पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट के नाम को लेकर सियासत: सावरकर, नेताजी और सरदार पटेल के सम्मान पर फिर उठे सवाल

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देश के स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के निर्माण से जुड़े महान व्यक्तित्वों के सम्मान…

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देश के स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के निर्माण से जुड़े महान व्यक्तित्वों के सम्मान को लेकर राजनीति समय-समय पर तेज होती रही है। पोर्ट ब्लेयर स्थित हवाई अड्डे के नाम को लेकर भी ऐसा ही एक राजनीतिक विवाद सामने आता रहा है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम स्वतंत्रता सेनानी और भारत रत्न से सम्मानित विनायक दामोदर सावरकर के नाम पर रखने का निर्णय भारतीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच वैचारिक मतभेद भी सामने आते रहे हैं।

यह विषय केवल किसी हवाई अड्डे के नाम का सवाल नहीं है, बल्कि इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं, राष्ट्रवाद की अवधारणा और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के प्रति सम्मान की बहस जुड़ी हुई है। भाजपा और उसके समर्थक सावरकर को एक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रवादी विचारक के रूप में देखते हैं, जबकि कांग्रेस तथा उसके वैचारिक समर्थक सावरकर की राजनीतिक भूमिका और उनके विचारों का मूल्यांकन अलग दृष्टिकोण से करते हैं।

पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट और सावरकर का नाम

पोर्ट ब्लेयर का हवाई अड्डा अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में आने-जाने का प्रमुख माध्यम है। यह क्षेत्र भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यहां स्थित सेल्युलर जेल को ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक कैदियों को रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। विनायक दामोदर सावरकर भी लंबे समय तक इसी जेल में बंद रहे थे।

सावरकर का जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक विवादास्पद लेकिन महत्वपूर्ण अध्याय से जुड़ा रहा है। उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार किया गया था और अंडमान की सेल्युलर जेल में कठोर कारावास भुगतना पड़ा। इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण उनके समर्थक पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखना विशेष महत्व का विषय मानते हैं।

वाजपेयी सरकार के समय पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर के नाम पर रखने का निर्णय लिया गया था। बाद में हवाई अड्डे का आधिकारिक नाम वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया। वर्ष 2023 में इसके नए टर्मिनल का उद्घाटन भी किया गया।

नामकरण बना राजनीतिक बहस का हिस्सा

हवाई अड्डे के नाम को लेकर राजनीतिक बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में सार्वजनिक स्थलों के नामकरण को अक्सर राजनीतिक और वैचारिक संदेश से जोड़कर देखा जाता है। किसी सड़क, भवन, हवाई अड्डे या संस्थान का नाम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के नाम पर रखना उस व्यक्ति की सार्वजनिक स्मृति को मजबूत करता है।

भाजपा का तर्क रहा है कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐसे व्यक्तित्व, जिन्हें लंबे समय तक राजनीतिक कारणों से पर्याप्त सम्मान नहीं मिला, उन्हें राष्ट्रीय स्मृति में उचित स्थान मिलना चाहिए। इसी संदर्भ में सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं का उल्लेख किया जाता है।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस का दृष्टिकोण कई मामलों में अलग रहा है। कांग्रेस नेताओं ने सावरकर की विचारधारा, उनके राजनीतिक लेखन और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। यही वैचारिक अंतर समय-समय पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का कारण बनता है।

सावरकर का अंडमान से ऐतिहासिक संबंध

सावरकर और अंडमान का संबंध भारतीय इतिहास में विशेष स्थान रखता है। सेल्युलर जेल को ब्रिटिश शासन की कठोर दंड व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अनेक कैदियों को यहां रखा गया था।

सावरकर को भी इसी जेल में कारावास भुगतना पड़ा। इसलिए उनके नाम से पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम जोड़ने को उनके समर्थक ऐतिहासिक स्मृति के सम्मान के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि अंडमान की धरती पर सावरकर का योगदान और संघर्ष नई पीढ़ी तक पहुंचना चाहिए।

हालांकि सावरकर के राजनीतिक विचार और बाद के सार्वजनिक जीवन को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक दलों में मतभेद रहे हैं। इसलिए उनके नाम का इस्तेमाल केवल ऐतिहासिक सम्मान के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक वैचारिक बहस के संदर्भ में भी किया जाता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम भी चर्चा में

पोर्ट ब्लेयर और अंडमान-निकोबार का इतिहास नेताजी सुभाष चंद्र बोस से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का दौरा किया था। उन्होंने इन द्वीपों को स्वतंत्र भारत की संघर्ष गाथा से जोड़ने का प्रयास किया और यहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

