सड़क के लिए 11 दिन से धरने पर लीला साहू, समर्थन में पहुंचीं महापौर की गाड़ी भी बदहाल रास्ते में फंसी

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सीधी, मध्य प्रदेश, 26 सितंबर 2026। मध्य प्रदेश के सीधी जिले की रामपुर नैकिन तहसील स्थित खड्डी खुर्द गांव में सड़क निर्माण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। गांव की सड़क को पक्का कराने की मांग को लेकर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर लीला साहू ग्रामीणों के साथ धरने पर बैठी हैं। सड़क की खराब स्थिति और लंबे समय से चली आ रही मांग ने अब स्थानीय प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध हालिया रिपोर्टों के अनुसार, लीला साहू का आंदोलन 14 सितंबर 2026 से जारी है।

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दो साल से सड़क निर्माण की मांग

खड्डी खुर्द और उससे जुड़े बगैहा टोला के ग्रामीण लंबे समय से बेहतर सड़क की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इस मार्ग को लेकर वर्ष 2024 से आवाज उठाई जा रही है। खड्डी खुर्द से गजरी तक लगभग 10.50 किलोमीटर सड़क के निर्माण की मांग सामने आई है। ग्रामीणों का कहना है कि मार्ग का कुछ हिस्सा अलग क्षेत्र में आता है और एक हिस्से में निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन खड्डी खुर्द की तरफ का पूरा मार्ग अभी भी समस्या बना हुआ है।

लीला साहू का कहना है कि ग्रामीणों ने सड़क के लिए कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचाई। उनके अनुसार, समय-समय पर आश्वासन मिले, लेकिन पूरी सड़क को लेकर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। इसी के बाद उन्होंने ग्रामीणों के साथ धरना शुरू करने का फैसला किया।

धरना स्थल तक पहुंचना भी बनी चुनौती

सड़क की वास्तविक स्थिति का अंदाजा उस समय देखने को मिला, जब सिंगरौली नगर निगम की महापौर रानी अग्रवाल आंदोलन के समर्थन में खड्डी खुर्द पहुंचीं। रिपोर्टों के अनुसार, महापौर की गाड़ी खराब और कीचड़युक्त रास्ते में फंस गई। ग्रामीणों की मदद से वाहन को निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन इसके बाद महापौर को आगे का रास्ता पैदल तय करना पड़ा। बताया गया कि उन्हें करीब दो किलोमीटर तक पैदल चलकर धरना स्थल तक पहुंचना पड़ा।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि जिस सड़क को लेकर ग्रामीण लंबे समय से शिकायत कर रहे हैं, उसी रास्ते से गुजरने वाले एक जनप्रतिनिधि के वाहन को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। महापौर के दौरे ने सड़क की स्थिति को लेकर चल रही चर्चा को और व्यापक बना दिया।

स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी असर का दावा

ग्रामीणों और आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि खराब सड़क का असर केवल सामान्य आवागमन पर नहीं पड़ता, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी पड़ता है। पूर्व की रिपोर्टों में गांव तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को लेकर विशेष चिंता सामने आई थी। बताया गया कि आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में ग्रामीणों को कठिन रास्ते का सामना करना पड़ता है।

विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं की स्थिति को लेकर लीला साहू पहले भी आवाज उठा चुकी हैं। वर्ष 2025 में उन्होंने गांव की महिलाओं के साथ सड़क निर्माण की मांग को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रमुखता से उठाया था। उस समय यह मामला व्यापक चर्चा में आया था।

गर्भावस्था के दौरान उठाया था सड़क का मुद्दा

लीला साहू ने पिछले वर्ष अपनी गर्भावस्था के दौरान भी गांव की सड़क को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि सड़क की खराब स्थिति के कारण गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में परेशानी होती है। इस मुद्दे को लेकर उनके वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आए और स्थानीय सड़क व्यवस्था पर सवाल उठे।

इसी दौरान सीधी के सांसद राजेश मिश्रा के एक कथित बयान को लेकर भी विवाद हुआ था। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनके बयान की अलग-अलग व्याख्या और शब्दांकन सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने प्रसव से पहले महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था किए जाने की बात कही थी। इस बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी सामने आई थीं।

राजनीतिक आरोपों के बीच सड़क का सवाल

सड़क का मुद्दा अब केवल स्थानीय सुविधा तक सीमित नहीं रह गया है। विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सितंबर 2026 में सड़क की स्थिति और ग्रामीणों की परेशानियों को लेकर सरकार तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सवाल किए। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है।

दूसरी ओर, आंदोलन के समर्थन में पहुंचीं रानी अग्रवाल ने कथित तौर पर यह बात उठाई कि गांव की सड़क जैसी बुनियादी जरूरत को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि ग्रामीणों को आवागमन की सुविधा मिलना मूलभूत आवश्यकता का विषय है।

