मार्च 20, 2026

एनएएफईडी निविदा विवाद पर न्यायालय का अहम फैसला: याचिकाएं खारिज, शर्तें वैध घोषित

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न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एनएएफईडी द्वारा जारी निविदा को चुनौती देने वाली तीनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। यह मामला उत्तर प्रदेश में एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना के तहत पूरक पोषण (THR) की आपूर्ति से जुड़ा हुआ था, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹2,768 करोड़ थी।

क्या था पूरा विवाद?

एनएएफईडी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए उत्तर प्रदेश में पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की आपूर्ति हेतु एक निविदा जारी की थी। इस निविदा में कुछ विशेष पात्रता शर्तें रखी गई थीं, जिनमें प्रमुख थीं—

  • बोलीदाता के पास निविदा जारी होने की तिथि से पहले उत्तर प्रदेश में विनिर्माण इकाई होना अनिवार्य।
  • THR आपूर्ति से संबंधित किसी भी लंबित कानूनी या आपराधिक मामले का न होना।
  • पिछले तीन वर्षों में हर साल न्यूनतम ₹75 करोड़ का कारोबार।

इन शर्तों को याचिकाकर्ताओं ने मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी।

याचिकाकर्ताओं के प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि—

  • उत्तर प्रदेश में पहले से फैक्ट्री होने की शर्त बाहरी कंपनियों को अनुचित रूप से बाहर करती है।
  • केवल “लंबित मामलों” के आधार पर अयोग्यता तय करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
  • पूर्व निविदाओं में ऐसी शर्तें नहीं थीं, फिर अब क्यों?
  • ई-प्रोक्योरमेंट और पारदर्शिता से जुड़े GFR नियमों का पालन नहीं किया गया।

प्रतिवादियों (एनएएफईडी और राज्य) का पक्ष

एनएएफईडी और राज्य सरकार ने इन शर्तों को उचित ठहराते हुए कहा—

  • THR की आपूर्ति अत्यंत समय-संवेदनशील और नाशवान प्रकृति की है, जिसकी शेल्फ लाइफ लगभग 3 महीने होती है।
  • कच्चा माल (गेहूं, चावल) राज्य के भीतर उपलब्ध कराया जाता है, इसलिए स्थानीय उत्पादन आवश्यक है।
  • बाहरी राज्यों से परिवहन करने पर समय, लागत और गुणवत्ता प्रभावित होगी।
  • स्थानीय इकाइयों से निरीक्षण, निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण आसान होता है।

न्यायालय का विश्लेषण

न्यायालय ने विस्तार से दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार करते हुए कहा—

  • विनिर्माण इकाई की शर्त उचित है:
    अदालत ने माना कि यह शर्त मनमानी नहीं है, बल्कि समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
  • न्यायिक हस्तक्षेप सीमित:
    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निविदा की शर्तें तय करना सरकार का अधिकार है और अदालत तभी हस्तक्षेप करेगी जब शर्तें स्पष्ट रूप से मनमानी या दुर्भावनापूर्ण हों।
  • 75 करोड़ टर्नओवर शर्त वैध:
    बड़े पैमाने की परियोजना को देखते हुए यह शर्त बोलीदाता की वित्तीय क्षमता सुनिश्चित करने के लिए उचित है।
  • गैर-प्रतिस्पर्धा शर्त पर आपत्ति खारिज:
    इस शर्त को मामले में प्रभावी रूप से लागू न मानते हुए अदालत ने इस पर हस्तक्षेप नहीं किया।
  • लंबित मामलों वाली शर्त:
    हालांकि अदालत ने माना कि केवल लंबित मामले होना दोष सिद्धि नहीं है, लेकिन अन्य अनिवार्य शर्तों को पूरा न करने के कारण यह मुद्दा निर्णायक नहीं रहा।

सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला

अदालत ने कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि—

  • सरकार को निविदा शर्तें तय करने में व्यापक स्वतंत्रता है।
  • न्यायालय नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक वे स्पष्ट रूप से मनमाने या भेदभावपूर्ण न हों।
  • सार्वजनिक हित और सेवा की गुणवत्ता सर्वोपरि है।

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर न्यायालय ने कहा—

👉 निविदा की शर्तें उचित, तार्किक और सार्वजनिक हित में हैं।
👉 याचिकाओं में कोई दम नहीं है।
👉 तीनों रिट याचिकाएं खारिज की जाती हैं।

साथ ही, लंबित सभी आवेदन भी निरस्त कर दिए गए।


निष्कर्ष

यह निर्णय सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) में सरकार के अधिकार और न्यायिक सीमाओं को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह संदेश दिया कि—

✔️ प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन गुणवत्ता और समयबद्धता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
✔️ नीतिगत फैसलों में न्यायालय केवल सीमित हस्तक्षेप करेगा।
✔️ जनहित से जुड़े मामलों में व्यावहारिकता को प्राथमिकता दी जाएगी।

यह फैसला भविष्य की निविदाओं और सरकारी खरीद प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है।

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