चित्रकूट: मऊ ब्लॉक के लपांव गांव की गौशाला पर गंभीर सवाल, ताले में बंद मिली व्यवस्था; मवेशियों की देखरेख को लेकर उठे सवाल
एक्सपर्ट टेक:
गौशाला जैसी सार्वजनिक व्यवस्था में केवल भवन, रिकॉर्ड या जियो-टैगिंग पर्याप्त नहीं है। वास्तविक मूल्यांकन पशुओं की मौजूदगी, चारा-पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य सेवाओं और नियमित निगरानी के आधार पर होना चाहिए। लपांव गौशाला को लेकर सामने आए आरोपों की निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में कोई अंतर है या नहीं। जांच के दौरान वित्तीय दस्तावेजों और निरीक्षण रिपोर्ट का भी सत्यापन किया जाना चाहिए।

चित्रकूट। मऊ विकासखंड की ग्राम पंचायत लपांव स्थित गौशाला की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। स्थानीय स्तर पर सामने आई ग्राउंड रिपोर्ट में गौशाला के संचालन, पशुओं की देखरेख, साफ-सफाई, चारे-पानी और जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सुबह के समय जब मीडिया टीम मौके पर पहुंची तो गौशाला का मुख्य द्वार बंद मिला। परिसर में केवल एक बछड़ा दिखाई दिया, जबकि अन्य मवेशियों की मौजूदगी नहीं मिली।
यह स्थिति सामने आने के बाद सरकारी स्तर पर गौशाला संचालन को लेकर किए जा रहे दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
सुबह के समय बंद मिला गौशाला का मुख्य द्वार
ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, सुबह करीब 8:30 बजे मीडिया टीम लपांव गांव की गौशाला पहुंची। मौके पर गौशाला का मुख्य गेट बंद था। परिसर के अंदर एक बछड़े के अलावा किसी अन्य मवेशी के दिखाई देने की बात कही गई है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि गौशाला में नियमित रूप से पशुओं का संरक्षण किया जा रहा है, तो सुबह के समय वहां उनकी पर्याप्त संख्या क्यों नहीं दिखाई दी? साथ ही, गेट बंद रहने और मौके पर किसी कर्मचारी के मौजूद नहीं होने की स्थिति ने भी गौशाला की दैनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।
गौशाला जैसी जगह पर सुबह का समय पशुओं की देखभाल के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान पशुओं को चारा, पानी और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना आवश्यक होता है। ऐसे में मौके पर कथित रूप से कर्मचारियों की अनुपस्थिति चिंता का विषय बन गई है।
चारे और पानी की व्यवस्था पर भी सवाल
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गौशाला परिसर में पर्याप्त मात्रा में चारा-भूसा और पीने के पानी की व्यवस्था दिखाई नहीं दी। यदि यह स्थिति सही पाई जाती है तो यह सीधे तौर पर पशुओं की देखभाल से जुड़े इंतजामों पर सवाल खड़ा करती है।
गौशाला में रखे जाने वाले पशुओं के लिए नियमित भोजन और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था होना जरूरी है। इसके अलावा परिसर की सफाई, पशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी और बीमार अथवा कमजोर पशुओं के उपचार की व्यवस्था भी गौशाला संचालन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल भवन या चारदीवारी तैयार कर देने से गौशाला की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। वास्तविक व्यवस्था का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि वहां मौजूद पशुओं को रोजमर्रा की आवश्यक सुविधाएं कितनी प्रभावी ढंग से मिल रही हैं।
जियो-टैगिंग और रिकॉर्ड को लेकर उठे सवाल
ग्राउंड रिपोर्ट में गौशाला से संबंधित जियो-टैगिंग और सरकारी रिकॉर्ड की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कागजी प्रक्रिया पूरी करने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि मौके पर वास्तविक व्यवस्थाएं अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं।
जियो-टैगिंग जैसी तकनीकी व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक परिसंपत्तियों की निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाना है। लेकिन यदि किसी स्थान की डिजिटल तस्वीर और वास्तविक स्थिति में अंतर हो, तो इसकी जांच आवश्यक हो जाती है।
इसी वजह से ग्रामीणों और स्थानीय स्तर पर सक्रिय लोगों की मांग है कि गौशाला के रिकॉर्ड, पशुओं की संख्या, चारे की खरीद, पानी की व्यवस्था, कर्मचारियों की उपस्थिति और संबंधित भुगतान की जानकारी की जांच की जाए।
क्या खुले में छोड़े जा रहे हैं मवेशी?