आश्वासन नहीं, निर्माण की मांग

लीला साहू और ग्रामीणों की मुख्य मांग सड़क निर्माण को लेकर ठोस कार्रवाई की है। आंदोलन से जुड़े बयानों में यह बात सामने आई है कि ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं चाहते, बल्कि पूरी सड़क के निर्माण की दिशा में स्पष्ट कदम चाहते हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, खड्डी खुर्द से गजरी तक प्रस्तावित करीब 10.50 किलोमीटर मार्ग में अलग-अलग हिस्सों की स्थिति अलग है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि सड़क के एक हिस्से पर काम हो सकता है तो शेष हिस्से को भी निर्माण योजना में शामिल क्यों नहीं किया जा रहा।

सोशल मीडिया बना आंदोलन की आवाज

लीला साहू ने सड़क के मुद्दे को स्थानीय स्तर से निकालकर सोशल मीडिया तक पहुंचाया। उनके वीडियो के जरिए गांव की स्थिति और ग्रामीणों की समस्याएं बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचीं। वर्ष 2024 से सड़क निर्माण की मांग उठाने के बाद यह मुद्दा कई बार सार्वजनिक चर्चा में आया। वर्ष 2025 में भी उनकी मुहिम को राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिली थी।

सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय समस्याओं को सामने लाने का यह तरीका ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को व्यापक मंच देने का उदाहरण भी बन रहा है।

अब प्रशासन पर निगाह

लगातार धरने और सड़क की स्थिति सामने आने के बाद अब लोगों की निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सड़क निर्माण की समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा और आवागमन के लिए बेहतर मार्ग उपलब्ध कराया जाएगा।

फिलहाल लीला साहू का आंदोलन जारी है। एक तरफ ग्रामीण सड़क निर्माण की मांग पर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के कारण मामला व्यापक चर्चा में आ चुका है। महापौर की गाड़ी का खराब रास्ते में फंसना भी इस विवाद का एक प्रमुख दृश्य बन गया है।

खड्डी खुर्द की कहानी अब सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं रह गई है। यह इस सवाल से जुड़ गई है कि दूरदराज के गांवों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाएं कितनी आसानी से पहुंचती हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन सड़क निर्माण को लेकर क्या निर्णय लेता है और ग्रामीणों का आंदोलन किस दिशा में जाता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

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सड़क के लिए 11 दिन से धरने पर लीला साहू, समर्थन में पहुंचीं महापौर की गाड़ी भी बदहाल रास्ते में फंसी

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:सितम्बर 26, 2026

सीधी, मध्य प्रदेश, 26 सितंबर 2026। मध्य प्रदेश के सीधी जिले की रामपुर नैकिन तहसील स्थित खड्डी खुर्द गांव में सड़क निर्माण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। गांव की सड़क को पक्का कराने की मांग को लेकर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर लीला साहू ग्रामीणों के साथ धरने पर बैठी हैं। सड़क की खराब स्थिति और लंबे समय से चली आ रही मांग ने अब स्थानीय प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध हालिया रिपोर्टों के अनुसार, लीला साहू का आंदोलन 14 सितंबर 2026 से जारी है।

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दो साल से सड़क निर्माण की मांग

खड्डी खुर्द और उससे जुड़े बगैहा टोला के ग्रामीण लंबे समय से बेहतर सड़क की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इस मार्ग को लेकर वर्ष 2024 से आवाज उठाई जा रही है। खड्डी खुर्द से गजरी तक लगभग 10.50 किलोमीटर सड़क के निर्माण की मांग सामने आई है। ग्रामीणों का कहना है कि मार्ग का कुछ हिस्सा अलग क्षेत्र में आता है और एक हिस्से में निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन खड्डी खुर्द की तरफ का पूरा मार्ग अभी भी समस्या बना हुआ है।

लीला साहू का कहना है कि ग्रामीणों ने सड़क के लिए कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचाई। उनके अनुसार, समय-समय पर आश्वासन मिले, लेकिन पूरी सड़क को लेकर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। इसी के बाद उन्होंने ग्रामीणों के साथ धरना शुरू करने का फैसला किया।

धरना स्थल तक पहुंचना भी बनी चुनौती

सड़क की वास्तविक स्थिति का अंदाजा उस समय देखने को मिला, जब सिंगरौली नगर निगम की महापौर रानी अग्रवाल आंदोलन के समर्थन में खड्डी खुर्द पहुंचीं। रिपोर्टों के अनुसार, महापौर की गाड़ी खराब और कीचड़युक्त रास्ते में फंस गई। ग्रामीणों की मदद से वाहन को निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन इसके बाद महापौर को आगे का रास्ता पैदल तय करना पड़ा। बताया गया कि उन्हें करीब दो किलोमीटर तक पैदल चलकर धरना स्थल तक पहुंचना पड़ा।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि जिस सड़क को लेकर ग्रामीण लंबे समय से शिकायत कर रहे हैं, उसी रास्ते से गुजरने वाले एक जनप्रतिनिधि के वाहन को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। महापौर के दौरे ने सड़क की स्थिति को लेकर चल रही चर्चा को और व्यापक बना दिया।

