खैरई में मनरेगा कार्य पर उठे सवाल, रिकॉर्ड में 42 श्रमिकों की मौजूदगी लेकिन मौके पर काम नहीं दिखने का आरोप
अरुण कुमार मिश्रा
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ जालौन
संपर्क मार्ग के निर्माण को लेकर ग्रामीणों ने मांगी जांच, मस्टररोल और जमीनी स्थिति में अंतर की शिकायत
महेवा, जालौन। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने और गांवों में बुनियादी ढांचे को विकसित करने के उद्देश्य से संचालित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों की निगरानी को लेकर महेवा विकासखंड की ग्राम पंचायत खैरई में सवाल खड़े हुए हैं। गांव के कुछ ग्रामीणों ने एक संपर्क मार्ग से जुड़े कार्य में अभिलेखों में दर्ज श्रमिकों की उपस्थिति और मौके पर दिखाई देने वाली स्थिति के बीच कथित अंतर होने का आरोप लगाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित मार्ग के निर्माण कार्य में रिकॉर्ड के अनुसार मजदूरों की उपस्थिति दर्ज की जा रही है, लेकिन स्थल पर अपेक्षित स्तर की निर्माण गतिविधियां दिखाई नहीं दे रही हैं। इसी आधार पर ग्रामीणों ने संबंधित अधिकारियों से मामले की स्थलीय जांच कराने की मांग की है।
ग्रामीणों के मुताबिक जांच के दौरान मस्टररोल, डिजिटल उपस्थिति, कार्य की स्वीकृति, मौके पर हुई प्रगति और मजदूरी भुगतान से जुड़े अभिलेखों का आपस में मिलान किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि रिकॉर्ड और जमीन की वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद ही मामले की सही तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
बल्लू प्रणामी के घेरा से हरिनारायण के खेत तक मार्ग का मामला
बताया जा रहा है कि शिकायत ग्राम खैरई में बल्लू प्रणामी के घेरा से हरिनारायण के खेत की दिशा में जाने वाले संपर्क मार्ग से संबंधित है। ग्रामीणों के अनुसार इस रास्ते के विकास के लिए मनरेगा के अंतर्गत कार्य प्रस्तावित अथवा स्वीकृत किया गया है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी रिकॉर्ड में जिस तरह कार्य आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है, मौके पर उसकी समान स्थिति नजर नहीं आती। ग्रामीणों का तर्क है कि यदि रास्ते पर लगातार श्रमिक लगाए गए हैं तो वहां मिट्टी भराई, रास्ते की सफाई, समतलीकरण या अन्य निर्धारित कार्यों के निशान दिखाई देने चाहिए।
इसी कथित अंतर को लेकर ग्रामीणों ने अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि जांच टीम मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करे और अभिलेखों में दर्ज विवरण से उसका मिलान करे।
पांच मस्टररोल का किया जा रहा उल्लेख
मामले में सामने आए विवरण के अनुसार संबंधित कार्य से जुड़े अलग-अलग मस्टररोल का उल्लेख किया जा रहा है। इनमें मस्टररोल संख्या 2220, 2221, 2222, 2223 और 2356 शामिल बताई गई हैं।
इसके साथ ही कार्य का वर्क कोड 3138008026/RC/VB/YD/958486255824288061 बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन अभिलेखों में प्रतिदिन 42 श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज होने की बात कही जा रही है।
यही आंकड़ा ग्रामीणों के सवालों का प्रमुख आधार बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रतिदिन 42 श्रमिक निर्धारित कार्यस्थल पर काम कर रहे थे, तो उनके द्वारा किए जा रहे श्रम का प्रभाव रास्ते की स्थिति में दिखाई देना स्वाभाविक है।
हालांकि केवल मस्टररोल में उपस्थिति दर्ज होने से यह स्वतः साबित नहीं होता कि भुगतान भी उसी आधार पर हुआ है या कार्य की पूरी प्रगति दर्ज विवरण के अनुरूप है। इन बिंदुओं की पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच के माध्यम से ही हो सकती है।
मजदूरी को लेकर केवल अनुमान, भुगतान की पुष्टि जांच से होगी
ग्रामीणों की ओर से सामने रखे गए आंकड़ों के आधार पर 42 श्रमिकों और प्रतिदिन 300 रुपये की मजदूरी को लेकर एक गणितीय अनुमान भी लगाया जा रहा है। इस हिसाब से 42 श्रमिकों की एक दिन की मजदूरी 12,600 रुपये होती है। यदि यही संख्या 14 दिनों तक मानी जाए तो अनुमानित रकम 1,76,400 रुपये बनती है।
लेकिन यह आंकड़ा केवल गणितीय गणना है। इसे वास्तविक सरकारी भुगतान नहीं माना जा सकता। वास्तविक मजदूरी कितने श्रमिकों को मिली, कितने दिन की उपस्थिति स्वीकृत हुई और कितनी धनराशि का भुगतान हुआ, इसका पता संबंधित सरकारी भुगतान और मस्टररोल रिकॉर्ड की जांच से ही चलेगा।
