जेपीएनआईसी को 30–35 साल की लीज पर देने का फैसला, अखिलेश यादव ने सरकार को घेरा; निजीकरण पर तेज हुई सियासी बहस

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। राज्य सरकार ने इस महत्वपूर्ण परिसर को निजी कंपनियों को लंबी अवधि की लीज पर देने का निर्णय लिया है। प्रस्ताव के मुताबिक परिसर का संचालन करीब 30 से 35 वर्षों तक निजी कंपनियों के हाथ में रहेगा। कुछ शर्तों के तहत लीज की अवधि को आगे भी बढ़ाया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि इससे लंबे समय से अधूरे पड़े निर्माण कार्य पूरे होंगे, परिसर का बेहतर संचालन हो सकेगा और सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। वहीं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस फैसले पर कड़ा विरोध जताते हुए भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है।

अखिलेश यादव ने उठाए निजीकरण पर सवाल

जेपीएनआईसी को निजी हाथों में सौंपने के फैसले ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार की नीति पर सवाल खड़े करते हुए इसे सरकारी संपत्तियों को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सौंपने की दिशा में उठाया गया कदम बताया है।

अखिलेश यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि सवाल यह है कि सरकार आखिर सरकार है या दुकानदार। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक संपत्तियों को लगातार निजी कंपनियों के हवाले किया जाता रहा तो आने वाले समय में सरकार के पास बेचने या ठेके पर देने के लिए ही सब कुछ बच जाएगा। सपा प्रमुख ने इस पूरी प्रक्रिया को निजीकरण और कथित कमीशन आधारित व्यवस्था से जोड़ते हुए भाजपा सरकार की नीतियों पर निशाना साधा।

उनका विरोध केवल लीज की अवधि को लेकर नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि जिस परियोजना को समाजवादी सरकार के कार्यकाल में विकसित किया गया था, उसे अब निजी कंपनियों के संचालन में क्यों दिया जा रहा है।

क्या है जेपीएनआईसी की कहानी?

लखनऊ के गोमती नगर क्षेत्र में स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर को आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक बहुउद्देश्यीय परिसर के तौर पर विकसित किया गया था। इसका उद्घाटन वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुआ था।

परियोजना की मूल योजना के अनुसार इस केंद्र को सांस्कृतिक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, खेल गतिविधियों और संग्रहालय जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाना था। इसे आधुनिक शहर लखनऊ की पहचान से जोड़कर भी देखा गया।

परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत लगभग 265 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि समय बीतने के साथ निर्माण और विकास पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया और अब तक इस परियोजना पर 800 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की बात सामने आती रही है। इसके बावजूद परिसर की कई सुविधाएं पूरी तरह विकसित या नियमित रूप से संचालित नहीं हो सकीं।

यही वजह है कि जेपीएनआईसी को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस लंबे समय से जारी है।

निजी कंपनियों को मिलेगी लंबी अवधि की लीज

सरकार की योजना के अनुसार जेपीएनआईसी के बड़े हिस्से को निजी कंपनियों के संचालन के लिए लीज पर दिया जाएगा। इसके लिए वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड का नाम सामने आया है।

लीज की अवधि लगभग 30 से 35 वर्ष रखे जाने की बात है। निर्धारित शर्तों के आधार पर इसे आगे करीब 25 वर्षों तक बढ़ाने का विकल्प भी मौजूद रहेगा। यानी यह व्यवस्था अल्पकालिक नहीं बल्कि कई दशकों तक चलने वाली हो सकती है।

बताया गया है कि संबंधित कंपनियां लीज के तहत करीब 831 करोड़ रुपये का भुगतान करेंगी। इसके अलावा लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी एलडीए को समय के साथ बढ़ती हुई वार्षिक राशि भी प्राप्त होगी। सरकार इसे सार्वजनिक संपत्ति से दीर्घकालिक राजस्व हासिल करने का माध्यम मान रही है।

परिसर में क्या-क्या सुविधाएं हैं?

जेपीएनआईसी को केवल एक सामान्य भवन के रूप में नहीं बनाया गया था। इसके परिसर में कई प्रकार की सुविधाओं को शामिल किया गया है। इनमें ऑडिटोरियम, कन्वेंशन सेंटर, होटल, पार्किंग और खेल संबंधी ढांचे प्रमुख हैं।

परिसर में 107 कमरों वाला होटल भी शामिल है। इसके अलावा मल्टी-लेवल पार्किंग की सुविधा, विभिन्न खेल गतिविधियों के लिए कोर्ट और अन्य सुविधाएं मौजूद हैं। इनका व्यवस्थित संचालन होने पर परिसर को सम्मेलन, पर्यटन, मनोरंजन और खेल गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

हालांकि संग्रहालय ब्लॉक का संचालन लखनऊ विकास प्राधिकरण के पास ही रहने की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि पूरे परिसर का नियंत्रण एक ही संस्था के पास नहीं रहेगा, बल्कि अलग-अलग हिस्सों के संचालन की व्यवस्था अलग हो सकती है।

सरकार के फैसले से क्या हो सकते हैं फायदे?

