ऊर्जा भू-राजनीति का नया अध्याय: अमेरिकी कोयला और एशिया के साथ उभरता गठजोड़

12 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन डीसी में आयोजित Champion of Coal कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया और भारत के साथ कोयला निर्यात को लेकर एक बड़ा व्यापारिक समझौता किया है। इस समझौते का उद्देश्य अमेरिकी कोयले के निर्यात को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना है। ट्रंप ने अमेरिकी कोयले को उच्च गुणवत्ता वाला और विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत बताते हुए संकेत दिया कि अमेरिका वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहता है।
यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला की स्थिरता और रणनीतिक साझेदारियाँ वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।
अमेरिका की ऊर्जा रणनीति: आत्मनिर्भरता से निर्यात शक्ति तक
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने शेल गैस, तेल और कोयले के उत्पादन में वृद्धि कर अपनी ऊर्जा क्षमता को मजबूत किया है। अब लक्ष्य केवल घरेलू मांग को पूरा करना नहीं, बल्कि एशियाई बाजारों में निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराना है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे औद्योगिक राष्ट्र ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, जबकि भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते ऊर्जा की विशाल मांग रखता है।
इन तीनों देशों के साथ कोयला व्यापार बढ़ाना अमेरिका को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक लाभ भी प्रदान कर सकता है। ऊर्जा सहयोग अक्सर सुरक्षा और रक्षा संबंधों को भी मजबूती देता है, जिससे व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न होता है।
भारत का रुख: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
भारत ने इस पर स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी एक देश पर निर्भर नहीं होगी। 9 फरवरी को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि ऊर्जा आयात के निर्णय पूरी तरह राष्ट्रीय हित, लागत-प्रभावशीलता, उपलब्धता और आपूर्ति की विश्वसनीयता के आधार पर होंगे।
भारत लंबे समय से अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में कार्य कर रहा है। रूस से तेल आयात में आंशिक कमी और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश इसी नीति का हिस्सा है। भारत की तेल और कोयला खरीद अक्सर बाजार मूल्य, परिवहन लागत और भू-राजनीतिक जोखिमों के व्यापक मूल्यांकन के बाद तय होती है।
इस परिप्रेक्ष्य में अमेरिका के साथ बढ़ता व्यापार भारत को ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प प्रदान कर सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय व्यावहारिक और आर्थिक मानकों पर ही आधारित रहेगा।
एशिया-प्रशांत में शक्ति संतुलन
अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया पहले से ही सुरक्षा साझेदार हैं। अब ऊर्जा सहयोग इस त्रिकोण को और मजबूत कर सकता है। ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक विकास की आधारशिला है।
भारत का इस समझौते में शामिल होना व्यापक सामरिक संतुलन का संकेत देता है। भारत पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से संबंध बनाए रखते हुए नए विकल्पों के लिए भी खुला है। यह संतुलनकारी नीति उसे वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा के बीच लचीलापन प्रदान करती है।
आर्थिक और पर्यावरणीय प्रश्न
हालाँकि यह समझौता आर्थिक दृष्टि से लाभकारी हो सकता है, लेकिन कोयले के बढ़ते उपयोग पर पर्यावरणीय चिंताएँ भी उठती हैं। जलवायु परिवर्तन के वैश्विक लक्ष्यों के बीच कोयले की भूमिका पर बहस जारी है। कई देश अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता पारंपरिक स्रोतों को पूरी तरह छोड़ने की अनुमति नहीं देती।
अतः यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष: ऊर्जा से आगे की राजनीति
अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत के बीच यह नया ऊर्जा समझौता केवल व्यापार का विस्तार नहीं है। यह शक्ति संतुलन, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक आर्थिक पुनर्संरचना का हिस्सा है।
अमेरिका अपने ऊर्जा संसाधनों को अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के साधन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि भारत व्यावहारिकता और राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखकर बहुआयामी संतुलन बना रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह ऊर्जा गठजोड़ एशिया-प्रशांत क्षेत्र की राजनीतिक और आर्थिक दिशा को किस हद तक प्रभावित करता है।
