यूक्रेन में चुनाव को लेकर बढ़ी बहस, जेलेंस्की ने युद्ध के बीच मतदान के खतरों पर जताई गंभीर चिंता

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यूक्रेन में रूस के साथ जारी युद्ध के बीच राष्ट्रपति चुनाव कराने का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने युद्ध के दौरान चुनाव कराने की मांग को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं रहेगा, बल्कि सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता और देश की स्थिरता से जुड़ा बेहद जटिल विषय बन जाएगा। हालिया घटनाक्रम ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

युद्ध के बीच चुनाव क्यों बना बड़ा मुद्दा?

रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद यूक्रेन में मार्शल लॉ लागू है। इसी व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय चुनावों को स्थगित किया गया है। यूक्रेन के कानून में मार्शल लॉ के दौरान राष्ट्रपति, संसदीय और स्थानीय चुनाव कराने पर रोक है। इसलिए चुनाव की चर्चा केवल राजनीतिक इच्छा का सवाल नहीं है, बल्कि इसके लिए कानूनी और संवैधानिक परिस्थितियों में भी बदलाव आवश्यक होगा।

2019 में राष्ट्रपति पद संभालने वाले जेलेंस्की का नियमित कार्यकाल 2024 में समाप्त होना था, लेकिन युद्ध और मार्शल लॉ के कारण निर्धारित चुनाव नहीं हो सका। यूक्रेनी व्यवस्था में मार्शल लॉ के दौरान मौजूदा सत्ता संस्थाओं की निरंतरता को बनाए रखने का प्रावधान है। यही वजह है कि जेलेंस्की अभी भी राष्ट्रपति पद पर बने हुए हैं।

जेलेंस्की की मुख्य चिंता क्या है?

जेलेंस्की का कहना है कि युद्ध के दौरान चुनाव कराने से यूक्रेन के भीतर राजनीतिक विभाजन बढ़ सकता है। उनके अनुसार रूस के साथ संघर्ष के बीच देश को राजनीतिक स्थिरता और एकता की आवश्यकता है। उन्होंने हालिया बयान में चेतावनी दी कि वर्तमान परिस्थितियों में चुनाव यूक्रेन को कमजोर करने वाला कदम साबित हो सकता है।

उनकी चिंता केवल चुनावी अभियान तक सीमित नहीं है। यूक्रेन के कई हिस्से युद्ध से प्रभावित हैं, लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं और बड़ी संख्या में नागरिक विदेशों में रह रहे हैं। ऐसे में सभी नागरिकों को समान और सुरक्षित तरीके से मतदान का अवसर देना बड़ी चुनौती होगी।

इसके अलावा युद्ध के दौरान कई क्षेत्रों में मतदान केंद्रों की सुरक्षा, चुनावी बुनियादी ढांचे, मतदाता सूची और उम्मीदवारों के प्रचार अभियान जैसे मुद्दे भी सामने आते हैं। कब्जे वाले या गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की भागीदारी भी एक कठिन सवाल है।

पूर्व रक्षा मंत्री की मांग से बढ़ा राजनीतिक दबाव

चुनाव को लेकर बहस तब और तेज हुई जब पूर्व रक्षा मंत्री मायखाइलो फेदोरोव ने युद्ध के दौरान राष्ट्रपति चुनाव कराने की सार्वजनिक मांग उठाई। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जारी रखने और राजनीतिक जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी मांग को जेलेंस्की सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

फेदोरोव का तर्क है कि युद्ध लोकतांत्रिक संस्थाओं को अनिश्चितकाल तक रोकने का आधार नहीं बनना चाहिए। दूसरी ओर, जेलेंस्की समर्थक पक्ष का कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी ऐसी चुनावी प्रक्रिया जरूरी है जो वास्तव में स्वतंत्र, सुरक्षित और सभी नागरिकों के लिए समान हो।

यही अंतर इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। एक पक्ष लोकतांत्रिक वैधता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की बात कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दे रहा है।

पश्चिमी देशों का दबाव भी महत्वपूर्ण

यूक्रेन में चुनाव का सवाल केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है। अमेरिका और यूरोप सहित यूक्रेन के पश्चिमी साझेदार भी युद्ध समाप्ति और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर चर्चा में शामिल हैं। 2026 में अमेरिकी दबाव के बीच यूक्रेन में चुनाव कराने की संभावना पर कई बार चर्चा हुई है।

पश्चिमी देशों के लिए यूक्रेन की लोकतांत्रिक वैधता महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, युद्ध के दौरान चुनाव कराने की व्यावहारिक कठिनाइयों को भी वे नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि चुनाव कराए जाते हैं और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो इसका असर यूक्रेन की अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ सकता है।

जेलेंस्की ने संकेत दिया है कि यदि पर्याप्त सुरक्षा गारंटी और विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उपलब्ध हो, तो चुनाव पर विचार किया जा सकता है। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई ठोस सुरक्षा ढांचा सामने नहीं आया है जो युद्ध की परिस्थितियों में पूरे देश में चुनाव को सुरक्षित तरीके से सुनिश्चित कर सके।

