आर्मेनियाई नरसंहार और अमेरिकी राजनीति: सत्य, संवेदना और कूटनीति के बीच टकराव

अमेरिका की राजनीति में आर्मेनियाई नरसंहार (1915) की आधिकारिक मान्यता एक ऐसा प्रश्न रहा है, जो इतिहास, नैतिकता और विदेश नीति—तीनों को एक साथ छूता है। हाल के दिनों में इस मुद्दे ने एक बार फिर सुर्खियाँ तब बटोरीं, जब उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस से जुड़ी एक सोशल मीडिया पोस्ट को हटाए जाने पर तीखी बहस शुरू हो गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ओटोमन साम्राज्य में आर्मेनियाई समुदाय को बड़े पैमाने पर हिंसा, हत्या और जबरन विस्थापन का सामना करना पड़ा।
- अनेक इतिहासकारों और मानवाधिकार संस्थाओं के अनुसार, यह घटनाक्रम नरसंहार की परिभाषा के अंतर्गत आता है।
- अमेरिका की संसद (कांग्रेस) ने वर्षों की बहस के बाद 2019 में इसे औपचारिक मान्यता दी।
- इसके बाद 2021 में तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन ने सार्वजनिक रूप से “आर्मेनियाई नरसंहार” शब्द का प्रयोग कर अमेरिकी रुख को और स्पष्ट किया।
ताज़ा विवाद की जड़
हालिया घटनाक्रम में उपराष्ट्रपति वेंस द्वारा एक स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित करने और सोशल मीडिया पर 1915 की घटनाओं को नरसंहार कहने का उल्लेख सामने आया।
- कुछ ही समय बाद यह पोस्ट हटा ली गई, जिसने सवाल खड़े कर दिए कि क्या यह प्रशासनिक दबाव था या कूटनीतिक सावधानी।
- डेमोक्रेटिक नेता और पूर्व स्पीकर नैन्सी पेलोसी सहित कई नेताओं ने इस कदम पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि ऐतिहासिक सच्चाई से पीछे हटना पीड़ितों की स्मृति और मानवाधिकारों के मूल्यों दोनों के लिए नुकसानदेह है।
अमेरिकी राजनीति और विदेश नीति पर असर
यह विवाद केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं है।
- तुर्की के साथ अमेरिका के रणनीतिक रिश्तों में यह मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है।
- मानवाधिकार समर्थकों का तर्क है कि ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना नैतिक साहस का प्रतीक है।
- वहीं कुछ नीति-निर्माता इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन बिगाड़ने वाला कदम मानते हैं।
व्यापक संदेश
आर्मेनियाई नरसंहार की चर्चा यह स्पष्ट करती है कि इतिहास को मान्यता देना सिर्फ अतीत को देखने की बात नहीं है, बल्कि यह वर्तमान नीतियों और भविष्य के वैश्विक आचरण को भी दिशा देता है। एक ट्वीट का हटना भले ही छोटी बात लगे, लेकिन उसके पीछे छिपा संदेश बताता है कि राजनीति में आज भी सत्य और कूटनीति के बीच खींचतान जारी है।
