मार्च 21, 2026

दिल्ली उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय: यूएपीए मामलों में जमानत पर संतुलित दृष्टिकोण

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20 मार्च 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हारिस निसार लंगू बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी तथा संबंधित अपीलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसने यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट और संतुलित रूप में प्रस्तुत किया। न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की पीठ ने यह निर्णय देते हुए न केवल कानूनी पहलुओं पर विचार किया, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को भी रेखांकित किया।

इस मामले में अपीलकर्ता हारिस निसार लंगू और जमीन आदिल भट पर आरोप था कि वे एक व्यापक आतंकी साजिश का हिस्सा थे, जिसमें सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया गया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अनुसार, यह साजिश पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों और उनके नेटवर्क द्वारा संचालित थी, जिसमें “हाइब्रिड कैडर” और “ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs)” की भूमिका भी शामिल थी।

हालांकि, अदालत ने यह पाया कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य मुख्यतः डिजिटल सामग्री, सोशल मीडिया गतिविधियों और सीमित कॉल डिटेल रिकॉर्ड पर आधारित थे। अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि अपीलकर्ताओं पर न तो किसी हिंसक घटना में प्रत्यक्ष भागीदारी का आरोप है और न ही वे किसी आतंकी हमले के निष्पादन में शामिल पाए गए।

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यूएपीए की धारा 43D(5) की व्याख्या है, जो जमानत देने पर कड़ा प्रतिबंध लगाती है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर “प्रथम दृष्टया सत्य” का परीक्षण आवश्यक है, लेकिन यह परीक्षण सतही नहीं होना चाहिए और प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका के आधार पर किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी माना कि अपीलकर्ता लगभग चार वर्षों से अधिक समय से हिरासत में हैं और मुकदमे की गति अत्यंत धीमी है। 300 से अधिक गवाहों की सूची और अब तक बहुत कम गवाहों की जांच को देखते हुए अदालत ने माना कि मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है। इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि केवल वैचारिक सहानुभूति या डिजिटल सामग्री का कब्जा किसी व्यक्ति को आतंकी संगठन का सक्रिय सदस्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उसका सीधा संबंध किसी आतंकवादी कृत्य से स्थापित न हो। यह टिप्पणी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक दायित्व के बीच एक महत्वपूर्ण रेखा खींचती है।

इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण गवाह द्वारा आरोपी की पहचान न कर पाना, कॉल रिकॉर्ड की सीमित अवधि, और सह-आरोपियों को मिली जमानत जैसे कारकों ने भी अदालत के निर्णय को प्रभावित किया। हारिस निसार लंगू की खराब स्वास्थ्य स्थिति को भी अदालत ने एक सहायक कारक के रूप में स्वीकार किया।

अंततः, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ताओं की भूमिका सीमित है और उनकी निरंतर हिरासत न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करती। इसलिए उन्हें सख्त शर्तों के साथ जमानत देने का आदेश दिया गया, जिसमें पासपोर्ट जमा करना, नियमित पुलिस स्टेशन में उपस्थिति दर्ज कराना, सोशल मीडिया गतिविधियों पर प्रतिबंध और गवाहों से संपर्क न करने जैसी शर्तें शामिल हैं।

यह निर्णय यूएपीए जैसे कठोर कानून के अंतर्गत भी न्यायिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों की गुणवत्ता, आरोपी की भूमिका और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए निर्णय देता है।

इस फैसले का व्यापक प्रभाव भविष्य के यूएपीए मामलों पर पड़ सकता है, विशेष रूप से उन मामलों में जहां आरोप मुख्यतः डिजिटल गतिविधियों और वैचारिक सामग्री पर आधारित हों। यह निर्णय न्यायपालिका की उस संवेदनशीलता को दर्शाता है, जो सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

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