ग्रामीणों की मांग है कि यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी निर्धारित की जाए।
मौके पर झाड़ियां और विलायती बबूल होने का दावा
स्थानीय ग्रामीणों ने संबंधित रास्ते की मौजूदा स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस मार्ग पर मनरेगा के माध्यम से काम होने की बात कही जा रही है, वहां वर्तमान में निर्माण कार्य के स्पष्ट संकेत दिखाई नहीं देते।
बल्लू प्रणामी सहित कुछ ग्रामीणों के अनुसार उनके घेरा से हरिनारायण के खेत की तरफ जाने वाले रास्ते पर नियमित मजदूरी कार्य होने के अनुरूप गतिविधियां नजर नहीं आतीं। ग्रामीणों का कहना है कि रास्ते के आसपास झाड़ियां और विलायती बबूल बढ़े हुए हैं, जिससे मार्ग की स्थिति भी प्रभावित हो रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले इस रास्ते पर मिट्टी डालकर कच्चे मार्ग का स्वरूप तैयार किया गया था, लेकिन उसके बाद रास्ते के रखरखाव और विकास को लेकर पर्याप्त काम नहीं दिखाई दिया।
हालांकि रास्ते की मौजूदा स्थिति और पूर्व में हुए कार्य की वास्तविक जानकारी का निर्धारण विभागीय स्थल निरीक्षण से ही किया जा सकता है।
डिजिटल हाजिरी व्यवस्था पर भी ग्रामीणों ने उठाए प्रश्न
मनरेगा में श्रमिकों की उपस्थिति और कार्य की निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि तकनीकी व्यवस्था का उद्देश्य तभी प्रभावी माना जाएगा, जब रिकॉर्ड में दर्ज श्रमिकों की उपस्थिति और वास्तविक कार्यस्थल की स्थिति में तालमेल हो।
खैरई के ग्रामीणों ने इसी बिंदु को लेकर जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी दिन बड़ी संख्या में श्रमिकों की डिजिटल उपस्थिति दर्ज हुई है तो उस दिन कार्यस्थल पर उनकी मौजूदगी और किए गए कार्य की स्थिति का भी सत्यापन किया जा सकता है।
ग्रामीणों का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्ड, मस्टररोल और स्थल निरीक्षण को एक साथ देखने से किसी भी शिकायत की वास्तविकता सामने लाने में मदद मिल सकती है।
मानवेंद्र उर्फ कन्तू ने भी जांच की मांग की
ग्रामीण मानवेंद्र उर्फ कन्तू ने भी संबंधित कार्य की जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि उन्होंने हाल के दिनों में इस रास्ते पर अपेक्षित संख्या में मजदूरों को काम करते हुए नहीं देखा।
उनके अनुसार जब रिकॉर्ड में लगातार श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज होने की जानकारी सामने आई तो मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्थल निरीक्षण जरूरी हो गया।
उन्होंने मांग की है कि अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंचकर यह देखे कि स्वीकृत कार्य वास्तव में कितना हुआ है और रिकॉर्ड में दर्ज श्रमिकों की उपस्थिति वास्तविक स्थिति से मेल खाती है या नहीं।
जांच में इन बिंदुओं की हो सकती है पड़ताल
ग्रामीणों की शिकायत के बाद यदि विभागीय जांच होती है तो कई बिंदुओं का परीक्षण महत्वपूर्ण रहेगा। इनमें संबंधित मस्टररोल, डिजिटल हाजिरी, कार्य की स्वीकृत लागत, निर्धारित कार्य की प्रकृति, मौके पर निर्माण की वास्तविक प्रगति, श्रमिकों की मौजूदगी और मजदूरी भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा यह भी देखा जा सकता है कि स्वीकृत कार्य के अनुरूप निर्धारित अवधि में कितना काम हुआ और उसके संबंध में विभागीय स्तर पर कौन-कौन से अभिलेख तैयार किए गए।
जांच के बाद ही स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति
मनरेगा जैसी योजना में सार्वजनिक धन के साथ ग्रामीणों के रोजगार का मुद्दा भी जुड़ा होता है। इसलिए किसी भी शिकायत की स्थिति में रिकॉर्ड और स्थल की वास्तविकता का निष्पक्ष मिलान महत्वपूर्ण हो जाता है।
बताया गया है कि मामले में खंड विकास अधिकारी की ओर से जांच का भरोसा दिया गया है। अब यह देखना होगा कि जांच के दौरान संबंधित दस्तावेजों के साथ मौके की स्थिति का कितना विस्तृत सत्यापन किया जाता है।
यदि जांच में ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार जिम्मेदारी निर्धारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण में कार्य सही पाया जाता है तो ग्रामीणों के सामने भी वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
फिलहाल खैरई के इस मनरेगा कार्य को लेकर ग्रामीणों की नजर जांच प्रक्रिया पर है। मस्टररोल में दर्ज 42 श्रमिकों की उपस्थिति, डिजिटल रिकॉर्ड, कार्य की वास्तविक प्रगति और मजदूरी भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और मौके पर काम कम दिखाई देने के पीछे वास्तविक कारण क्या है।