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि गौशाला में रखे जाने वाले मवेशियों को सुबह के समय खुले जंगल या अन्य स्थानों पर छोड़ दिया जाता है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह गौशाला के मूल उद्देश्य पर गंभीर प्रश्न खड़ा करेगा।
गौशालाओं का उद्देश्य बेसहारा और निराश्रित गोवंश को सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना है। यदि पशुओं को दोबारा खुले में छोड़ दिया जाता है तो वे खेतों, सड़कों और आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच सकते हैं। इससे किसानों की फसलों को नुकसान होने के साथ-साथ सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है।
हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष किसी स्वतंत्र और आधिकारिक जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
ग्राम पंचायत से लेकर अधिकारियों तक निगरानी पर सवाल
मामले में ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी सुरेंद्र सिंह पटेल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके साथ ही ब्लॉक विकास अधिकारी और जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़े हुए हैं।
किसी भी सरकारी गौशाला के बेहतर संचालन के लिए ग्राम पंचायत, विकास विभाग और पशुपालन विभाग के बीच समन्वय आवश्यक होता है। यदि नियमित निरीक्षण और निगरानी प्रभावी तरीके से हो तो चारा, पानी, पशुओं की संख्या, स्वास्थ्य सेवाओं और कर्मचारियों की उपस्थिति जैसी व्यवस्थाओं की स्थिति समय-समय पर सामने आ सकती है।
ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की जांच की जाती है।
पशु चिकित्सा विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में
रिपोर्ट में पशु चिकित्सा विभाग से जुड़े अधिकारियों और डॉक्टरों की निगरानी को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। कथित तौर पर नियमित निरीक्षण केवल औपचारिकता तक सीमित रहने की बात कही गई है।
गौशाला में पशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है। बीमार पशुओं की पहचान, उपचार, टीकाकरण और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना पशुपालन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि निरीक्षण वास्तव में नियमित होते हैं, तो निरीक्षण रिपोर्ट में पशुओं की संख्या, स्वास्थ्य, भोजन, पानी और साफ-सफाई की स्थिति का उल्लेख होना चाहिए। इसलिए जांच के दौरान पिछले निरीक्षणों के रिकॉर्ड को भी देखा जाना उपयोगी होगा।
सरकारी धन के इस्तेमाल की हो जांच
गौशाला संचालन में सरकारी धन का उपयोग होने के कारण वित्तीय पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। रिपोर्ट में बजट के कथित दुरुपयोग और बंदरबांट के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। चारा खरीद, पशुओं की संख्या, श्रमिकों के भुगतान, रखरखाव, पानी और अन्य मदों में खर्च की जानकारी का मिलान जमीन पर उपलब्ध सुविधाओं से किया जा सकता है।
यदि रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर मिलता है, तो संबंधित विभाग को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
जिलाधिकारी से निष्पक्ष जांच की मांग
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग से निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। मांग है कि संबंधित अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंचकर गौशाला की वास्तविक स्थिति का सत्यापन करे।
जांच के दौरान गौशाला में मौजूद पशुओं की संख्या, चारा-पानी, कर्मचारियों की उपस्थिति, सफाई, पशु चिकित्सा रिकॉर्ड, जियो-टैगिंग, सरकारी भुगतान और निरीक्षण रिपोर्ट की जांच की जा सकती है।
साथ ही ग्रामीणों के बयान दर्ज किए जाने से भी वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।
जांच से सामने आ सकता है पूरा सच
लपांव की गौशाला से सामने आई शिकायतें केवल एक स्थानीय व्यवस्था का सवाल नहीं हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और जवाबदेही से भी जुड़ी हैं। यदि आरोप गलत हैं तो आधिकारिक जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और संबंधित व्यवस्था पर लगे सवालों का जवाब मिल सकेगा। वहीं यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।
फिलहाल सबसे जरूरी है कि मामले को आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय दस्तावेजी और भौतिक सत्यापन कराया जाए। गौशाला में रहने वाले पशु अपनी समस्याएं स्वयं सामने नहीं रख सकते। इसलिए उनकी देखभाल की जिम्मेदारी संभालने वाली व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
रिपोर्ट: पंकज त्रिपाठी, तहसील संवाददाता
प्रकाशन: हिट एंड हॉट न्यूज़
स्थान: मऊ, जनपद चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
दिनांक: 11 अगस्त 2026