उरई के सिटी सेंटर में साहित्य की महफिल, ‘अर्चना के अक्षत’ पुस्तक का हुआ भव्य विमोचन
अरुण कुमार मिश्रा
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ जालौन
संवेदना साहित्य समिति के आयोजन में देशभर के कवियों ने प्रस्तुत कीं अपनी रचनाएं, गीत, गजल, भक्ति और राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताओं ने श्रोताओं को किया भावविभोर, साहित्यकार डॉ. माया सिंह ‘माया’ की पुस्तक के लोकार्पण ने कार्यक्रम को बनाया विशेष

उरई, जालौन। बुंदेलखंड की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संवेदना साहित्य समिति के तत्वावधान में उरई स्थित सिटी सेंटर में भव्य साहित्यिक समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, कवियों, जनप्रतिनिधियों और साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति के बीच प्रख्यात कवयित्री डॉ. माया सिंह ‘माया’ की पुस्तक ‘अर्चना के अक्षत’ का लोकार्पण किया गया। इसके बाद आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे रचनाकारों ने अपनी कविताओं, गीतों और गजलों के माध्यम से श्रोताओं को साहित्य के विविध रंगों से परिचित कराया।
कार्यक्रम के दौरान कभी प्रेम और मानवीय रिश्तों की भावनाएं शब्दों में ढलीं, तो कभी देशभक्ति और सामाजिक चेतना से जुड़ी कविताओं ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कवियों की प्रभावशाली प्रस्तुतियों पर सभागार में मौजूद श्रोताओं ने तालियों के साथ उनका उत्साह बढ़ाया। साहित्यिक अभिव्यक्तियों से सजा यह आयोजन देर तक काव्यात्मक वातावरण बनाए रहा।
साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों की रही मौजूदगी
समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं अधिवक्ता पंडित यज्ञ दत्त त्रिपाठी ने की। जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. घनश्याम अनुरागी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। सदर विधायक गौरी शंकर वर्मा, नगर पालिका प्रतिनिधि विजय चौधरी तथा डॉ. प्रशांत निरंजन विशिष्ट अतिथियों के रूप में उपस्थित रहे।
अतिथियों ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि साहित्य समाज की भावनाओं, विचारों और सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे कार्यक्रमों से रचनाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है और नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति रुचि विकसित होती है।
उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पुस्तकों और कविताओं के माध्यम से समाज में सकारात्मक विचारों का प्रसार किया जा सकता है। आयोजन में साहित्यकारों और श्रोताओं की सहभागिता ने इस उद्देश्य को मजबूत किया।
‘अर्चना के अक्षत’ पुस्तक का हुआ विमोचन
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण डॉ. माया सिंह ‘माया’ की पुस्तक ‘अर्चना के अक्षत’ का लोकार्पण रहा। पुस्तक के विमोचन के दौरान साहित्यकारों ने रचनाकार के व्यक्तित्व, उनकी संवेदनशीलता और साहित्यिक योगदान पर अपने विचार साझा किए।
मध्य प्रदेश से आए वरिष्ठ गीतकार रामस्वरूप स्वरूप ने डॉ. माया सिंह के व्यक्तित्व की सहजता और विनम्रता को काव्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी रचना में कहा—
“पढ़ने में सहज भाव से पूरी सौ तक गिनती सी लगती हो, विनय पत्रिका में जो तुलसी की विनती सी लगती हो।”
इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने कवयित्री के सरल स्वभाव और साहित्यिक भावनाओं को अभिव्यक्त किया। पुस्तक के लोकार्पण ने कार्यक्रम को रचनात्मक उपलब्धि और साहित्यकार के सम्मान से जोड़ दिया।
