एटा में फर्जी मेडिकल यूनिवर्सिटी का खुलासा, चाय बेचने वाले के नाम पर था संस्थान; छात्रों से करोड़ों की ठगी का आरोप

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एटा, उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के एटा जिले में कथित फर्जी मेडिकल यूनिवर्सिटी और शैक्षणिक संस्थान के नाम पर छात्रों से धोखाधड़ी किए जाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस जांच तेज हो गई है। पुलिस के अनुसार, जिस संस्थान को “बीएस मेडिकल कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी” के नाम से संचालित किए जाने का आरोप है, वहां विभिन्न मेडिकल और पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में दाखिले के नाम पर विद्यार्थियों से बड़ी रकम वसूली गई। प्रारंभिक जांच में ठगी की रकम एक करोड़ रुपये से अधिक होने की बात सामने आई है।

मामले की शुरुआत एक कथित अपहरण की सूचना से हुई। पुलिस को बताया गया कि संस्थान से जुड़े बताए जा रहे सत्येंद्र कुमार का अपहरण हो गया है। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ी तो कथित अपहरण की कहानी में कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे पुलिस को पूरे घटनाक्रम पर संदेह हुआ।

पुलिस के मुताबिक, सत्येंद्र कुमार ने कथित तौर पर छात्रों और उनके अभिभावकों के बढ़ते दबाव से बचने के लिए अपहरण का नाटक रचा था। बताया गया कि संस्थान में जिन विद्यार्थियों के दाखिले कराए गए थे, उनमें से कुछ के प्रवेश रद्द होने के बाद फीस वापस करने की मांग उठने लगी थी। इसी दबाव के बीच कथित अपहरण की कहानी सामने आई।

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दाखिले और डिग्री के नाम पर कथित नेटवर्क

जांच में पुलिस को कथित तौर पर पता चला कि यह नेटवर्क वर्ष 2022 से सक्रिय था। आरोप है कि इसके जरिए विद्यार्थियों को अलग-अलग मेडिकल एवं पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने का भरोसा दिया जाता था। इनमें डी-फार्मा, बी-फार्मा, बीएससी नर्सिंग, जीएनएम, एएनएम और डीएमएलटी जैसे पाठ्यक्रम शामिल बताए गए हैं।

छात्रों को संस्थान की मान्यता, पाठ्यक्रम की वैधता और भविष्य में मिलने वाली डिग्री या प्रमाणपत्र को लेकर भरोसा दिलाए जाने का आरोप है। दाखिले के बाद विद्यार्थियों से फीस और अन्य मदों में रकम ली गई। जब कुछ छात्रों को संस्थान की गतिविधियों और उनके दाखिले की स्थिति पर संदेह हुआ, तब कथित तौर पर फीस वापसी की मांग शुरू हुई।

पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई के मुताबिक, इस पूरे मामले में एक करोड़ रुपये से अधिक की रकम छात्रों से लिए जाने की आशंका है। हालांकि, वास्तविक रकम कितनी है और कितने विद्यार्थी इस कथित नेटवर्क से प्रभावित हुए हैं, इसका अंतिम आंकड़ा जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

सबसे चौंकाने वाला पहलू—कथित मालिक निकला चाय विक्रेता

मामले में जांच के दौरान सामने आई जानकारी ने पुलिस और स्थानीय लोगों को भी हैरान कर दिया। पुलिस के अनुसार, जिस कथित विश्वविद्यालय के संचालन को लेकर जांच चल रही है, उसका पंजीकरण भगवान दास नाम के व्यक्ति के नाम से बताया गया।

जांच में पुलिस को पता चला कि भगवान दास स्थानीय स्तर पर चाय बेचने का काम करते हैं। यानी जिस नाम का इस्तेमाल कथित तौर पर एक बड़े शैक्षणिक संस्थान के मालिक के रूप में किया गया, वह व्यक्ति वास्तव में चाय विक्रेता बताया जा रहा है।

इस खुलासे ने पूरे संस्थान की वैधता और उसके संचालन से जुड़े दस्तावेजों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि भगवान दास के नाम का इस्तेमाल किस परिस्थिति में किया गया और क्या उन्हें संस्थान के वास्तविक संचालन तथा उससे जुड़े कथित वित्तीय लेन-देन की जानकारी थी।

पांच लोगों की गिरफ्तारी

पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी है। गिरफ्तार आरोपियों में सत्येंद्र कुमार के अलावा गौरव अग्रवाल का नाम भी सामने आया है। गौरव अग्रवाल को कथित तौर पर संस्थान का संचालक बताया जा रहा है।

जांच में यह भी आरोप सामने आया कि संस्थान में कुछ लोगों को शिक्षक या फैकल्टी सदस्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। पुलिस ने ऐसे कथित रूप से फैकल्टी की भूमिका निभाने वाले तीन अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया है।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ कर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि संस्थान का संचालन किस तरह किया जाता था, विद्यार्थियों से रकम कैसे वसूली जाती थी और दाखिले तथा डिग्री से संबंधित दस्तावेज किस माध्यम से तैयार या उपलब्ध कराए जाते थे।

कथित अपहरण ने खोली पूरे मामले की परतें

इस मामले का सबसे असामान्य हिस्सा कथित अपहरण की घटना रही। सामान्य तौर पर अपहरण की सूचना मिलने पर पुलिस का ध्यान किसी अपराधी द्वारा पीड़ित व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या फिरौती मांगने की ओर जाता है। लेकिन इस मामले में जांच के दौरान पुलिस को कथित तौर पर पता चला कि अपहरण की कहानी वास्तविक नहीं थी।

पुलिस के अनुसार, सत्येंद्र कुमार पर छात्रों की ओर से फीस लौटाने का दबाव था। इसी स्थिति से बचने के लिए कथित रूप से अपहरण का नाटक किया गया। जब पुलिस ने घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ना शुरू किया तो कथित साजिश का खुलासा हुआ।

इसके बाद पुलिस ने संस्थान से जुड़े लोगों और उसके दस्तावेजों की जांच शुरू की। इसी क्रम में कथित फर्जी विश्वविद्यालय संचालन और विद्यार्थियों से पैसे लेने का मामला सामने आया।

छात्रों के भविष्य पर सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण चिंता उन विद्यार्थियों को लेकर है, जिन्होंने कथित संस्थान में पैसा देकर दाखिला लिया था। यदि जांच में संस्थान या उसके द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों की वैधता पर सवाल सही साबित होते हैं, तो विद्यार्थियों के सामने पढ़ाई, फीस और प्रमाणपत्र से संबंधित गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि संस्थान में कुल कितने छात्रों का दाखिला हुआ था। इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि विद्यार्थियों को कौन-कौन से दस्तावेज दिए गए और उन दस्तावेजों का किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय, बोर्ड या नियामक संस्था से कोई संबंध था या नहीं।

दस्तावेजों की भी होगी जांच

जांच एजेंसियां कथित संस्थान से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों को खंगाल रही हैं। इनमें प्रवेश फॉर्म, फीस रसीद, पहचान संबंधी दस्तावेज, पाठ्यक्रम से जुड़े कागजात और विद्यार्थियों को दिए गए प्रमाणपत्र शामिल हो सकते हैं।

जांच का एक अहम हिस्सा यह भी होगा कि जिन पाठ्यक्रमों के नाम पर विद्यार्थियों को दाखिला दिया गया, वे वास्तव में संबंधित नियामक संस्थाओं से मान्य थे या नहीं। यदि किसी दस्तावेज में फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है, तो मामले में आगे और धाराएं जुड़ सकती हैं।

कितने लोग हुए प्रभावित, जांच के बाद होगा स्पष्ट

फिलहाल पुलिस की कार्रवाई शुरुआती चरण में है। एक करोड़ रुपये से अधिक की कथित ठगी और कई पाठ्यक्रमों में दाखिले की बात सामने आने के बाद जांच का दायरा बढ़ गया है। अधिकारियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि इस नेटवर्क ने कितने विद्यार्थियों को प्रभावित किया और कितनी धनराशि एकत्र की।

पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ संस्थान के संचालन, उसके दस्तावेजों और आर्थिक लेन-देन से संबंधित जानकारी जुटा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस कथित नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और इसकी गतिविधियां किस स्तर तक फैली हुई थीं।

एटा का यह मामला विद्यार्थियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में सामने आया है कि किसी भी मेडिकल या पैरामेडिकल पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने से पहले संस्थान की मान्यता, विश्वविद्यालय की वैधता और संबंधित नियामक संस्था की स्वीकृति की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। फिलहाल पुलिस जांच जारी है और मामले से जुड़े आगे के तथ्यों का इंतजार किया जा रहा है।

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