नेताजी के समर्थकों का मानना है कि अंडमान की राष्ट्रीय स्मृति में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार ने भी समय-समय पर द्वीपों और उनके स्थानों के नाम नेताजी से जोड़कर उनके योगदान को स्मरण किया है।

भाजपा नेताओं का तर्क है कि देश के इतिहास में नेताजी जैसे व्यक्तित्वों को भी राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सम्मान दिया जाना चाहिए। दूसरी तरफ कांग्रेस अपने ऐतिहासिक संबंध और स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका को प्रमुखता देती रही है।

सरदार पटेल की विरासत

भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा बनता है। उन्हें भारतीय रियासतों के एकीकरण में निर्णायक भूमिका के लिए याद किया जाता है। इसी कारण उन्हें अक्सर “लौह पुरुष” के रूप में संबोधित किया जाता है।

सरदार पटेल का कांग्रेस से गहरा संबंध था और वे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। आज भाजपा भी उनके योगदान को राष्ट्रीय एकता और मजबूत प्रशासन के प्रतीक के रूप में प्रमुखता से सामने रखती है।

गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण भी सरदार पटेल की विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की दिशा में एक बड़ा कदम रहा। इसके बाद पटेल की राजनीतिक विरासत को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच अलग-अलग दावे और राजनीतिक बहस देखने को मिली।

क्या ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को राजनीति से ऊपर रखा जा सकता है?

पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट के नाम से जुड़ा विवाद एक बड़ा सवाल भी सामने रखता है—क्या स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण से जुड़े महान व्यक्तित्वों को राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर रखकर देखा जाना चाहिए?

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अनेक धाराओं और विचारों से मिलकर बना था। इसमें कांग्रेस के नेताओं के साथ क्रांतिकारी, समाज सुधारक, सैनिक, किसान नेता और विभिन्न वैचारिक धाराओं से जुड़े लोग शामिल थे। इसलिए इतिहास को केवल एक राजनीतिक संगठन या विचारधारा तक सीमित करके देखना उचित नहीं माना जा सकता।

सावरकर, नेताजी, पटेल, गांधी, भगत सिंह और अन्य नेताओं की भूमिकाएं अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित हुईं। प्रत्येक का अपना राजनीतिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक योगदान था। लोकतांत्रिक समाज में इन सभी व्यक्तित्वों पर बहस संभव है, लेकिन उनके योगदान का मूल्यांकन तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर होना आवश्यक है।

नाम बदलने की राजनीति से आगे बढ़ने की जरूरत

भारत में सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलना नई बात नहीं है। अलग-अलग सरकारों के समय सड़कों, शहरों, संस्थानों और हवाई अड्डों के नाम बदले जाते रहे हैं। इसके पीछे कभी ऐतिहासिक कारण होते हैं तो कभी राजनीतिक प्राथमिकताएं।

लेकिन जनता के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि किसी नाम के पीछे छिपे इतिहास को समझा जाए। केवल नाम बदलने या किसी नाम को बनाए रखने से इतिहास नहीं बदलता। इतिहास को समझने के लिए दस्तावेजों, घटनाओं और विभिन्न दृष्टिकोणों का अध्ययन जरूरी है।

पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट के नाम का मामला भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सावरकर का नाम अंडमान के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास से जुड़ा है, जबकि नेताजी और सरदार पटेल की विरासत भी भारतीय राष्ट्र निर्माण की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निष्कर्ष

पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे के नाम से जुड़ा मुद्दा भारत की राजनीति में इतिहास और विचारधारा के संबंध को उजागर करता है। सावरकर के नाम को लेकर राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन अंडमान की धरती पर उनके कारावास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी तरह नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान भी भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण विरासत है।

जरूरत इस बात की है कि देश अपने स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चश्मे से देखने के बजाय व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में समझे। अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े इन महान व्यक्तित्वों के योगदान, मतभेद और सीमाओं पर तथ्य आधारित चर्चा होनी चाहिए।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक संघर्ष स्वाभाविक है, लेकिन इतिहास किसी एक दल की संपत्ति नहीं होता। सावरकर हों, नेताजी हों या सरदार पटेल—इन सभी के जीवन और योगदान का निष्पक्ष अध्ययन नई पीढ़ी को भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्र निर्माण की जटिल यात्रा को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है। यही इतिहास के प्रति वास्तविक सम्मान भी होगा।

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