ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज का समाधि संस्कार एवं विशाल भंडारा संपन्न, संत समाज ने अर्पित की श्रद्धांजलि
अमरेश त्रिपाठी
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात
लुधियाना/जगराओं, पंजाब। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के वरिष्ठ संत ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज के कैलाशवास के उपरांत पंजाब के जगराओं क्षेत्र में सनातन संन्यास परंपरा के अनुरूप विधि-विधान से समाधि संस्कार संपन्न हुआ। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे संत-महंतों, महामंडलेश्वरों, महंतों, शिष्यों और श्रद्धालुओं ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। समाधि संस्कार के बाद संत समाज और श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज का जीवन सनातन धर्म, गुरु-परंपरा, संत समाज और श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा की सेवा के प्रति समर्पित रहा। उनके कैलाशवास के बाद अहमदाबाद, गुजरात से उनकी पार्थिव देह को पंजाब लाया गया। इसके बाद जूना अखाड़े की संन्यास परंपरा के अनुसार समाधि संस्कार की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की गई।
संत समाज की मौजूदगी में हुआ धार्मिक आयोजन
समाधि संस्कार का यह आयोजन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री एवं श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरि गिरि महाराज के मार्गदर्शन तथा संत समाज के सान्निध्य में संपन्न हुआ। पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों के अलावा देश के विभिन्न राज्यों से जूना अखाड़ा से जुड़े संत-महंत और पदाधिकारी कार्यक्रम में पहुंचे।
समारोह में उपस्थित संतों ने ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज के व्यक्तित्व और उनके धार्मिक योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि संत परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना जाता है। गुरु के जीवन और उनके कार्यों से शिष्यों तथा समाज को दिशा मिलती है। इसी भाव के साथ संत समाज ने दिवंगत संत को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम में श्रीमहंत पृथ्वी गिरि महाराज, महामंडलेश्वर परमानंद गिरि महाराज, महामंडलेश्वर कन्हैया नंद गिरि महाराज, महामंडलेश्वर ब्रह्मानंद गिरि महाराज, महंत रसानंद गिरि महाराज, जो जूना अखाड़ा के सचिव हैं, श्रीमहंत राम नारायण गिरि महाराज, महंत जसविंदर गिरि महाराज, महंत अरुण गिरि महाराज, महंत सत्यानंद गिरि महाराज, महाकाल गिरि महाराज, नीलकंठ गिरि महाराज, महेश गिरि महाराज, शैलेंद्र गिरि महाराज, श्रीमहंत कंचन गिरि महाराज, माधवानंद गिरि महाराज, महादेवानंद गिरि महाराज, श्रीमहंत गिरिशानंद गिरि महाराज तथा महामंडलेश्वर पवित्रनंद गिरि महाराज सहित अनेक संत-महंत उपस्थित रहे।
गुरु-सेवा और धर्म के प्रति समर्पित रहा जीवन
संत समाज के अनुसार ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज ने अपने जीवन में गुरु-सेवा और धार्मिक परंपराओं को विशेष महत्व दिया। उन्होंने संत जीवन के अनुशासन का पालन करते हुए सनातन धर्म और अखाड़े की परंपराओं के संरक्षण में योगदान दिया। उनके संपर्क में रहने वाले शिष्यों और श्रद्धालुओं के लिए उनका जीवन आध्यात्मिक मार्गदर्शन का माध्यम रहा।
जूना अखाड़ा भारतीय संन्यास परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अखाड़े से जुड़े संत धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से सनातन परंपराओं को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं। इसी परंपरा में श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज का योगदान उनके अनुयायियों द्वारा श्रद्धा के साथ याद किया गया।
समाधि संस्कार के दौरान संतों ने उनके तप, साधना, गुरु निष्ठा और धार्मिक सेवा को स्मरण किया। संत समाज ने कहा कि किसी संत का भौतिक जीवन समाप्त होने के बाद भी उनकी शिक्षाएं, संस्कार और सेवा की भावना उनके शिष्यों तथा अनुयायियों के माध्यम से आगे बढ़ती रहती है।
शिष्यों ने गुरु चरणों में अर्पित की श्रद्धांजलि
ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज के शिष्य शिव गिरि महाराज सहित उनके अन्य शिष्यों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में श्रद्धा व्यक्त की। गुरु के कैलाशवास से शिष्यों में शोक का भाव रहा, लेकिन समाधि संस्कार के अवसर पर उन्होंने संत परंपरा के प्रति अपनी आस्था और गुरु के बताए मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प भी व्यक्त किया।
समाधि संस्कार के बाद आयोजित भंडारे में संतों, शिष्यों और श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। संत परंपरा में भंडारे को सेवा, समरसता और श्रद्धा से जोड़कर देखा जाता है। इस आयोजन के माध्यम से भी उपस्थित लोगों ने ब्रह्मलीन संत की स्मृति को नमन किया।
श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने जताया शोक
इस अवसर पर श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके निधन को जूना अखाड़ा और संत समाज के लिए बड़ी क्षति बताया। उन्होंने कहा कि दौलत गिरि महाराज का जीवन गुरु निष्ठा, तपस्या, धार्मिक समर्पण और अखाड़े की सेवा की भावना से जुड़ा रहा।
श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि संत का जीवन केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनता है। श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज ने जिस प्रकार गुरु परंपरा और सनातन धर्म की सेवा को अपने जीवन में स्थान दिया, वह संत समाज के लिए स्मरणीय रहेगा।
उन्होंने कहा कि ब्रह्मलीन संत की स्मृतियां उनके शिष्यों और अनुयायियों को धर्म एवं सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। उनके द्वारा निभाई गई जिम्मेदारियों और संत परंपरा के प्रति उनकी निष्ठा को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
संत परंपरा के संरक्षण का संदेश
समाधि संस्कार के अवसर पर एक ओर जहां संत समाज ने ब्रह्मलीन महाराज को भावभीनी श्रद्धांजलि दी, वहीं दूसरी ओर सनातन संत परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने का संदेश भी सामने आया। संतों ने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण आधारशिला है। इसके माध्यम से धार्मिक ज्ञान, संस्कार और सेवा की भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।
कार्यक्रम में शामिल संतों और श्रद्धालुओं ने ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज की आत्मिक शांति की कामना की। साथ ही उनके द्वारा अपनाई गई धर्म और सेवा की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया।
समाधि संस्कार और भंडारे के साथ यह धार्मिक आयोजन श्रद्धा, गुरु-भक्ति और संत परंपरा के प्रति सम्मान का महत्वपूर्ण अवसर बना। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे संत-महंतों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को व्यापक आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया। ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज के शिष्यों और अनुयायियों के लिए यह अवसर भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण रहा।
संत समाज का मानना है कि महान संतों का जीवन उनके शरीर तक सीमित नहीं रहता। उनके विचार, साधना, संस्कार और सेवा कार्य उनके अनुयायियों के माध्यम से निरंतर जीवित रहते हैं। इसी भावना के साथ संतों ने ब्रह्मलीन श्रीमहंत दौलत गिरि महाराज को नमन करते हुए उनकी धर्मसेवा की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।