समारोह में पुस्तक की विशेषताओं पर भी चर्चा हुई। साहित्य प्रेमियों ने इसे रचनात्मक अभिव्यक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया। इस अवसर पर पुस्तकों के अध्ययन और साहित्यिक सृजन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
शरद पूर्णिमा की चांदनी पर कविताओं ने बांधा समां
शरद पूर्णिमा के अवसर पर झांसी से पहुंचे कवि धीरेंद्र गहलोत ने प्रकृति और चांदनी के सौंदर्य को अपनी रचना में पिरोया। उनकी कविता की पंक्तियां थीं—
“चांद के आने का स्वर, चंचल पवन बिखर गया, आज कोई चांदनी का द्वार फिर खटक गया।”
प्रकृति की सुंदरता और मन की भावनाओं को समेटे इन पंक्तियों ने श्रोताओं को आकर्षित किया। कवि की प्रस्तुति ने आयोजन में शरद ऋतु की भावपूर्ण अनुभूति पैदा की।
लखनऊ से आए डॉ. शिवमंगल सिंह ‘मंगल’ ने वीर सैनिकों के बलिदान और उनके परिवारों की भावनाओं को अपनी कविता के माध्यम से सामने रखा। उन्होंने पढ़ा—
“कौन चाहता है मेरा बेटा हो हामिद, कैप्टन मनोज-सा जो हो जाए शहीद।”
उनकी रचना में देश की रक्षा के लिए समर्पित जवानों के साहस के साथ परिवारों की संवेदनाएं भी दिखाई दीं। कविता ने श्रोताओं को वीरता और बलिदान के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
भक्ति और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत रचनाएं
डॉ. रविंद्रनाथ तिवारी, लखनऊ ने अपनी प्रस्तुति में आस्था और देशप्रेम को एक साथ अभिव्यक्त किया। उनकी पंक्तियां थीं—
“जय एकलिंग, जय एकलिंग, बजरंगबली का करूं ध्यान, मां सरस्वती वर दे मुझको, केसरिया ध्वज का लिखूं गान।”
उनकी कविता में धार्मिक आस्था और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव दिखाई दिया।
डॉ. नरेंद्र मित्तल ने डॉ. माया सिंह के गुणों और साहित्यिक समर्पण की प्रशंसा करते हुए कहा—
“माया जी ममतामयी, सब गुणशील, निधान हैं, सागर साहित्य की, नहीं कहीं अभिमान।”
इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने कवयित्री के व्यक्तित्व और साहित्य के प्रति उनके योगदान को रेखांकित किया।
दतिया से आए शुगर सिंह रावत ने राष्ट्रसम्मान से जुड़ी कविता प्रस्तुत की। उन्होंने कहा—
“जो भारत मां को मान नहीं दे सकते हैं, हम उनको हिंदुस्तान नहीं दे सकते।”
देशभक्ति के भाव से ओतप्रोत उनकी प्रस्तुति पर सभागार में तालियां गूंज उठीं।
गजल और गीतों में झलकी मानवीय संवेदना
कवि सम्मेलन में गजलकार डॉ. अंसार कंबरी ने रिश्तों की पीड़ा और भावनात्मक गहराई को अपनी रचना के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने पढ़ा—
“तेरी पलकों पर जो ठहरा है, आंसू समंदर से भी गहरा है। कहा था उसको घर से न निकालना, मेरी सुनता नहीं, बहरा है।”
गजल की संवेदनशील अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। उनकी प्रस्तुति में रिश्तों के बीच संवाद, उपेक्षा और मन की व्यथा का चित्रण देखने को मिला।
कोंच से आईं कवयित्री रितु चतुर्वेदी ने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने अपनी कविता में कहा—
“जहां ठहरा हुआ जल हो, वहां कोई नहीं भाता, बुझाने प्यास उस जल में कभी कोई नहीं आता। अगर आगे बढ़ना है तो दरिया संग बढ़ जाना, कभी भी झील का पानी समंदर तक नहीं जाता।”
उनकी रचना का संदेश था कि जीवन में प्रगति के लिए निरंतर प्रयास और गतिशीलता आवश्यक है। कविता ने श्रोताओं को सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा दी।
झांसी से आए अर्जुन सिंह ‘चांद’ ने रचनाकारों के संघर्ष और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को अपनी कविता में स्थान दिया। उन्होंने कहा—
