कानपुर में 250 करोड़ रुपये के कथित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा, चार गिरफ्तार
अमरेश त्रिपाठी
हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात
कानपुर, 26 सितंबर 2026। उत्तर प्रदेश के कानपुर में साइबर अपराध के खिलाफ चल रही कार्रवाई के दौरान पुलिस ने एक बड़े कथित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का खुलासा करने का दावा किया है। पुलिस के मुताबिक इस नेटवर्क से जुड़े बैंक खातों में करीब 250 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन का पता चला है। मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जांच में कथित तौर पर फर्जी पहचान दस्तावेजों और म्यूल बैंक खातों के इस्तेमाल की बात सामने आई है।

पुलिस के अनुसार साइबर क्राइम सेल, रावतपुर और कल्याणपुर पुलिस की संयुक्त टीम ने इस मामले की जांच को आगे बढ़ाया। जांच के दौरान ऐसे बैंक खातों और संस्थाओं की जानकारी सामने आई, जिनका इस्तेमाल कथित रूप से ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़ी रकम को इधर-उधर भेजने के लिए किया जा रहा था। अधिकारियों का कहना है कि पूरे नेटवर्क की वित्तीय कड़ियों को समझने के लिए बैंक रिकॉर्ड और साइबर शिकायतों का मिलान किया जा रहा है।
एनसीआरपी पोर्टल से सामने आया संदिग्ध लेन-देन
पुलिस की जांच में नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीआरपी पर दर्ज शिकायतों से अहम सुराग मिलने की बात कही गई है। अधिकारियों के अनुसार एक संदिग्ध बैंक खाते की जांच के दौरान केवल तीन दिनों में लगभग आठ करोड़ रुपये के लेन-देन का पता चला। इस खाते से अलग-अलग राज्यों में दर्ज साइबर अपराध की शिकायतों का संबंध भी सामने आया।
जांच आगे बढ़ने पर पुलिस ने उन लोगों और खातों की जानकारी जुटानी शुरू की, जिनके जरिए धनराशि एक खाते से दूसरे खाते में स्थानांतरित होने की आशंका थी। इसी क्रम में कथित म्यूल खातों का नेटवर्क सामने आया।
फर्जी दस्तावेजों से खाते खुलवाने का आरोप
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार किए गए लोगों पर कूटरचित आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल कर बैंक खाते खुलवाने का आरोप है। ऐसे खातों को आम तौर पर ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है। साइबर अपराध की जांच में म्यूल खाते इसलिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि इनके जरिए ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में भेजने की कोशिश की जा सकती है।
पुलिस का आरोप है कि इस नेटवर्क में फर्जी पहचान दस्तावेजों के आधार पर खाते तैयार करवाए जाते थे और फिर उनका इस्तेमाल संदिग्ध धनराशि के लेन-देन में किया जाता था। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन खातों को कौन संचालित करता था, इनके जरिए कितनी रकम गुजरी और इस पूरी व्यवस्था में अन्य कौन-कौन लोग जुड़े हो सकते हैं।
चार लोगों की गिरफ्तारी
पुलिस ने मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। रिपोर्टों के अनुसार गिरफ्तार लोगों में औरैया निवासी विपिन और शिवप्रताप, औरैया के बिधूना निवासी राजशेखर उर्फ अजीत तथा कानपुर देहात के रनियां निवासी हिमांशु गौतम शामिल हैं। पुलिस इनसे पूछताछ के आधार पर नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और खातों की जानकारी जुटा रही है।
पुलिस ने राजशेखर को कथित नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्ति बताया है। जांच एजेंसियों के अनुसार फर्जी दस्तावेजों के आधार पर म्यूल खाते उपलब्ध कराने में उसकी भूमिका की जांच की जा रही है। हालांकि इन आरोपों का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
कानपुर में कार्यालय की भी जांच
जांच के दौरान पुलिस की नजर कानपुर के विजय नगर चौराहे पर स्थित एक कार्यालय पर भी गई। पुलिस के अनुसार हिमांशु गौतम ने यहां ‘ऑर्बिट बिल्ड इंफ्रास्ट्रक्चर’ नाम से कार्यालय खोला था और कथित तौर पर म्यूल खातों तथा साइबर अपराध से जुड़े वित्तीय लेन-देन से संबंधित गतिविधियों की जांच इस कार्यालय से जुड़ रही है।
अब जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कार्यालय में वास्तव में किस प्रकार की गतिविधियां होती थीं और वहां मौजूद दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड तथा इलेक्ट्रॉनिक सामग्री से नेटवर्क के बारे में क्या जानकारी मिल सकती है।
250 करोड़ रुपये की रकम को लेकर क्या सामने आया?
इस मामले में करीब 250 करोड़ रुपये की राशि का उल्लेख पुलिस जांच के संदर्भ में किया जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार यह रकम कथित नेटवर्क से जुड़े संदिग्ध लेन-देन की जांच से संबंधित है। इसलिए इसे सीधे तौर पर अदालत द्वारा प्रमाणित ‘250 करोड़ रुपये की चोरी’ कहना सही नहीं होगा।
पुलिस अब वित्तीय रिकॉर्ड का विश्लेषण कर यह निर्धारित करने की कोशिश कर रही है कि कितनी धनराशि वास्तव में साइबर अपराध से संबंधित थी, कितने खातों का इस्तेमाल हुआ और रकम का अंतिम प्रवाह किन लोगों या संस्थाओं तक पहुंचा।
देश के अलग-अलग राज्यों की शिकायतों से जुड़ी कड़ी
साइबर अपराध की इस जांच में अलग-अलग राज्यों से दर्ज शिकायतों का जुड़ना मामले को और व्यापक बनाता है। पुलिस के अनुसार एक संदिग्ध खाते से 115 शिकायतों का संबंध मिला था। कुछ अन्य रिपोर्टों में नेटवर्क से जुड़े कथित फर्जी खातों और संस्थाओं के संबंध में इससे अधिक शिकायतों का उल्लेख किया गया है। इन आंकड़ों का अंतिम सत्यापन जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
ऐसी स्थिति में जांचकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग शिकायतों में समान बैंक खाते, मोबाइल नंबर, दस्तावेज, डिजिटल पहचान और धनराशि के प्रवाह को जोड़ना होती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग घटनाओं के पीछे एक ही नेटवर्क सक्रिय था या अलग-अलग समूहों के बीच कोई वित्तीय संबंध था।
साइबर अपराध की बदलती कार्यप्रणाली
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि ऑनलाइन ठगी केवल फोन कॉल या फर्जी लिंक तक सीमित नहीं रह गई है। साइबर अपराध की जांच में बैंक खाते, पहचान दस्तावेज, फर्जी संस्थाएं और डिजिटल लेन-देन भी महत्वपूर्ण कड़ियां बन चुके हैं।
म्यूल खाते ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति या समूह की ओर से धनराशि प्राप्त करने अथवा आगे भेजने के लिए किया जा सकता है। जांच एजेंसियों के लिए ऐसे खातों की पहचान करना महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इनसे पैसे के प्रवाह का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
आगे और लोगों से पूछताछ की संभावना
चार आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की जांच अब कथित नेटवर्क की अगली कड़ियों तक पहुंचने पर केंद्रित है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी दस्तावेज किस स्तर पर तैयार किए जाते थे, खाते किसके नाम पर खोले गए, उनका संचालन कौन करता था और कथित साइबर धोखाधड़ी की रकम आगे कहां भेजी जाती थी।
जांच में बैंक रिकॉर्ड, एनसीआरपी शिकायतें, दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पुलिस के अनुसार पूछताछ से सामने आने वाली जानकारी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
आम लोगों के लिए महत्वपूर्ण सावधानी
इस घटना से बैंक खाते और पहचान दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं। किसी अन्य व्यक्ति को अपने बैंक खाते का इस्तेमाल करने देना, बैंकिंग विवरण साझा करना या बिना पूरी जानकारी के किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना भविष्य में कानूनी और वित्तीय परेशानी पैदा कर सकता है।
साइबर अपराध से बचने के लिए लोगों को अनजान व्यक्तियों के साथ बैंकिंग जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड और संवेदनशील पहचान संबंधी जानकारी साझा करने से बचना चाहिए। किसी संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जानकारी मिलने पर संबंधित बैंक और आधिकारिक साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था को तत्काल सूचित करना महत्वपूर्ण है।
फिलहाल कानपुर पुलिस की जांच जारी है। गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के आधार पर होगी। पुलिस की अगली कार्रवाई से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि कथित 250 करोड़ रुपये के लेन-देन में वास्तविक साइबर अपराध की रकम कितनी थी और इस नेटवर्क का विस्तार किन-किन क्षेत्रों तथा लोगों तक था।