सुरजकुंड शिल्प मेला: सांस्कृतिक उल्लास के बीच सुरक्षा की अनदेखी एक चेतावनी

हरियाणा के फरीदाबाद ज़िले में आयोजित होने वाला सुरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला भारत के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। देश-विदेश के कारीगर, लोक कलाकार और पर्यटक इस मंच पर भारतीय लोक परंपराओं की विविध छटा देखते हैं। लेकिन 39वें संस्करण के दौरान झूले से जुड़ी एक दर्दनाक दुर्घटना ने इस उत्सवपूर्ण माहौल को अचानक शोक में बदल दिया।
इस हादसे में ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस निरीक्षक की जान चली गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए। घटना के बाद प्रशासन ने झूला क्षेत्र को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया, हालांकि मेले की बाकी गतिविधियाँ निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रखी गई हैं।
हादसे का व्यापक अर्थ
यह घटना केवल एक तकनीकी त्रुटि या अलग-थलग दुर्घटना नहीं है। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है कि क्या बड़े सार्वजनिक आयोजनों में सुरक्षा को पर्याप्त गंभीरता से लिया जा रहा है। सुरजकुंड मेला लाखों आगंतुकों को आकर्षित करता है, ऐसे में सुरक्षा में छोटी-सी चूक भी बड़े परिणाम ला सकती है।
जहाँ यह मेला भारतीय संस्कृति और हस्तशिल्प की पहचान है, वहीं ऐसी घटनाएँ इसकी विश्वसनीयता और आयोजन व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं।
प्रशासन के त्वरित कदम
दुर्घटना के तुरंत बाद प्रशासन ने हालात को संभालने के लिए कई निर्णय लिए—
- झूले और उससे जुड़े पूरे क्षेत्र को बंद किया गया
- सभी मनोरंजन साधनों की सुरक्षा जाँच के आदेश दिए गए
- संबंधित झूला संचालक पर कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई
- यह स्पष्ट किया गया कि शेष कार्यक्रमों की सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त किया जाएगा
ये कदम आवश्यक हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम पहले उठाए जा सकते थे?
समाज के लिए सीख
उत्सव, मेले और सांस्कृतिक आयोजन समाज को जोड़ते हैं, आनंद देते हैं और परंपराओं को जीवित रखते हैं। परंतु जब आनंद के नाम पर सुरक्षा से समझौता किया जाता है, तो वही उत्सव पीड़ा का कारण बन जाता है। यह घटना याद दिलाती है कि सुरक्षा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आयोजन की मूल शर्त होनी चाहिए।
भविष्य की दिशा
ऐसी त्रासदियों से बचने के लिए कुछ ठोस कदम ज़रूरी हैं—
- पूर्व परीक्षण अनिवार्य हो: मेले में लगाए जाने वाले हर झूले और उपकरण का तकनीकी ऑडिट पहले ही कराया जाए
- जवाबदेही तय हो: आयोजक, ठेकेदार और संचालक—सभी की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट की जाए
- आपात प्रबंधन मजबूत हो: मेडिकल सहायता और रेस्क्यू टीम हर समय सक्रिय रहें
- तकनीक का उपयोग: सेंसर, सीसीटीवी और अलर्ट सिस्टम से जोखिम की पहचान पहले की जा सके
निष्कर्ष
सुरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है। यह आवश्यक है कि इसकी पहचान केवल रंग-बिरंगे स्टॉल और लोकनृत्य तक सीमित न रहे, बल्कि सुरक्षित आयोजन का उदाहरण भी बने। इस घटना से सीख लेकर यदि सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए, तो भविष्य में ऐसा कोई उत्सव दुखद स्मृति में नहीं बदलेगा।
उत्सव तभी सार्थक हैं, जब घर लौटते समय हर आगंतुक सुरक्षित और संतुष्ट हो।
