हिमाचल प्रदेश की बाढ़ त्रासदी और प्रधानमंत्री की चुप्पी पर विवाद: एक गंभीर चिंतन

7 जुलाई, 2025 को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को लेकर तीव्र आलोचना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने अमेरिका के टेक्सास राज्य में आई बाढ़ के पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की, लेकिन अपने ही देश के हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले में बाढ़ से हुई तबाही और लोगों की मौत पर एक शब्द तक नहीं कहा।
खेड़ा ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “भारत के प्रधानमंत्री ने मंडी के लोगों के लिए संवेदना का एक शब्द भी नहीं कहा, जहां 70 से अधिक लोगों के मरने की आशंका है, जबकि टेक्सास में आई बाढ़ से उन्हें गहरा दुख है।”
हिमाचल प्रदेश में तबाही का मंजर
हिमाचल प्रदेश में इस बार मानसून ने विकराल रूप धारण किया है। 20 जून से शुरू हुए बारिश के मौसम में अब तक राज्य में 78 लोगों की जान जा चुकी है। इन मौतों में 50 की वजह सीधी बारिश से जुड़ी घटनाएं हैं जैसे कि बादल फटना, भूस्खलन, बाढ़ और बिजली गिरना, जबकि 28 लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 23 बार फ्लैश फ्लड, 19 बादल फटने की घटनाएं और 16 बड़े भूस्खलन हो चुके हैं। मौसम विभाग (IMD) ने 6 और 7 जुलाई को “बेहद भारी बारिश, आंधी, बिजली और तूफ़ान” की चेतावनी दी थी। 8 और 9 जुलाई के लिए भी भारी बारिश का अनुमान जताया गया है।
मंडी सबसे अधिक प्रभावित
मंडी ज़िले में सबसे ज़्यादा जानें गईं — कुल 17 मौतें। इसके बाद कांगड़ा में 11 मौतें दर्ज की गईं। अन्य प्रभावित ज़िलों में कुल्लू, चंबा और शिमला शामिल हैं, जहां प्रत्येक में 3-3 लोगों की मृत्यु हुई।
प्राकृतिक आपदा से हुई इन मौतों में 14 लोग फ्लैश फ्लड में बह गए, 8 की मौत डूबने से हुई, और 8 लोग करंट लगने या गिरने जैसी घटनाओं का शिकार हुए। इसके अलावा कुछ लोगों की मौत भूस्खलन, बिजली गिरने और यहां तक कि साँप के काटने से भी हुई।
राजनीतिक संवेदनशीलता बनाम मानवीय संवेदना
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे नेता अपने ही देश के नागरिकों की पीड़ा को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? क्या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संवेदना दिखाना देश के नागरिकों की उपेक्षा का संकेत है?
पवन खेड़ा की आलोचना केवल राजनीतिक आरोप नहीं बल्कि एक भावनात्मक सवाल भी है — क्या एक लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री अपने देशवासियों की त्रासदी पर चुप रह सकता है, जबकि विदेशों की घटनाओं पर सक्रियता दिखाता है?
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश की यह त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि शासन, संवेदना और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने वाली घटना है। जब देश के नागरिक जीवन और मृत्यु के संघर्ष से जूझ रहे हों, तब नेताओं से केवल राहत कार्य नहीं बल्कि मानवीय संवेदनशीलता की भी उम्मीद की जाती है।
सरकार और समाज दोनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न केवल रोकी जाएं, बल्कि पीड़ितों को तुरंत और प्रभावी सहायता भी मिले — संवेदनाओं और कार्यों दोनों के स्तर पर।