“कभी अंगूठा छीना तुमने, कभी किए हैं हाथ कलम, अक्सर तुमने जुल्म किए हैं हम जैसे फनकारों पर।”
इन पंक्तियों में कलाकारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और उनके संघर्ष की पीड़ा सामने आई।
कवियों की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को किया प्रभावित
कानपुर से आए मुरली परिहार ने अपनी गजलनुमा प्रस्तुति से साहित्यिक वातावरण को भावनात्मक रंग दिया। उन्होंने पढ़ा—
“मैं समंदर रहा, फिर भी प्यासा रहा, और पलकों पर मोती सजाता रहा। होंठ गाते रहे दर्द की दास्तां, आप सुनते रहे, मैं सुनता रहा।”
उनकी रचना में मन की व्यथा, अधूरी इच्छाओं और भीतर छिपी भावनाओं का चित्रण रहा। श्रोताओं ने उनकी प्रस्तुति को सराहा।
नवीन ‘सुरेश कुमार आवारा’ ने अपनी अलग शैली में कविता सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। विभिन्न कवियों की रचनाओं में जीवन, समाज, संघर्ष, प्रेम और राष्ट्रप्रेम के विषय प्रमुखता से दिखाई दिए।
स्थानीय साहित्यकारों ने भी बढ़ाई आयोजन की गरिमा
अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में बाहर से आए साहित्यकारों के साथ स्थानीय रचनाकारों और साहित्य प्रेमियों ने भी सहभागिता की। संवेदना साहित्य समिति के उपाध्यक्ष लाखन सिंह ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए इसे साहित्यिक उपलब्धि बताया। उन्होंने पुस्तक में अपनाई गई जापानी विद्या का उल्लेख करते हुए इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में सफीक उर रहमान ‘कशफी’, योगाचार्य शत्रुघ्न सिंह सेंगर, कवयित्री प्रिया दिव्यम, शिखा गर्ग, शिरोमणि सोनी, डॉ. अनुज भदौरिया, राघवेंद्र कनकने, विवेकानंद श्रीवास्तव, शायर अनिवार्य अहमद, संस्कृति गुप्ता और प्रगति मिश्रा सहित अनेक साहित्यकार एवं गणमान्य लोग मौजूद रहे।
विभिन्न क्षेत्रों से आए रचनाकारों की सहभागिता ने समारोह को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। उनकी प्रस्तुतियों में साहित्य की विविध विधाओं और विचारों की झलक देखने को मिली।
साहित्यिक चेतना को नई ऊर्जा देने वाला आयोजन
संवेदना साहित्य समिति के इस कार्यक्रम ने बुंदेलखंड में साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुस्तक विमोचन और कवि सम्मेलन के माध्यम से रचनाकारों को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का मंच मिला, वहीं श्रोताओं को विभिन्न साहित्यिक विधाओं का आनंद लेने का अवसर प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम में प्रस्तुत कविताओं ने यह संदेश दिया कि साहित्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की भावनाओं, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है। गीत, गजल, भक्ति, देशप्रेम और सामाजिक चेतना से जुड़ी रचनाओं ने सभागार में मौजूद लोगों को अलग-अलग भावनात्मक अनुभवों से जोड़ा।
डॉ. माया सिंह ‘माया’ की पुस्तक ‘अर्चना के अक्षत’ का लोकार्पण और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन उरई के साहित्यिक परिदृश्य में यादगार आयोजन बनकर सामने आया। कार्यक्रम के दौरान कवियों की प्रस्तुतियों पर गूंजती तालियों ने साहित्य के प्रति लोगों की रुचि और रचनात्मक अभिव्यक्ति के महत्व को दर्शाया।
समारोह ने यह साबित किया कि साहित्यिक मंच समाज में विचारों के आदान-प्रदान, सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का प्रभावी माध्यम हैं। संवेदना साहित्य समिति के इस प्रयास से बुंदेलखंड की साहित्यिक गतिविधियों को नई ऊर्जा मिली और साहित्य प्रेमियों को एक यादगार सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त हुआ।
