मानसून की कमी से कृषि पर बढ़ी चिंता, दलहन और तिलहन फसलों पर असर की आशंका

0

नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026। भारत में इस साल मानसून का असमान और कमजोर प्रदर्शन किसानों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून सीजन में अब तक देशभर में बारिश सामान्य स्तर से करीब 15 प्रतिशत कम बताई जा रही है। सबसे बड़ी चिंता केवल बारिश की कुल मात्रा को लेकर नहीं है, बल्कि इसके असमान वितरण और कई इलाकों में लंबे समय तक चले सूखे अंतराल को लेकर भी है। इससे खरीफ फसलों की उत्पादकता प्रभावित होने के साथ आने वाली रबी फसल की तैयारी पर भी असर पड़ सकता है।

हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, देश के करीब आधे जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। कई कृषि क्षेत्रों में मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है, जबकि कुछ इलाकों में बारिश हुई भी है तो वह लंबे अंतराल के बाद तेज बारिश के रूप में आई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति खेती के लिए सामान्य बारिश की तुलना में कम उपयोगी हो सकती है, क्योंकि फसल के महत्वपूर्ण विकास चरणों में लगातार पर्याप्त नमी की जरूरत होती है।

दलहन और तिलहन पर विशेष चिंता

कम बारिश का असर उन फसलों पर ज्यादा पड़ सकता है जो बड़े पैमाने पर वर्षा पर निर्भर रहती हैं। इनमें दलहन और तिलहन प्रमुख हैं। खरीफ मौसम में सोयाबीन, मूंगफली और विभिन्न दलहन फसलों के लिए पर्याप्त नमी महत्वपूर्ण होती है। बारिश में कमी और लंबे शुष्क दौर के कारण पौधों की वृद्धि, दाना बनने और उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

कृषि क्षेत्र से जुड़ी रिपोर्टों में इस बात को लेकर चिंता जताई गई है कि असमान मानसून से दलहन और तिलहन की पैदावार में कमी आ सकती है। इस साल कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र भी पिछले वर्ष की तुलना में कम रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार खरीफ फसलों का कुल रकबा करीब 108.63 मिलियन हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष से लगभग 1.6 प्रतिशत कम है। वहीं तिलहन का रकबा भी मामूली रूप से घटा है।

दलहन उत्पादन में किसी भी तरह की कमी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत में दालों की मांग लगातार बनी रहती है। यदि घरेलू उत्पादन अनुमान से कम रहता है तो बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।

सोयाबीन और मूंगफली की फसल भी दबाव में

तिलहन वर्ग में सोयाबीन और मूंगफली महत्वपूर्ण फसलें हैं। इनकी खेती कई राज्यों में मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। बारिश में कमी से खेतों में नमी का स्तर घटने पर फसल की वृद्धि प्रभावित होने का जोखिम बढ़ जाता है।

सितंबर का महीना इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि खरीफ की कई फसलें इस समय विकास के महत्वपूर्ण चरण में होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर दाना और फली बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिसका अंतिम परिणाम उत्पादन में कमी के रूप में सामने आ सकता है।

धान की बुवाई पर भी पड़ा असर

मानसून की कमी का असर धान की खेती पर भी दिखाई दिया है। कृषि मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के अनुसार 2026 के खरीफ सीजन में धान का क्षेत्रफल करीब 42.18 मिलियन हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत कम है। कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में धान के रकबे में कमी दर्ज की गई है।

हालांकि चावल के पर्याप्त सरकारी भंडार के कारण तत्काल खाद्य उपलब्धता को लेकर स्थिति कुछ हद तक सुरक्षित मानी जा रही है। फिर भी लंबे समय तक कमजोर मानसून रहने पर अगले कृषि चक्र और ग्रामीण आय पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

रबी फसल के लिए भी चुनौती

मानसून की कमी का असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहता। सितंबर की बारिश खेतों में मिट्टी की नमी को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही नमी आगे चलकर रबी फसलों की बुवाई में मदद करती है।

गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों की बुवाई से पहले खेतों में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। यदि मानसून के अंतिम चरण में भी बारिश कमजोर रहती है तो कुछ क्षेत्रों में किसानों को रबी फसल की बुवाई के लिए सिंचाई पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और पानी की उपलब्धता पर दबाव भी बढ़ सकता है।

पानी के इस्तेमाल को लेकर राज्यों में सतर्कता

कम बारिश के कारण कई क्षेत्रों में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। कुछ राज्यों में आगामी रबी मौसम के लिए पानी बचाने की कोशिशें शुरू की गई हैं। इसका उद्देश्य उपलब्ध जल का बेहतर प्रबंधन करना और खरीफ के बाद आने वाली फसलों के लिए पर्याप्त पानी सुरक्षित रखना है।

