वनों के प्रकार

पृथ्वी पर जीवन का आधार केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण जैव जगत है। इस जीवन-चक्र को संतुलित बनाए रखने में वनों की भूमिका सबसे अहम है। ये न केवल हमें शुद्ध वायु, लकड़ी और औषधियाँ देते हैं, बल्कि जलचक्र को नियंत्रित करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और असंख्य जीव-जंतुओं का आश्रय स्थल भी हैं। जलवायु और स्थानिक परिस्थितियों के आधार पर वनों को कई प्रकारों में बाँटा जाता है।
1. सदाबहार वर्षावन
ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षभर अधिक वर्षा होती है। यहाँ की वनस्पति सघन और सदाबहार होती है। पेड़ों की ऊँचाई सामान्य से कहीं अधिक होती है तथा इनके नीचे धूप बहुत कम पहुँचती है। भारत में यह वन मुख्यतः पश्चिमी घाट, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते हैं।
2. पर्णपाती वन
इन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है। वर्षा ऋतु में ये हरे-भरे रहते हैं, जबकि गर्मियों में पत्तियाँ झड़ जाती हैं ताकि पेड़ पानी की कमी सहन कर सकें। सागौन, साल, शीशम और बांस जैसे वृक्ष यहाँ प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। मध्य भारत और उत्तर भारत के कई भागों में इन वनों का विस्तार है।
3. कांटेदार और झाड़ीदार वन
ये वन कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। यहाँ पेड़ों की पत्तियाँ मोटी, कांटेदार तथा छोटी होती हैं ताकि पानी का अपव्यय कम हो सके। राजस्थान, गुजरात और दक्षिणी हरियाणा में इस प्रकार के वन पाए जाते हैं।
4. पर्वतीय वन
जिन क्षेत्रों में ऊँचाई के कारण तापमान कम और जलवायु ठंडी होती है, वहाँ पर्वतीय वन विकसित होते हैं। निचली पहाड़ियों पर पर्णपाती वृक्ष और ऊँचाई बढ़ने पर देवदार, चीड़ और फर जैसे शंकुधारी वृक्ष मिलते हैं। हिमालयी क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है।
5. तटीय एवं दलदली वन
इन्हें मैंग्रोव वन भी कहा जाता है। ये समुद्री तटों और नदीमुखों पर पाए जाते हैं जहाँ खारा पानी और दलदली मिट्टी होती है। इन वनों के पेड़ों की जड़ें बाहर की ओर निकली होती हैं जिन्हें ‘श्वसन मूल’ कहा जाता है। सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) इस वन का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
निष्कर्ष
वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पृथ्वी के जीवन-संरक्षक तंत्र हैं। विभिन्न प्रकार के वनों ने हमारी जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध किया है। इसलिए हमें इनके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरोहर सुरक्षित रह सके।
