इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय: जीतू शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (9 मार्च 2026)
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 9 मार्च 2026 को आरोपी जीतू शर्मा द्वारा दायर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। यह मामला केस क्राइम नंबर 236/2025 से संबंधित है, जो मथुरा जिले के फराह थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) और 87 के तहत आरोप लगाए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि
एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी का अपहरण आरोपी जीतू शर्मा द्वारा किया गया है। इस आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच शुरू की।
आरोपी पक्ष की दलील
आवेदक के अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि उनके मुवक्किल को गलत तरीके से इस मामले में फंसाया गया है और उसने कोई अपराध नहीं किया है। उन्होंने यह भी बताया कि पीड़िता के बयान, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 और 183 के अंतर्गत दर्ज किए गए हैं, में अपहरण का कोई आरोप नहीं लगाया गया है।
पीड़िता ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि वह स्वयं अपनी इच्छा से आरोपी के साथ जयपुर गई थी और आरोपी ने उसके साथ कोई गलत व्यवहार नहीं किया। उसने यह भी कहा कि वह आरोपी से प्रेम करती है।
इसके अतिरिक्त, बचाव पक्ष ने बताया कि आरोपी 15 जून 2025 से जेल में बंद है और मुकदमे के अंतिम निर्णय में अभी काफी समय लग सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आरोपी को जमानत दी जाती है तो उसके न्याय से भागने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की संभावना नहीं है।
राज्य पक्ष की आपत्ति
सरकार की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता (एजीए) ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मुकदमे के प्रारंभिक चरण में आरोपी की निर्दोषता का निर्णय नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी आशंका व्यक्त की कि जमानत मिलने पर आरोपी फिर से ऐसे ही अपराध कर सकता है और जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर सकता है।
न्यायालय का विचार
न्यायमूर्ति संतोष राय ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि यद्यपि आरोपी का नाम एफआईआर में दर्ज है, लेकिन पीड़िता के बयानों में अपहरण के आरोप का समर्थन नहीं किया गया है। पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी।
न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में 29 जून 2025 को आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। इसलिए साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना कम है। साथ ही मुकदमे के समाप्त होने में अनिश्चित समय लग सकता है।
न्यायालय ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई शामिल हैं।
न्यायालय का आदेश
उपरोक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने बिना मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी किए आरोपी जीतू शर्मा को जमानत देने का आदेश दिया। इसके लिए उसे व्यक्तिगत बांड और समान राशि के दो जमानतदार प्रस्तुत करने होंगे।
जमानत की शर्तें
न्यायालय ने जमानत देते समय कुछ शर्तें भी निर्धारित कीं:
- आरोपी साक्ष्यों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करेगा और न ही गवाहों को धमकाएगा।
- वह अदालत में गवाहों की उपस्थिति के समय अनावश्यक स्थगन (अजर्नमेंट) की मांग नहीं करेगा।
- मुकदमे की प्रत्येक निर्धारित तारीख पर आरोपी को अदालत में उपस्थित रहना होगा।
- विशेष रूप से मुकदमे की शुरुआत, आरोप तय होने और आरोपी के बयान दर्ज होने के समय उसे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना अनिवार्य होगा।
- यदि आरोपी जमानत का दुरुपयोग करता है, तो ट्रायल कोर्ट उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन शर्तों का उल्लंघन किया जाता है तो जमानत रद्द की जा सकती है। साथ ही आरोपी और जमानतदारों की पहचान तथा निवास संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन संबंधित अदालत द्वारा किया जाएगा।
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