कर्नाटक की स्थिति इस चुनौती को और स्पष्ट करती है। सितंबर की शुरुआत तक राज्य के 31 में से 30 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई थी। कई तालुकों में लंबे समय तक बारिश नहीं होने के कारण सूखे जैसी परिस्थितियों को लेकर प्रशासन को आकलन करना पड़ा है।

किसानों की आय पर पड़ सकता है असर

फसल उत्पादन में कमी का सीधा प्रभाव किसानों की आय पर पड़ सकता है। यदि प्रति हेक्टेयर उपज घटती है और खेती की लागत पहले जैसी रहती है, तो किसानों का लाभ कम हो सकता है। वर्षा-आधारित क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है, जहां सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था सीमित होती है।

बारिश की कमी के साथ तापमान में बढ़ोतरी भी फसलों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है। मिट्टी में नमी कम होने और गर्म मौसम के कारण पौधों पर जल तनाव बढ़ सकता है। ऐसे में सितंबर के शेष दिनों में होने वाली बारिश कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

खाद्य महंगाई का भी जोखिम

अगर दलहन, तिलहन, सोयाबीन, मूंगफली या अन्य महत्वपूर्ण फसलों की पैदावार प्रभावित होती है तो इसका असर कृषि बाजार के साथ खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है। दालों और खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता में कमी आने पर आयात की जरूरत बढ़ सकती है।

भारत पहले से ही खाद्य तेलों की घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। इसलिए तिलहन उत्पादन में गिरावट होने पर आयात आवश्यकता बढ़ने की संभावना रहती है। इसी तरह दलहन उत्पादन कमजोर पड़ने पर घरेलू आपूर्ति और कीमतों को संतुलित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

बारिश की मात्रा के साथ वितरण भी महत्वपूर्ण

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मानसून का आकलन केवल पूरे देश में हुई कुल बारिश के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। बारिश कब, कहां और कितने अंतराल पर हुई, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

किसी क्षेत्र में कुल बारिश सामान्य के करीब हो सकती है, लेकिन यदि बारिश लंबे समय तक न होकर कुछ ही दिनों में बहुत अधिक हो जाए तो उसका कृषि लाभ सीमित हो सकता है। तेज बारिश से मिट्टी का कटाव, जलभराव और फसलों को नुकसान हो सकता है, जबकि उसके बाद लंबा सूखा अंतराल फिर से नमी की कमी पैदा कर सकता है।

भारतीय मौसम विभाग की सितंबर की रिपोर्टों में भी कई क्षेत्रों में बारिश की गतिविधि कमजोर रहने की संभावना और कुछ इलाकों में भारी बारिश की संभावना दोनों का उल्लेख किया गया है। इससे इस साल के मानसून की क्षेत्रीय असमानता साफ दिखाई देती है।

सरकार और किसानों के सामने बड़ी चुनौती

ऐसी परिस्थितियों में जल प्रबंधन, फसल निगरानी और मौसम आधारित कृषि सलाह की भूमिका बढ़ जाती है। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह जरूरी होगा कि कमजोर बारिश वाले इलाकों की पहचान कर किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाई जाए।

साथ ही, जल संरक्षण, सिंचाई संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और फसल विविधीकरण जैसे उपायों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय मौसम विभाग ने भी कमजोर मानसून की स्थिति में जल संसाधन प्रबंधन, कृषि आकस्मिक योजनाओं, सूखा निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है।

सितंबर की बारिश पर टिकी उम्मीद

अब किसानों और कृषि बाजार की नजर मानसून के बचे हुए दिनों पर है। यदि सितंबर में पर्याप्त और समान रूप से बारिश होती है तो मिट्टी की नमी में सुधार हो सकता है और कुछ फसलों को राहत मिल सकती है। इसके अलावा रबी मौसम की बुवाई के लिए भी बेहतर परिस्थितियां तैयार हो सकती हैं।

लेकिन यदि बारिश की कमी आगे भी जारी रहती है तो खरीफ उत्पादन, किसानों की आय, जल संसाधनों और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि इस समय मानसून की हर गतिविधि कृषि क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कुल मिलाकर, 2026 का कमजोर मानसून भारतीय कृषि के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बनकर उभरा है। करीब 15 प्रतिशत बारिश की कमी और कई जिलों में सामान्य से कम वर्षा ने विशेष रूप से दलहन और तिलहन फसलों को लेकर चिंता बढ़ाई है। आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि मौजूदा मौसम का कृषि उत्पादन पर वास्तविक असर कितना गंभीर होगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *