मार्च 13, 2026

लौह अयस्क के अपशिष्ट से बनेगी हरित सड़कें, खनन कचरे के उपयोग से टिकाऊ अवसंरचना को मिलेगा बढ़ावा

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भारत में सड़क निर्माण को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। इस दिशा में ** के अंतर्गत आने वाले (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और इस्पात क्षेत्र की अग्रणी कंपनी (एएमएनएस इंडिया) ने संयुक्त रूप से शोध एवं विकास समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस सहयोग का उद्देश्य सड़क निर्माण में लौह अयस्क से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों के उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन करना है।

यह समझौता राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान किया गया। इस पहल के माध्यम से खनन उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलकर पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ अवसंरचना विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।

खनन अपशिष्ट से हरित सड़कों की दिशा में पहल

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएसआईआर की महानिदेशक और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग की सचिव ने कहा कि यदि लौह अयस्क से निकलने वाले अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग सड़क निर्माण में किया जाए तो यह खनन कचरे को हरित अवसंरचना में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

उन्होंने बताया कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित लौह अयस्क प्रसंस्करण इकाइयों से हर वर्ष लगभग 18 से 20 मिलियन टन अपशिष्ट निकलता है। इन अपशिष्टों को आम तौर पर बड़े जलाशयों या बांधों में संग्रहित किया जाता है और इन्हें ‘स्लाइम’ के नाम से जाना जाता है। इतनी बड़ी मात्रा में जमा होने वाला यह कचरा पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चुनौती बन जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययन से तय होगी उपयोगिता

इस संयुक्त परियोजना के अंतर्गत सीएसआईआर-सीआरआरआई के वैज्ञानिक विभिन्न प्रयोगशाला परीक्षण, सामग्री विश्लेषण तथा सड़क डिजाइन संबंधी अध्ययन करेंगे। इन अध्ययनों के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि सड़क की विभिन्न परतों में लौह अयस्क अपशिष्ट का उपयोग किस प्रकार और किस मात्रा में किया जा सकता है।

इससे सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक पत्थर और अन्य समुच्चयों की मांग कम करने में भी मदद मिल सकती है।

उद्योग और अनुसंधान संस्थानों की साझेदारी

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित एएमएनएस इंडिया के मुख्य सतत विकास अधिकारी ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा को आगे बढ़ाने के लिए उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि इस साझेदारी के माध्यम से औद्योगिक उप-उत्पादों की क्षमता को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा और उन्हें देश के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप उपयोग में लाया जा सकेगा।

टिकाऊ सड़क तकनीकों पर जोर

सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक ने कहा कि संस्थान भविष्य की टिकाऊ सड़क प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। एएमएनएस इंडिया के साथ यह सहयोग लौह अयस्क अपशिष्ट के वैज्ञानिक परीक्षण और व्यावहारिक प्रदर्शन को संभव बनाएगा, जिससे भारत सड़क निर्माण के क्षेत्र में नई तकनीकों के विकास में और मजबूत स्थिति हासिल कर सकेगा।

परियोजना का नेतृत्व

इस पहल का नेतृत्व सीएसआईआर-सीआरआरआई के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख कर रहे हैं, जो स्टील स्लैग आधारित सड़क तकनीक के आविष्कारक भी हैं। उन्होंने बताया कि व्यवस्थित अनुसंधान, प्रयोगशाला परीक्षण और तकनीकी सुधार के माध्यम से लौह अयस्क अपशिष्ट को सड़क निर्माण में मिट्टी और प्राकृतिक पत्थरों के विकल्प के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।

प्रदर्शित की गई नई तकनीकें

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के इस आयोजन में संस्थान द्वारा विकसित कई नवीन तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। इनमें कृषि अपशिष्ट से तैयार बायो-बिटुमेन, स्टील स्लैग आधारित त्वरित गड्ढा मरम्मत तकनीक ‘इकोफिक्स’, स्लैग और फ्लाई ऐश से बनी पतली टेरासर्फेसिंग तकनीक तथा अपशिष्ट प्लास्टिक से तैयार मॉड्यूलर जियोसेल शामिल हैं।

इन तकनीकों का उद्देश्य सड़क निर्माण में अपशिष्ट पदार्थों का अधिकतम उपयोग कर चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना है।

कार्यक्रम में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं तथा सड़क और इस्पात क्षेत्रों से जुड़े कई विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस अवसर पर विज्ञान आधारित नवाचारों के माध्यम से देश में टिकाऊ अवसंरचना के विकास की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया।


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