सैंडी हुक की बरसी पर फिर गूंजा बंदूक हिंसा के खिलाफ आक्रोश: ब्राउन यूनिवर्सिटी की घटना ने पुरानी पीड़ा को फिर किया ताज़ा

अमेरिका के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो समय बीतने के बावजूद समाज की चेतना पर गहरे घाव छोड़ जाती हैं। सैंडी हुक एलिमेंट्री स्कूल में 14 दिसंबर 2012 को हुई गोलीबारी ऐसी ही एक त्रासदी थी, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। 20 नन्हे बच्चों और 6 शिक्षकों की जान लेने वाली इस घटना को 13 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसका दर्द आज भी उतना ही जीवंत है।
इसी संवेदनशील मौके पर ब्राउन यूनिवर्सिटी में सामने आई ताज़ा गोलीबारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका अब भी बंदूक हिंसा से उबर पाया है?
ब्राउन यूनिवर्सिटी की घटना: शिक्षा परिसर फिर बना निशाना
13 दिसंबर 2025 को रोड आइलैंड के प्रोविडेंस शहर में स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी के एक इंजीनियरिंग भवन में अचानक गोलियों की आवाज़ें गूंजीं। इस हमले में दो लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य घायल हुए। घटना के तुरंत बाद पूरे कैंपस में आपात चेतावनी जारी कर दी गई और सुरक्षा एजेंसियों ने इलाके को घेर लिया।
यह हमला न केवल विश्वविद्यालय समुदाय के लिए, बल्कि पूरे न्यू इंग्लैंड क्षेत्र के लिए एक गहरा आघात साबित हुआ। एक बार फिर वह स्थान, जिसे ज्ञान और सुरक्षित भविष्य का प्रतीक माना जाता है, भय और शोक का केंद्र बन गया।
नैन्सी पेलोसी की प्रतिक्रिया: “यह दर्द केवल इतिहास नहीं है”
सैंडी हुक की बरसी पर अमेरिकी राजनीति की वरिष्ठ नेता और पूर्व स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने भावनात्मक शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने सैंडी हुक के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएँ केवल बीते कल की कहानी नहीं हैं, बल्कि आज की सच्चाई भी हैं। उनका संदेश इस बात का संकेत था कि बंदूक हिंसा के खिलाफ संघर्ष अभी अधूरा है।
बंदूक हिंसा: जो थमती नहीं दिखती
सैंडी हुक के बाद से अमेरिका में कई कानूनों और पहलों की चर्चा हुई, लेकिन जमीनी स्तर पर हिंसा की घटनाएँ लगातार सामने आती रहीं। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय जैसे स्थान—जहाँ सुरक्षा और विश्वास सबसे ज़रूरी होते हैं—अक्सर इस हिंसा की चपेट में आते रहे हैं। ब्राउन यूनिवर्सिटी की घटना इस निरंतर संकट की एक और कड़ी बन गई है।
राजनीतिक बहस और सुधार की मांग फिर तेज़
ताज़ा गोलीबारी के बाद डेमोक्रेटिक नेताओं ने एक बार फिर सख्त बंदूक नियंत्रण कानूनों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। उनका मानना है कि आधे-अधूरे सुधार अब पर्याप्त नहीं हैं। सैंडी हुक के बाद कई बार बदलाव की उम्मीद जगी, लेकिन राजनीतिक मतभेदों और दबावों के कारण व्यापक कानून लागू नहीं हो सके।
अब सवाल यह है कि क्या यह नई त्रासदी निर्णायक कदम उठाने की दिशा में कोई ठोस मोड़ ला पाएगी?
निष्कर्ष: स्मृति से संकल्प तक का सफर
सैंडी हुक की बरसी और ब्राउन यूनिवर्सिटी की ताज़ा घटना मिलकर यह याद दिलाती हैं कि बंदूक हिंसा अमेरिका के लिए बीती हुई समस्या नहीं है। यह आज भी समाज की जड़ों को हिला रही है। अगर यह क्षण केवल शोक और बयानबाज़ी तक सीमित न रहकर नीति और कार्रवाई में बदले, तभी पीड़ितों की स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकेगी।
