अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा, हॉरमुज पर टकराव से बढ़ी चिंता; अमेरिकी नौसैनिक तैनाती में बड़ा बदलाव

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। सैन्य गतिविधियों, स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर मतभेद और परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी दबाव ने पश्चिम एशिया की स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हाल के घटनाक्रमों में अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन की लंबे समय से चली आ रही तैनाती के बाद यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन के क्षेत्र में पहुंचने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साथ ही ईरान और ओमान के बीच हॉरमुज जलडमरूमध्य में नौवहन व्यवस्था को लेकर चल रही बातचीत ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि इस संबंध में अंतिम और व्यापक समझौता अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच अस्थायी समुद्री मार्ग पर चर्चा आगे बढ़ रही है।
अमेरिकी नौसैनिक तैनाती में बदलाव
अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी नौसैनिक मौजूदगी को बनाए रखते हुए विमानवाहक पोतों की तैनाती में बदलाव किया है। यूएसएस अब्राहम लिंकन लंबे समय तक क्षेत्र में रहने के बाद राहत पाने की दिशा में बढ़ा है और उसकी जगह यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन पहुंच चुका है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार जॉर्ज वॉशिंगटन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अरब सागर क्षेत्र में पहुंचा है।
लिंकन की तैनाती असाधारण रूप से लंबी रही है। रिपोर्टों के मुताबिक जहाज पर लगभग 5,000 कर्मी हैं और लंबे समय तक समुद्र में रहने के कारण भोजन, रखरखाव और रहने की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा अधिकारियों ने इन रिपोर्टों को कम करके बताया है तथा कुछ दावों को गलत या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है।
इस बदलाव का एक दूसरा रणनीतिक पहलू भी है। जॉर्ज वॉशिंगटन की पहले की तैनाती एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जुड़ी रही है। ऐसे में उसका पश्चिम की ओर आना अमेरिका के सामने मौजूद व्यापक सैन्य प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है।
हॉरमुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा मुद्दा
अमेरिका-ईरान तनाव में स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज इस समय सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दों में से एक है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है और यहां किसी भी लंबे व्यवधान का असर तेल तथा गैस बाजारों पर पड़ सकता है। हाल के महीनों में संघर्ष के कारण इस मार्ग से सामान्य समुद्री यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
ईरान और ओमान के बीच इसी जलडमरूमध्य में एक अस्थायी नौवहन गलियारा तैयार करने को लेकर बातचीत हुई है। 25 अगस्त को दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर फिर चर्चा हुई और प्रस्तावित गलियारे में समुद्री मार्ग से बारूदी सुरंगों को हटाने की प्रक्रिया पर भी बात सामने आई।
ईरान की ओर से पहले कहा गया था कि ओमान के साथ संभावित समझौता अपने आप हॉरमुज को पूरी तरह खोलने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। तेहरान ने अमेरिका से जुड़े व्यापक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को भी इसके साथ जोड़ा है।
ओमान को लेकर ट्रंप की नाराजगी
ईरान और ओमान के बीच समुद्री व्यवस्था को लेकर बातचीत ने अमेरिकी प्रशासन को नाराज किया है। अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओमान के रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। अमेरिकी पक्ष की चिंता यह है कि किसी ऐसी व्यवस्था से ईरान को जलडमरूमध्य में अधिक प्रभाव या प्रबंधन अधिकार मिल सकते हैं, जिसे वॉशिंगटन स्वीकार नहीं करना चाहता।
ओमान लंबे समय से क्षेत्रीय विवादों में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित कराने में भी उसकी भूमिका रही है। इसलिए ओमान और ईरान के बीच हॉरमुज को लेकर समझ बनना एक तरफ कूटनीतिक समाधान की संभावना बढ़ा सकता है, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीतिक चिंताओं को भी जन्म दे सकता है।
कतर ने भी संकेत दिया है कि हॉरमुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच समझौता अमेरिका-ईरान वार्ता को फिर शुरू करने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकता है।
परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका का दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल समुद्री मार्ग तक सीमित नहीं है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह रुख जाहिर करते रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगस्त में भी उन्होंने कहा कि किसी भी संभावित समझौते में ईरान के परमाणु हथियारों का मुद्दा केंद्रीय रहेगा।
ईरान दूसरी ओर अमेरिकी सैन्य दबाव, प्रतिबंधों और आर्थिक नाकेबंदी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। ईरानी अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि वे केवल अस्थायी युद्धविराम के बजाय संघर्ष के स्थायी अंत की मांग कर रहे हैं।
इस स्थिति ने बातचीत की संभावनाओं को जटिल बना दिया है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर जोर दे रहे हैं और भरोसे की कमी किसी भी समझौते के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है।
सैन्य संसाधनों को सुरक्षित रखने की रणनीति
ईरान के संभावित मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे को देखते हुए अमेरिका अपनी सैन्य संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर भी रणनीति बदल रहा है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से चल रही तैनाती ने अमेरिकी सेना पर दबाव बढ़ाया है। इसी कारण कुछ सैन्य संसाधनों को अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थानों पर रखने और यूरोप के सहयोगी ठिकानों का इस्तेमाल करने की रणनीति पर भी चर्चा हुई है।
इटली जैसे यूरोपीय सहयोगी देशों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पहले से है। ऐसे ठिकानों का इस्तेमाल क्षेत्रीय संकट के दौरान सैन्य संचालन और लॉजिस्टिक जरूरतों को संतुलित करने में मदद कर सकता है। हालांकि किसी भी सैन्य पुनर्तैनाती का वास्तविक उद्देश्य और दायरा परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है असर
हॉरमुज का संकट केवल अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी है। इस मार्ग से ऊर्जा संसाधनों का बड़ा हिस्सा दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है। यदि समुद्री यातायात लंबे समय तक बाधित रहता है तो तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
ईरान ने पहले भी संकेत दिए हैं कि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने पर वह समुद्री मार्गों पर दबाव डाल सकता है। हॉरमुज के अलावा खाड़ी क्षेत्र और आसपास के अन्य समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। हालांकि इन दावों और संभावित कार्रवाइयों को वास्तविक स्थिति से अलग करके देखना जरूरी है, क्योंकि किसी बड़े समुद्री अवरोध का असर ईरान सहित पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
कूटनीति ही सबसे सुरक्षित रास्ता
वर्तमान घटनाक्रम से साफ है कि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य शक्ति का प्रदर्शन बढ़ने के साथ-साथ कूटनीतिक विकल्प भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। एक तरफ अमेरिका परमाणु मुद्दे और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कठोर रुख अपना रहा है, वहीं ईरान प्रतिबंधों और सैन्य दबाव को समाप्त करने की मांग कर रहा है।
ओमान और कतर जैसे देश दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता खोलने की कोशिश कर रहे हैं। हॉरमुज को लेकर किसी व्यावहारिक व्यवस्था पर सहमति बनती है तो इससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत मिल सकती है और अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए भी माहौल बेहतर हो सकता है। लेकिन यदि सैन्य धमकियां और समुद्री टकराव बढ़ते हैं, तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया से लेकर विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों देश सैन्य दबाव से आगे बढ़कर बातचीत की मेज पर ठोस समझौते तक पहुंच पाएंगे। अमेरिकी विमानवाहक पोतों की तैनाती में बदलाव, हॉरमुज पर ईरान-ओमान बातचीत और परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी मतभेद बताते हैं कि संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक पहल सफल होती है या तनाव और बढ़ता है, इसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ेगा।