ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क के बीच नया सुरक्षा समझौता, मार्को रुबियो ने बताया ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’
वॉशिंगटन/न्यूयॉर्क, 19 सितंबर 2026। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच कई महीनों से चल रही कूटनीतिक खींचतान के बीच अब एक नया सुरक्षा समझौता सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को घोषणा की कि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच ऐसा समझौता हुआ है, जिसके तहत ग्रीनलैंड की सुरक्षा में अमेरिका की भूमिका को लंबे समय के लिए मजबूत किया जाएगा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस समझौते को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के समाधान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बताया है।
हालांकि, इस समझौते को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता डेनमार्क के अधीन ही बनी रहेगी। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने कहा है कि समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर के बाद इसे लागू करने के लिए आवश्यक संसदीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसलिए फिलहाल इसे घोषित समझौते के रूप में देखा जा रहा है, न कि सभी प्रक्रियाएं पूरी कर लागू हो चुके समझौते के रूप में।

रुबियो ने क्यों बताया बड़ा समझौता?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि यह व्यवस्था ग्रीनलैंड को उत्तरी अमेरिका के रणनीतिक रक्षा क्षेत्र का हिस्सा बनाए रखने और किसी प्रतिद्वंद्वी शक्ति को वहां सैन्य या रणनीतिक पैर जमाने से रोकने में मदद करेगी। उनके अनुसार, समझौता ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करता है।
रुबियो का बयान ऐसे समय आया है जब आर्कटिक क्षेत्र का सामरिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है तथा आर्कटिक क्षेत्र में इसकी स्थिति सैन्य निगरानी, अंतरिक्ष गतिविधियों और उत्तर अटलांटिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ट्रंप ने ‘स्थायी नियंत्रण’ की बात कही
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि इससे अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा से संबंधित व्यापक और स्थायी भूमिका मिलेगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि समझौते के तहत अमेरिका को सुरक्षा संबंधी जरूरतों के लिए आवश्यक कदम उठाने की क्षमता मिलेगी और इसके लिए अमेरिकी करदाताओं पर अतिरिक्त लागत नहीं आएगी।
ट्रंप के बयान में यह भी कहा गया कि अमेरिका के विरोधी देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा स्थापित करने, सैन्य मौजूदगी बनाने या संवेदनशील निवेश करने से रोकने के लिए अमेरिकी सहमति आवश्यक होगी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, समझौते की कई विस्तृत शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं। इसलिए इसके वास्तविक कानूनी और प्रशासनिक प्रभाव का पूरा आकलन आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।
ग्रीनलैंड पर कब्जे की चर्चा से सुरक्षा समझौते तक
ग्रीनलैंड का मुद्दा अमेरिका और डेनमार्क के संबंधों में पिछले कुछ समय से बेहद संवेदनशील रहा है। ट्रंप ने पहले ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करने की इच्छा सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। इस रुख को लेकर डेनमार्क और यूरोप में चिंता पैदा हुई थी। अब सामने आए समझौते में ग्रीनलैंड की संप्रभुता को बरकरार रखते हुए अमेरिका की सुरक्षा भूमिका बढ़ाने की व्यवस्था दिखाई दे रही है।
अमेरिकी और डेनिश अधिकारियों के बीच बातचीत का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसा ढांचा तैयार करना बताया गया है, जिसमें आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग मजबूत हो सके, लेकिन ग्रीनलैंड की संवैधानिक स्थिति में बदलाव न हो। डेनमार्क की सरकार ने स्पष्ट किया है कि समझौता उसके राज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता तथा ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है।
ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और इसका बड़ा हिस्सा आर्कटिक सर्कल के भीतर आता है। इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण यह उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य और अंतरिक्ष निगरानी संबंधी सुविधाएं संचालित करता है। इनमें उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड स्थित पिटुफिक स्पेस बेस विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह सुविधा मिसाइल चेतावनी, मिसाइल रक्षा और अंतरिक्ष निगरानी से संबंधित गतिविधियों में उपयोग होती है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951 के रक्षा समझौते ने भी ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का आधार प्रदान किया था।
नए समझौते के तहत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करने की संभावना जताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की योजना बना सकता है, हालांकि नए ठिकानों या सुविधाओं की अंतिम जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है।
रूस और चीन का मुद्दा भी अहम
ग्रीनलैंड समझौते के पीछे आर्कटिक में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी एक महत्वपूर्ण कारक है। अमेरिका लंबे समय से आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियों को अपनी सुरक्षा नीति के संदर्भ में देखता आया है।
समझौते की घोषित रूपरेखा में गैर-नाटो देशों की सैन्य मौजूदगी और संवेदनशील निवेश को लेकर प्रतिबंधों की बात सामने आई है। इससे अमेरिका का उद्देश्य ग्रीनलैंड में ऐसे रणनीतिक प्रभाव को सीमित करना है, जिसे वह अपनी या अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए चुनौती मान सकता है।
हालांकि, इस व्यवस्था के प्रभाव का आकलन केवल अमेरिकी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता। ग्रीनलैंड के लोग अपनी राजनीतिक स्थिति और भविष्य को लेकर अलग-अलग विचार रखते हैं और वहां आत्मनिर्णय का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का रुख
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा है कि प्रस्तावित समझौता आर्कटिक और उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में साझा सुरक्षा को मजबूत करता है। साथ ही उन्होंने ग्रीनलैंड और डेनमार्क की संप्रभुता तथा ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता दिए जाने पर जोर दिया।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन ने भी समझौते को सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में सकारात्मक बताया है। हालांकि, समझौते को लागू होने से पहले संबंधित संसदीय प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
आगे क्या होगा?
अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों के बीच समझौते पर अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताई गई है। इसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड में आवश्यक संसदीय प्रक्रिया पूरी की जानी है।
इस कारण आने वाले दिनों में समझौते की विस्तृत शर्तों पर विशेष ध्यान रहेगा। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का विस्तार किस रूप में होगा, विदेशी निवेश को लेकर क्या नियम बनाए जाएंगे और ग्रीनलैंड की सरकार की भूमिका किस प्रकार निर्धारित होगी।
निष्कर्ष
अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड का यह प्रस्तावित सुरक्षा समझौता आर्कटिक राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। अमेरिका इसे अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा जरूरतों से जोड़ रहा है, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इसकी रूपरेखा में संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार को बनाए रखने पर जोर दिया है। समझौते की वास्तविक तस्वीर इसके आधिकारिक दस्तावेज और संसदीय अनुमोदन के बाद अधिक स्पष्ट होगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य, रणनीतिक और कूटनीतिक महत्व आने वाले समय में और बढ़ सकता है।
नोट: यह लेख उपलब्ध रिपोर्टों और आधिकारिक डेनिश सरकारी जानकारी के आधार पर स्वतंत्र शब्दों में तैयार किया गया है। “100% unique” की गारंटी किसी बाहरी plagiarism checker के परिणाम के रूप में नहीं दी जा सकती।