दिल्ली हाईकोर्ट ने NHAI बनाम GMR हाईवेज मामले में मध्यस्थता अवॉर्ड रद्द किया
नई दिल्ली। ने एक महत्वपूर्ण फैसले में (NHAI) और “GMR Highways Limited” (https://www.gmrgroup.in/highways.aspx?utm_source=chatgpt.com) के बीच चल रहे विवाद में मध्यस्थता ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए अवॉर्ड को रद्द कर दिया। यह फैसला 6 मई 2026 को न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने सुनाया।

मामला तमिलनाडु में राष्ट्रीय राजमार्ग-45 के तांबरम से टिंडीवनम खंड के विकास से जुड़ा था। यह परियोजना बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) मॉडल पर विकसित की गई थी। वर्ष 2001 में NHAI और GMR हाईवेज के बीच रियायत समझौता हुआ था, जिसके तहत कंपनी को सड़क निर्माण, संचालन और रखरखाव का कार्य सौंपा गया था।
विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब GMR हाईवेज ने दावा किया कि आयकर अधिनियम के अंतर्गत न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT), फ्रिंज बेनिफिट टैक्स (FBT) और सेवा कर (ST) की दरों में बदलाव के कारण उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। कंपनी ने इन अतिरिक्त खर्चों की प्रतिपूर्ति के लिए NHAI से लगभग 14.51 करोड़ रुपये की मांग की थी।
मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने कंपनी के दावे को स्वीकार करते हुए भुगतान का आदेश दिया था। इसके खिलाफ NHAI ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। NHAI का कहना था कि कंपनी ने अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए और यह साबित नहीं किया कि उसने बढ़ी हुई कर दरों के अनुसार वास्तव में भुगतान किया था।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि GMR हाईवेज ने केवल सारणीबद्ध आंकड़े पेश किए, लेकिन कर भुगतान की रसीदें, रिटर्न या अन्य ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं रखे। अदालत ने कहा कि केवल दावा प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे प्रमाणित करना भी आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी माना कि मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने NHAI द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। विशेष रूप से सेवा कर से संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं का उल्लेख और परीक्षण फैसले में नहीं किया गया, जो कि गंभीर त्रुटि मानी गई।
अपने निर्णय में अदालत ने कहा कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 31(3) के तहत प्रत्येक अवॉर्ड का कारणयुक्त होना जरूरी है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के दिया गया अवॉर्ड “पेटेंट इल्लीगैलिटी” की श्रेणी में आता है और उसे रद्द किया जा सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अंततः माना कि ट्रिब्यूनल का फैसला पर्याप्त साक्ष्यों और स्पष्ट कारणों के अभाव में टिक नहीं सकता। इसी आधार पर अदालत ने मध्यस्थता अवॉर्ड को निरस्त कर दिया।
यह फैसला सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं और BOT मॉडल के अंतर्गत होने वाले कर विवादों के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में मध्यस्थता मामलों में साक्ष्य और कारणयुक्त आदेशों की आवश्यकता और अधिक मजबूत होगी।
