मार्च 29, 2026

असम के कार्बी आंगलोंग में अंधविश्वास का कहर

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जादू-टोना के आरोप में दंपति की हत्या, समाज और कानून दोनों के लिए चेतावनी

असम का कार्बी आंगलोंग जिला हाल ही में एक ऐसे अमानवीय कृत्य का साक्षी बना, जिसने आधुनिक समाज के भीतर छिपे अंधविश्वास और सामूहिक हिंसा के खतरनाक स्वरूप को उजागर कर दिया। बेलोगुरी मुंडा गांव में जादू-टोना करने के संदेह मात्र पर एक निर्दोष दंपति को ग्रामीणों ने मौत के घाट उतार दिया। यह घटना न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि यह प्रश्न भी खड़े करती है कि विज्ञान और शिक्षा के युग में भी ऐसी मानसिकता कैसे जीवित है।


घटना की पृष्ठभूमि

30 दिसंबर की रात गांव में अचानक तनाव का माहौल बन गया। आरोप है कि कुछ ग्रामीणों ने 46 वर्षीय गार्डी बेरुवा और उनकी पत्नी मीरा बेरुवा को अपशकुन और बीमारी फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। बिना किसी प्रमाण या कानूनी प्रक्रिया के, भीड़ ने न्यायाधीश की भूमिका निभाते हुए हिंसा का रास्ता चुना। दोनों की हत्या के बाद उनके शवों को घर के आंगन में जला दिया गया, जिससे अपराध की भयावहता और भी गहरी हो गई।


पुलिस को कैसे मिली जानकारी

रात लगभग 8:25 बजे पुलिस को गांव में गंभीर हिंसा की सूचना मिली। जब टीम मौके पर पहुंची, तो घर क्षतिग्रस्त अवस्था में था और आंगन में आग के अवशेष मौजूद थे। प्रारंभिक जांच ने स्पष्ट कर दिया कि यह कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित सामूहिक अपराध है।


जांच और गिरफ्तारी

असम पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक 18 आरोपियों को हिरासत में लिया है, जिनमें चार महिलाएं भी शामिल हैं। घटनास्थल से कई वस्तुएं जब्त की गईं, जिनका इस्तेमाल सबूत मिटाने के लिए किया गया हो सकता है। जांच एजेंसियां फोरेंसिक और वैज्ञानिक तरीकों से पूरे मामले की तह तक जाने का प्रयास कर रही हैं।

आईजीपी (कानून एवं व्यवस्था) अखिलेश कुमार सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार की हिंसा के प्रति राज्य में कोई सहनशीलता नहीं है और दोषियों को कड़ी सजा दिलाई जाएगी।


कानूनी कार्रवाई का दायरा

मामले में असम विच हंटिंग निषेध अधिनियम के तहत स्वतः संज्ञान लेते हुए केस दर्ज किया गया है। इसके अतिरिक्त भारतीय न्याय संहिता की कठोर धाराएं भी लागू की गई हैं, ताकि यह संदेश जाए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है—न ही व्यक्ति, न ही भीड़।


सामाजिक चिंतन की आवश्यकता

यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता का आईना है। अंधविश्वास के नाम पर हिंसा यह दर्शाती है कि कुछ समुदायों में आज भी भय और अफवाह तर्क पर भारी पड़ जाते हैं। जब समाज में संवाद, शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की कमी होती है, तब ऐसी त्रासदियां जन्म लेती हैं।


निष्कर्ष

कार्बी आंगलोंग की यह त्रासदी हमें चेतावनी देती है कि विकास केवल सड़कों और इमारतों से नहीं होता, बल्कि सोच के स्तर पर भी परिवर्तन आवश्यक है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई कानून, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता—तीनों के सम्मिलित प्रयास से ही जीती जा सकती है। जब तक हम चुप रहेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी। अब समय है कि समाज विवेक और मानवता के पक्ष में मजबूती से खड़ा हो।


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