने आता है कि चुनावी प्रचार में संभावित गठबंधन को लेकर भय पैदा किया जा रहा है।

आगे की राह

आगामी चुनाव में इजरायल के मतदाताओं के सामने केवल नेतन्याहू बनाम आइजेनकोट का सवाल नहीं होगा। इसके साथ सुरक्षा, गाजा युद्ध के बाद की रणनीति, अर्थव्यवस्था, न्यायपालिका, अरब नागरिकों की राजनीतिक भूमिका और फिलिस्तीन के साथ भविष्य के संबंध जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण होंगे।

फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को लेकर वर्तमान राजनीतिक बयानबाजी को इसलिए चुनावी रणनीति के संदर्भ में भी देखना जरूरी है। किसी संभावित गठबंधन को लेकर लगाए गए आरोप और वास्तविक सरकारी नीति एक ही चीज नहीं होते।

इस विवाद से इतना स्पष्ट है कि इजरायल की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुकी है। आइजेनकोट, गोलान और अब्बास जैसे नेताओं के संभावित राजनीतिक समीकरण ने नेतन्याहू खेमे को एक बड़ा चुनावी मुद्दा दिया है। दूसरी ओर, विपक्ष के लिए चुनौती यह है कि वह मतदाताओं को भरोसा दिलाए कि उसका गठबंधन केवल नेतन्याहू विरोध पर आधारित नहीं होगा, बल्कि सुरक्षा, शासन और फिलिस्तीनी प्रश्न पर स्पष्ट एवं व्यावहारिक नीति भी रखेगा।

अंततः यह फैसला इजरायल के मतदाताओं को करना होगा कि वे सुरक्षा और मौजूदा नीति को प्राथमिकता देते हैं या राजनीतिक बदलाव और नए गठबंधन को। फिलिस्तीनी राज्य का सवाल इस चुनावी बहस के केंद्र में रह सकता है, लेकिन इसके भविष्य का निर्धारण केवल किसी एक नेता या दल के बयान से नहीं, बल्कि चुनाव परिणाम, गठबंधन समीकरण और आने वाली सरकार की वास्तविक नीतियों से होगा।

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