“जब तक मैं प्रधानमंत्री हूं, फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनेगा”: नेतन्याहू के बयान से फिर गरमाया इजरायल-फिलिस्तीन विवाद

नई दिल्ली। इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को लेकर एक बार फिर अपना कड़ा रुख सामने रखा है। नेतन्याहू का कहना है कि जब तक वह प्रधानमंत्री हैं, तब तक गाजा या वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं होगी। उनके इस बयान ने पहले से ही जटिल इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
फिलिस्तीनी राज्य का सवाल पिछले कई दशकों से पश्चिम एशिया की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। एक ओर फिलिस्तीनी नेतृत्व स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करता रहा है, वहीं इजरायल की वर्तमान दक्षिणपंथी सरकार सुरक्षा चिंताओं और हमास के खतरे का हवाला देते हुए स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के विचार का विरोध करती रही है। नेतन्याहू के ताजा बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गाजा युद्ध के बाद क्षेत्र का राजनीतिक भविष्य आखिर किस दिशा में जाएगा।
फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे पर नेतन्याहू का सख्त रुख
नेतन्याहू लंबे समय से स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के विरोध में रहे हैं। उनका तर्क है कि इजरायल के आसपास ऐसा कोई राजनीतिक या सैन्य ढांचा नहीं होना चाहिए जिससे देश की सुरक्षा को खतरा पैदा हो। खासतौर पर 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद इजरायल में सुरक्षा संबंधी चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं।
नेतन्याहू के अनुसार, गाजा में हमास की मौजूदगी इजरायल के लिए गंभीर खतरा है और इसलिए युद्ध के बाद की किसी भी व्यवस्था में हमास को सैन्य एवं राजनीतिक रूप से प्रभावहीन करना जरूरी है। इसी कारण वह गाजा में फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना या मौजूदा फिलिस्तीनी नेतृत्व को सीधे सत्ता सौंपने के विचार के प्रति भी संदेह व्यक्त करते रहे हैं।
उनका ताजा बयान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि इजरायल की वर्तमान सरकार फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर अपने रुख में तत्काल बदलाव करने के मूड में नहीं है।
गाजा के भविष्य का सवाल सबसे महत्वपूर्ण
गाजा में युद्ध के बाद कौन शासन करेगा, यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। लंबे समय तक गाजा पर हमास का नियंत्रण रहा है। दूसरी ओर वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी प्राधिकरण का प्रशासनिक प्रभाव है, जिसका राजनीतिक संबंध फतह से है।
यही वजह है कि फिलिस्तीनी राजनीति भी लंबे समय से विभाजित रही है। गाजा में हमास और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी प्राधिकरण की अलग-अलग राजनीतिक स्थिति ने किसी एकीकृत फिलिस्तीनी प्रशासन की संभावना को कठिन बनाया है।
नेतन्याहू ने इसी संदर्भ में “हमासस्तान” और “फतहस्तान” जैसे राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल किया है। उनका संदेश यह है कि वह गाजा को न तो हमास के नियंत्रण में देखना चाहते हैं और न ही बिना किसी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के फिलिस्तीनी प्राधिकरण को वहां शासन सौंपने के पक्ष में हैं।
“हमासस्तान” और “फतहस्तान” क्या हैं?
इन दोनों शब्दों को समझना जरूरी है। ये किसी आधिकारिक देश या क्षेत्र के नाम नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक बहस में इस्तेमाल होने वाले शब्द हैं।
“हमासस्तान” का इस्तेमाल ऐसे संभावित गाजा के संदर्भ में किया जाता है जहां हमास का राजनीतिक और सैन्य प्रभाव कायम रहे। इजरायल हमास को आतंकवादी संगठन मानता है और उसके सैन्य ढांचे को अपने लिए बड़ा सुरक्षा खतरा बताता है।
दूसरी ओर “फतहस्तान” शब्द का इस्तेमाल फतह से जुड़े फिलिस्तीनी राजनीतिक प्रशासन के संदर्भ में किया जाता है। फतह फिलिस्तीनी प्राधिकरण की प्रमुख राजनीतिक शक्ति है और वेस्ट बैंक में उसका प्रभाव है।
नेतन्याहू का रुख यह दर्शाता है कि वह गाजा के भविष्य को इन दोनों में से किसी एक मॉडल के तहत देखने के बजाय ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें इजरायल की सुरक्षा प्राथमिकता बनी रहे।
दो-राष्ट्र समाधान पर बढ़ती बहस
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक बड़े हिस्से ने लंबे समय से दो-राष्ट्र समाधान को इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के संभावित राजनीतिक समाधान के रूप में देखा है। इस व्यवस्था के तहत इजरायल और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य को अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों के रूप में स्थापित करने की कल्पना की जाती है।
लेकिन इस समाधान के रास्ते में कई बड़ी राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियां हैं। इनमें वेस्ट बैंक की सीमाएं, यरुशलम की स्थिति, इजरायली बस्तियां, फिलिस्तीनी शरणार्थियों का प्रश्न, गाजा का भविष्य और इजरायल की सुरक्षा प्रमुख मुद्दे हैं।