स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी असर का दावा

ग्रामीणों और आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि खराब सड़क का असर केवल सामान्य आवागमन पर नहीं पड़ता, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी पड़ता है। पूर्व की रिपोर्टों में गांव तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को लेकर विशेष चिंता सामने आई थी। बताया गया कि आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में ग्रामीणों को कठिन रास्ते का सामना करना पड़ता है।

विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं की स्थिति को लेकर लीला साहू पहले भी आवाज उठा चुकी हैं। वर्ष 2025 में उन्होंने गांव की महिलाओं के साथ सड़क निर्माण की मांग को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रमुखता से उठाया था। उस समय यह मामला व्यापक चर्चा में आया था।

गर्भावस्था के दौरान उठाया था सड़क का मुद्दा

लीला साहू ने पिछले वर्ष अपनी गर्भावस्था के दौरान भी गांव की सड़क को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि सड़क की खराब स्थिति के कारण गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में परेशानी होती है। इस मुद्दे को लेकर उनके वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आए और स्थानीय सड़क व्यवस्था पर सवाल उठे।

इसी दौरान सीधी के सांसद राजेश मिश्रा के एक कथित बयान को लेकर भी विवाद हुआ था। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनके बयान की अलग-अलग व्याख्या और शब्दांकन सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने प्रसव से पहले महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था किए जाने की बात कही थी। इस बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी सामने आई थीं।

राजनीतिक आरोपों के बीच सड़क का सवाल

सड़क का मुद्दा अब केवल स्थानीय सुविधा तक सीमित नहीं रह गया है। विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सितंबर 2026 में सड़क की स्थिति और ग्रामीणों की परेशानियों को लेकर सरकार तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सवाल किए। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है।

दूसरी ओर, आंदोलन के समर्थन में पहुंचीं रानी अग्रवाल ने कथित तौर पर यह बात उठाई कि गांव की सड़क जैसी बुनियादी जरूरत को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि ग्रामीणों को आवागमन की सुविधा मिलना मूलभूत आवश्यकता का विषय है।

आश्वासन नहीं, निर्माण की मांग

लीला साहू और ग्रामीणों की मुख्य मांग सड़क निर्माण को लेकर ठोस कार्रवाई की है। आंदोलन से जुड़े बयानों में यह बात सामने आई है कि ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं चाहते, बल्कि पूरी सड़क के निर्माण की दिशा में स्पष्ट कदम चाहते हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, खड्डी खुर्द से गजरी तक प्रस्तावित करीब 10.50 किलोमीटर मार्ग में अलग-अलग हिस्सों की स्थिति अलग है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि सड़क के एक हिस्से पर काम हो सकता है तो शेष हिस्से को भी निर्माण योजना में शामिल क्यों नहीं किया जा रहा।

सोशल मीडिया बना आंदोलन की आवाज

लीला साहू ने सड़क के मुद्दे को स्थानीय स्तर से निकालकर सोशल मीडिया तक पहुंचाया। उनके वीडियो के जरिए गांव की स्थिति और ग्रामीणों की समस्याएं बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचीं। वर्ष 2024 से सड़क निर्माण की मांग उठाने के बाद यह मुद्दा कई बार सार्वजनिक चर्चा में आया। वर्ष 2025 में भी उनकी मुहिम को राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिली थी।

सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय समस्याओं को सामने लाने का यह तरीका ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को व्यापक मंच देने का उदाहरण भी बन रहा है।

अब प्रशासन पर निगाह

लगातार धरने और सड़क की स्थिति सामने आने के बाद अब लोगों की निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सड़क निर्माण की समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा और आवागमन के लिए बेहतर मार्ग उपलब्ध कराया जाएगा।

फिलहाल लीला साहू का आंदोलन जारी है। एक तरफ ग्रामीण सड़क निर्माण की मांग पर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के कारण मामला व्यापक चर्चा में आ चुका है। महापौर की गाड़ी का खराब रास्ते में फंसना भी इस विवाद का एक प्रमुख दृश्य बन गया है।

खड्डी खुर्द की कहानी अब सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं रह गई है। यह इस सवाल से जुड़ गई है कि दूरदराज के गांवों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाएं कितनी आसानी से पहुंचती हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन सड़क निर्माण को लेकर क्या निर्णय लेता है और ग्रामीणों का आंदोलन किस दिशा में जाता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।