सरकार के सामने सबसे बड़ा तर्क यह है कि जेपीएनआईसी पर पहले ही बड़ी राशि खर्च हो चुकी है, लेकिन परियोजना का पूरा लाभ अभी तक नहीं मिल पाया है। निजी भागीदारी के जरिए इसे दोबारा सक्रिय करने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रस्ताव के अनुसार निजी कंपनियां अगले दो वर्षों में करीब 200 से 250 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करके शेष निर्माण और विकास कार्य पूरा करेंगी। यदि यह योजना निर्धारित समय में पूरी होती है तो वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजना को नया स्वरूप मिल सकता है।

इसके अलावा सरकार को लीज राशि के रूप में बड़ी रकम प्राप्त होगी। वार्षिक भुगतान से भी एलडीए को लंबे समय तक आय होने की संभावना है। इस तरह सरकार के अनुसार पहले किए गए बड़े निवेश की आंशिक या पर्याप्त भरपाई भी हो सकती है।

सरकारी कार्यक्रमों के लिए साल में लगभग 50 दिनों तक परिसर का निशुल्क इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। इससे सरकार को बड़े आयोजनों के लिए एक आधुनिक स्थान उपलब्ध रहेगा।

खेल सुविधाओं के मामले में खिलाड़ियों को रियायती सदस्यता देने की व्यवस्था भी बताई गई है। यदि इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है तो परिसर का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहेगा।

निजीकरण को लेकर क्या हैं आशंकाएं?

दूसरी ओर, इस फैसले के सामने कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सार्वजनिक संपत्ति के व्यावसायिक इस्तेमाल का है। आलोचकों का तर्क है कि निजी कंपनी का प्राथमिक उद्देश्य व्यावसायिक लाभ कमाना होगा। ऐसे में आम नागरिकों की पहुंच और सुविधाओं की कीमत को लेकर भविष्य में सवाल उठ सकते हैं।

यदि होटल, सम्मेलन केंद्र, खेल सुविधाओं और अन्य स्थानों का शुल्क बढ़ता है तो सामान्य वर्ग के लोगों के लिए इनका इस्तेमाल मुश्किल हो सकता है। इसलिए लीज समझौते में जनता, खिलाड़ियों और सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के हितों की स्पष्ट सुरक्षा महत्वपूर्ण होगी।

दूसरा बड़ा प्रश्न इतनी लंबी लीज अवधि को लेकर है। 30 से 35 वर्ष का समय किसी भी सरकारी संपत्ति के लिए काफी लंबा माना जा सकता है। इसलिए भविष्य में सरकारों की प्राथमिकताएं बदलने पर भी इस समझौते का असर बना रह सकता है।

राजनीतिक विवाद क्यों बढ़ सकता है?

जेपीएनआईसी केवल एक भवन या व्यावसायिक परिसर नहीं है। इसका सीधा संबंध पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल से भी रहा है। यही कारण है कि इसे निजी कंपनियों को देने का फैसला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया है।

सपा इसे अपने कार्यकाल की परियोजना बताकर सरकार पर निशाना साध रही है, जबकि मौजूदा सरकार इसे लंबे समय से अधूरे पड़े सार्वजनिक निवेश को उपयोगी बनाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।

जयप्रकाश नारायण के नाम से जुड़े इस केंद्र की सार्वजनिक और सांस्कृतिक पहचान भी बहस का हिस्सा बन सकती है। सवाल यह रहेगा कि क्या निजी संचालन के बावजूद इस परिसर की मूल भावना और सार्वजनिक उपयोगिता को बरकरार रखा जा सकेगा।

आगे क्या होगा?

जेपीएनआईसी की लीज को लेकर आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात इसके समझौते की शर्तों और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। सरकार के लिए जरूरी होगा कि सार्वजनिक हित से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट और पारदर्शी रखा जाए। वहीं विपक्ष और नागरिक समाज की भूमिका यह देखने में महत्वपूर्ण होगी कि तय शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं।

कुल मिलाकर जेपीएनआईसी को लंबी अवधि की लीज पर देने का फैसला उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक संपत्तियों के निजी प्रबंधन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। सरकार इसे अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने, निवेश आकर्षित करने और राजस्व बढ़ाने का रास्ता बता रही है, जबकि विपक्ष इसे सरकारी संपत्ति के निजीकरण के रूप में देख रहा है।

अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि आने वाले वर्षों में जेपीएनआईसी आम जनता, खिलाड़ियों, सांस्कृतिक गतिविधियों और सरकारी आयोजनों के लिए कितना उपयोगी साबित होता है। यदि निजी संचालन के साथ सार्वजनिक हित सुरक्षित रहता है और परिसर की सुविधाएं बेहतर होती हैं, तो यह मॉडल सफल माना जा सकता है। लेकिन यदि व्यावसायिक हित सार्वजनिक उपयोगिता पर हावी होते हैं, तो राजनीतिक विवाद और विरोध दोनों और तेज हो सकते हैं।

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