चुनाव कराने में सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौतियां

यूक्रेन में चुनाव कराने के सामने कई बड़ी समस्याएं हैं। पहली चुनौती सुरक्षा है। युद्ध के दौरान मतदान केंद्रों पर हमले या धमकियों की आशंका लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी चुनौती विस्थापित नागरिक हैं। युद्ध के कारण बड़ी संख्या में लोग देश के भीतर या विदेशों में स्थानांतरित हुए हैं। उनके पंजीकरण और मतदान की व्यवस्था करना आसान नहीं होगा।

तीसरी चुनौती सैनिकों की भागीदारी है। बड़ी संख्या में नागरिक सैन्य सेवा में हैं और अलग-अलग मोर्चों पर तैनात हैं। उनके लिए सुरक्षित मतदान व्यवस्था बनाना भी आवश्यक होगा।

चौथी चुनौती उन क्षेत्रों की है जहां यूक्रेनी सरकार का प्रभाव सीमित है। ऐसे इलाकों में रहने वाले नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया में शामिल करना अत्यंत कठिन हो सकता है।

इसके अलावा चुनाव अभियान के दौरान राजनीतिक दलों को समान अवसर देना भी चुनौतीपूर्ण होगा। युद्धकालीन प्रतिबंधों और सुरक्षा आवश्यकताओं के कारण सभाएं, प्रचार और सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियां सामान्य परिस्थितियों की तरह नहीं हो सकतीं।

जनता क्या चाहती है?

यूक्रेन में जनमत भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिक युद्ध समाप्त होने के बाद चुनाव कराने को प्राथमिकता देते हैं। अगस्त 2026 में सामने आए एक KIIS सर्वेक्षण के अनुसार 57 प्रतिशत लोगों ने कहा कि चुनाव शत्रुता समाप्त होने के बाद होने चाहिए।

इससे संकेत मिलता है कि चुनाव कराने की मांग राजनीतिक स्तर पर जितनी तेज दिखाई दे रही है, आम जनता में उसका समर्थन उतना व्यापक नहीं है। युद्ध की परिस्थितियों में नागरिकों की प्राथमिकताएं सुरक्षा, शांति और स्थिरता से भी जुड़ी हुई हैं।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चुनाव की मांग पूरी तरह समाप्त हो गई है। लंबे समय तक चुनाव न होने से लोकतांत्रिक जवाबदेही, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सत्ता के भविष्य को लेकर सवाल उठते रहेंगे।

रूस के लिए भी यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा

यूक्रेन के चुनाव को लेकर रूस भी लगातार राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश करता रहा है। मॉस्को की ओर से जेलेंस्की की वैधता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन में चुनाव को लेकर विवाद रूस के सूचना अभियान के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।

यही कारण है कि यूक्रेन के सामने दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ अपने लोकतांत्रिक संस्थानों की विश्वसनीयता बनाए रखनी है और दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव का मुद्दा युद्ध के दौरान राजनीतिक अस्थिरता का कारण न बने।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

मौजूदा परिस्थितियों में तत्काल चुनाव की तुलना में युद्ध समाप्त होने या कम से कम प्रभावी युद्धविराम के बाद चुनाव कराने की संभावना अधिक व्यावहारिक दिखाई देती है। जेलेंस्की भी सुरक्षा गारंटी और सुरक्षित राजनीतिक माहौल को महत्वपूर्ण शर्त मानते हैं।

भविष्य में यदि युद्धविराम होता है, तो यूक्रेन को चुनावी कानून, मतदाता सूची, विस्थापित नागरिकों की भागीदारी, सैनिकों के मतदान और विदेशों में रह रहे नागरिकों के अधिकार जैसे मुद्दों पर विस्तृत व्यवस्था बनानी होगी।

साथ ही चुनाव से पहले राजनीतिक दलों को समान अवसर, स्वतंत्र मीडिया और निष्पक्ष प्रचार की गारंटी भी जरूरी होगी। तभी चुनाव के परिणामों को देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता मिल सकेगी।

निष्कर्ष

यूक्रेन में चुनाव को लेकर मौजूदा बहस लोकतंत्र बनाम सुरक्षा की सरल लड़ाई नहीं है। यह एक ऐसी जटिल परिस्थिति है जिसमें संवैधानिक व्यवस्था, युद्ध की वास्तविकता, राष्ट्रीय सुरक्षा, जनता की इच्छा और पश्चिमी देशों की अपेक्षाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

जेलेंस्की का मानना है कि युद्ध के बीच चुनाव कराने से देश की एकता कमजोर हो सकती है, जबकि उनके आलोचक लोकतांत्रिक जवाबदेही और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को लंबे समय तक टालने पर सवाल उठा रहे हैं।

आने वाले समय में इस मुद्दे का समाधान युद्ध की दिशा और संभावित शांति प्रक्रिया पर काफी हद तक निर्भर करेगा। यूक्रेन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखते हुए ऐसा चुनाव कराए, जिसमें सुरक्षा, निष्पक्षता और नागरिकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो। फिलहाल, युद्ध जारी रहने तक चुनाव कराना यूक्रेन के लिए राजनीतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर बेहद कठिन दिखाई देता है।

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