नेतन्याहू का मौजूदा रुख दो-राष्ट्र समाधान के समर्थकों के लिए बड़ी चुनौती है। यदि इजरायल सरकार फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को पूरी तरह अस्वीकार करती है, तो भविष्य में स्थायी राजनीतिक समझौते तक पहुंचना और कठिन हो सकता है।
अमेरिका और इजरायल के बीच भी चुनौती
गाजा के भविष्य को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देता रहा है। अमेरिका युद्ध समाप्त करने, मानवीय सहायता बढ़ाने और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर देता रहा है। वहीं नेतन्याहू सरकार हमास के निरस्त्रीकरण और इजरायल की सुरक्षा को किसी भी भविष्य की व्यवस्था की अनिवार्य शर्त मानती है।
यही अंतर गाजा के पुनर्निर्माण और प्रशासन के सवाल पर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि युद्ध के बाद गाजा में कोई अंतरराष्ट्रीय या फिलिस्तीनी प्रशासन स्थापित किया जाता है, तो उसके लिए इजरायल की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। दूसरी ओर फिलिस्तीनी पक्ष किसी ऐसी व्यवस्था को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर सकता है जिसमें राजनीतिक स्वायत्तता सीमित हो।
फिलिस्तीनी नेतृत्व के सामने भी बड़ी चुनौती
नेतन्याहू के बयान का असर केवल इजरायल की राजनीति तक सीमित नहीं है। फिलिस्तीनी नेतृत्व के सामने भी अब यह चुनौती है कि वह गाजा और वेस्ट बैंक के बीच राजनीतिक विभाजन को कैसे कम करे।
फिलिस्तीनी प्राधिकरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिलिस्तीनी प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन गाजा में उसकी भूमिका लंबे समय से सीमित रही है। यदि भविष्य में गाजा का प्रशासन फिलिस्तीनी प्राधिकरण को दिया जाना है, तो उसे इजरायल, अमेरिका और अरब देशों की सुरक्षा तथा राजनीतिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
इसके साथ ही गाजा के पुनर्निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता, बुनियादी ढांचे की बहाली और विस्थापित लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता होगी। इसके लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी होगा।
अरब देशों की भूमिका भी अहम
इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में अरब देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। मिस्र और जॉर्डन जैसे पड़ोसी देशों के साथ-साथ खाड़ी के अरब देशों की भी गाजा के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
अरब देशों के लिए एक ओर फिलिस्तीनी अधिकारों और स्वतंत्र राज्य की मांग महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर वे क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा को भी प्राथमिकता देते हैं। इसलिए गाजा के युद्धोत्तर प्रशासन पर किसी व्यापक समझौते के लिए अरब देशों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
नेतन्याहू के ताजा बयान से यह स्पष्ट है कि फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर इजरायल सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक हिस्से के बीच राजनीतिक दूरी बनी हुई है। दूसरी ओर युद्ध के बाद गाजा में स्थायी व्यवस्था स्थापित करना केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं होगा। इसके लिए राजनीतिक समाधान, प्रशासनिक ढांचा, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण की व्यापक योजना आवश्यक होगी।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसा समाधान कैसे तैयार किया जाए जिसे इजरायल की सुरक्षा चिंताओं, फिलिस्तीनियों की राजनीतिक आकांक्षाओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं के बीच संतुलित किया जा सके।
निष्कर्ष
बेंजामिन नेतन्याहू का यह बयान इजरायल-फिलिस्तीन विवाद की मौजूदा दिशा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। उनका स्पष्ट संदेश है कि उनकी सरकार फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और गाजा के भविष्य में हमास की भूमिका को भी समाप्त करना चाहती है।
हालांकि दूसरी ओर, फिलिस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राज्य का प्रश्न केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि उनके भविष्य और आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए आने वाले समय में गाजा के पुनर्निर्माण, हमास के भविष्य, फिलिस्तीनी प्राधिकरण की भूमिका और दो-राष्ट्र समाधान पर होने वाली कूटनीतिक बातचीत बेहद महत्वपूर्ण होगी।
यदि स्थायी शांति की दिशा में कोई रास्ता निकालना है, तो केवल सैन्य या राजनीतिक दबाव पर्याप्त नहीं होगा। इजरायल की सुरक्षा और फिलिस्तीनियों के राजनीतिक अधिकार—दोनों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक समाधान तलाशना ही क्षेत्र में स्थिरता की सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेगी।