सागरमंथन 2026 में समुद्री विकास पर विशेष चर्चा

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भारत के समुद्री क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए नई दिल्ली में ‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग 2026’ का आयोजन किया गया। इस मंच पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने समुद्री व्यापार, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की तकनीकों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।

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इस आयोजन का उद्देश्य समुद्रों को केवल परिवहन के साधन के रूप में देखने के बजाय उन्हें साझा आर्थिक प्रगति, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में विकसित करना है। सम्मेलन के दूसरे दिन सरबानंद सोनोवाल ने सऊदी अरब, बेल्जियम और भूटान के प्रतिनिधियों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर बातचीत की।

सऊदी अरब के साथ बंदरगाह परियोजनाओं में निवेश पर चर्चा

भारत और सऊदी अरब के बीच समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बातचीत हुई। सऊदी पोर्ट्स अथॉरिटी (मवानी) के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक में भारत की प्रमुख बंदरगाह परियोजनाओं में संभावित निवेश पर विचार किया गया।

इस दौरान महाराष्ट्र में प्रस्तावित वधावन बंदरगाह और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में गलाथिया बे बंदरगाह परियोजना का उल्लेख किया गया। इसके साथ ही जहाज निर्माण, समुद्री कर्मचारियों के प्रशिक्षण और आपूर्ति शृंखला को अधिक मजबूत बनाने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।

सऊदी अरब की ओर से भारतीय बंदरगाह परियोजनाओं तथा मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड में निवेश करने में रुचि व्यक्त की गई। हालांकि, निवेश में रुचि और वास्तविक निवेश के बीच अंतर होता है। इसलिए परियोजनाओं की प्रगति और निवेश संबंधी अंतिम निर्णयों पर आगे नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

बंदरगाहों में निवेश बढ़ने से माल ढुलाई की क्षमता, परिवहन सुविधाओं और व्यापारिक संपर्कों को बेहतर बनाने के अवसर मिल सकते हैं। इससे भारत के निर्यातकों और आयातकों को भी लाभ पहुंचने की संभावना है।

बेल्जियम के साथ हरित नौवहन को बढ़ावा

समुद्री परिवहन से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत और बेल्जियम के बीच हरित नौवहन गलियारा विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

केंद्रीय मंत्री सरबानंद सोनोवाल और फ्लेमिश क्षेत्र की मंत्री एनिक डी रिडर के बीच हुई बातचीत में भारतीय बंदरगाहों को एंटवर्प-ब्रूज बंदरगाह से जोड़ने वाले संभावित हरित नौवहन गलियारे पर विचार किया गया।

इस पहल में पर्यावरण के अनुकूल ईंधन, स्मार्ट पोर्ट तकनीक और बंदरगाहों के विकास से जुड़ी विशेषज्ञता को साझा करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य समुद्री परिवहन को अधिक कुशल बनाना और भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले विकल्पों को बढ़ावा देना है।

हरित नौवहन के अंतर्गत स्वच्छ ईंधन, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत के लिए इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय अनुभव का लाभ उठाना अपनी बंदरगाह सुविधाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है।

भूटान के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए अवसर

भारत और भूटान के बीच समुद्री सहयोग की चर्चा मुख्य रूप से अंतर्देशीय जलमार्गों और क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था पर केंद्रित रही। भूटान एक स्थलरुद्ध देश है, इसलिए उसके लिए पड़ोसी देशों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाना विशेष महत्व रखता है।

बैठक में राष्ट्रीय जलमार्ग-2 और जोगीघोपा टर्मिनल की उपयोगिता पर चर्चा की गई। ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े इस मार्ग को भूटान के व्यापारिक संपर्कों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

इसके अलावा मानस और संकोश नदियों की संभावनाओं तथा राष्ट्रीय जलमार्गों के साथ उनके बेहतर संपर्क पर भी विचार हुआ। यदि संबंधित परियोजनाओं और व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से विकसित किया जाता है, तो क्षेत्र में माल परिवहन के अतिरिक्त विकल्प तैयार हो सकते हैं।

दोनों देशों ने भूटान के युवाओं को समुद्री क्षेत्र से संबंधित प्रशिक्षण देने की संभावनाओं पर भी चर्चा की। डिब्रूगढ़ में विकसित किए जा रहे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से प्रशिक्षण और कौशल विकास में सहयोग बढ़ाने का विषय सामने आया।

समुद्री क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी पर जोर

भारत के समुद्री उद्योग को मजबूत बनाने के लिए प्रशिक्षित और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है। जहाजों का संचालन, बंदरगाह प्रबंधन, माल परिवहन, समुद्री सुरक्षा और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें प्रशिक्षित युवाओं के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं।

सरबानंद सोनोवाल ने युवाओं को भारत के समुद्री भविष्य का प्रमुख आधार बताया। उनका जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर रहा, जिसमें समुद्री क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को उचित प्रशिक्षण, व्यावहारिक अनुभव और आगे बढ़ने के अवसर मिलें।

इस दिशा में शिपयार्ड और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) के बीच सहयोग भी महत्वपूर्ण है। सरकारी जानकारी के अनुसार, शिपयार्ड-आईटीआई साझेदारी के तहत प्रशिक्षुओं को 150 घंटे का ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा सामान्य उद्देश्य रेटिंग और समुद्री खानपान से जुड़े प्रशिक्षुओं के लिए छह महीने का जहाज पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया गया है।

ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों से युवाओं को कक्षा में प्राप्त ज्ञान को वास्तविक कार्यस्थल की जरूरतों से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

समुद्री क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

समुद्री उद्योग लंबे समय तक पुरुष-प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन अब महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। सागर में सम्मान जैसी पहल महिलाओं को समुद्री क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सक्रिय महिला नाविकों की संख्या वर्ष 2021 में 1,599 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 7,033 हो गई। सरकार ने वर्ष 2030 तक समुद्री क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ‘मिशन 20 प्रतिशत’ का लक्ष्य भी सामने रखा है।

सागरमंथन के दौरान महिला अधिकारियों के अनुभवों और उपलब्धियों को भी महत्व दिया गया। महिला कैडेटों को प्रेरित करने के लिए तीनों सेनाओं की महिलाओं से जुड़े नौकायन अभियान की भागीदारी उल्लेखनीय रही।

महिलाओं के लिए प्रशिक्षण, सुरक्षित कार्यस्थल और समान अवसर सुनिश्चित करना इस क्षेत्र में दीर्घकालिक बदलाव के लिए आवश्यक है। इससे न केवल रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे, बल्कि समुद्री उद्योग को अधिक विविध और प्रतिभाशाली कार्यबल भी मिलेगा।

भारत के समुद्री बुनियादी ढांचे में बदलाव

भारत की अर्थव्यवस्था के विकास में बंदरगाहों और समुद्री परिवहन की महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकारी जानकारी के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में देश की बंदरगाह क्षमता 1,561 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़कर 2,817 मिलियन टन प्रतिवर्ष हो गई है।

इसी अवधि में बंदरगाहों पर संभाले जाने वाले माल की मात्रा 1,052 मिलियन टन से बढ़कर 1,668 मिलियन टन पहुंच गई। अंतर्देशीय जलमार्गों से माल परिवहन भी 29 मिलियन टन से बढ़कर 218 मिलियन टन हुआ।

कंटेनर जहाजों के बंदरगाह पर ठहरने के औसत समय में भी सुधार दर्ज किया गया है। सरकारी आंकड़ों में इस अवधि के दौरान औसत समय 35 घंटे से घटकर 23 घंटे होने की जानकारी दी गई है।

ये आंकड़े समुद्री परिवहन की बढ़ती क्षमता और परिचालन दक्षता में सुधार की दिशा को दर्शाते हैं। हालांकि, इस प्रगति को आगे बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक, कुशल कर्मचारियों, बेहतर संपर्क व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण पर लगातार काम करना होगा।

हरित ऊर्जा और भविष्य की तैयारी

भारत समुद्री क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को भी बढ़ावा देना चाहता है। हरित हाइड्रोजन, हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल जैसे ईंधनों की उपलब्धता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।

सरकार की योजना भारतीय बंदरगाहों को भविष्य में हरित ईंधन की आपूर्ति और जहाजों में ईंधन भरने के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित करने की है। यह प्रयास भारत के वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य के व्यापक संदर्भ से भी जुड़ा है।

हालांकि, इन विकल्पों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए तकनीकी विकास, निवेश, सुरक्षित भंडारण और पर्याप्त आपूर्ति जैसी चुनौतियों का समाधान करना होगा। अंतरराष्ट्रीय साझेदारी इन चुनौतियों से निपटने में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष

सरबानंद सोनोवाल की सऊदी अरब, बेल्जियम और भूटान के प्रतिनिधियों के साथ हुई बातचीत भारत की समुद्री विकास रणनीति के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाती है। इसमें बंदरगाहों में संभावित निवेश, हरित नौवहन, क्षेत्रीय व्यापार, कौशल विकास और महिलाओं की भागीदारी शामिल हैं।

भारत के लिए समुद्री क्षेत्र को मजबूत बनाना केवल बंदरगाहों का विस्तार करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए कुशल युवा, प्रशिक्षित महिला नाविक, आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां भी आवश्यक हैं।

यदि इन पहलों को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाता है, तो भारत अपने समुद्री उद्योग की क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकता है। इससे व्यापारिक संपर्कों को मजबूत करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था में देश की भूमिका को विस्तार देने में सहायता मिल सकती है।

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सागरमंथन 2026 में समुद्री विकास पर विशेष चर्चा

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अक्टूबर 9, 2026

भारत के समुद्री क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए नई दिल्ली में ‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग 2026’ का आयोजन किया गया। इस मंच पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने समुद्री व्यापार, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की तकनीकों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।

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इस आयोजन का उद्देश्य समुद्रों को केवल परिवहन के साधन के रूप में देखने के बजाय उन्हें साझा आर्थिक प्रगति, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में विकसित करना है। सम्मेलन के दूसरे दिन सरबानंद सोनोवाल ने सऊदी अरब, बेल्जियम और भूटान के प्रतिनिधियों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर बातचीत की।

सऊदी अरब के साथ बंदरगाह परियोजनाओं में निवेश पर चर्चा

भारत और सऊदी अरब के बीच समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बातचीत हुई। सऊदी पोर्ट्स अथॉरिटी (मवानी) के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक में भारत की प्रमुख बंदरगाह परियोजनाओं में संभावित निवेश पर विचार किया गया।

इस दौरान महाराष्ट्र में प्रस्तावित वधावन बंदरगाह और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में गलाथिया बे बंदरगाह परियोजना का उल्लेख किया गया। इसके साथ ही जहाज निर्माण, समुद्री कर्मचारियों के प्रशिक्षण और आपूर्ति शृंखला को अधिक मजबूत बनाने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।

सऊदी अरब की ओर से भारतीय बंदरगाह परियोजनाओं तथा मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड में निवेश करने में रुचि व्यक्त की गई। हालांकि, निवेश में रुचि और वास्तविक निवेश के बीच अंतर होता है। इसलिए परियोजनाओं की प्रगति और निवेश संबंधी अंतिम निर्णयों पर आगे नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

बंदरगाहों में निवेश बढ़ने से माल ढुलाई की क्षमता, परिवहन सुविधाओं और व्यापारिक संपर्कों को बेहतर बनाने के अवसर मिल सकते हैं। इससे भारत के निर्यातकों और आयातकों को भी लाभ पहुंचने की संभावना है।

बेल्जियम के साथ हरित नौवहन को बढ़ावा

समुद्री परिवहन से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत और बेल्जियम के बीच हरित नौवहन गलियारा विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

केंद्रीय मंत्री सरबानंद सोनोवाल और फ्लेमिश क्षेत्र की मंत्री एनिक डी रिडर के बीच हुई बातचीत में भारतीय बंदरगाहों को एंटवर्प-ब्रूज बंदरगाह से जोड़ने वाले संभावित हरित नौवहन गलियारे पर विचार किया गया।

इस पहल में पर्यावरण के अनुकूल ईंधन, स्मार्ट पोर्ट तकनीक और बंदरगाहों के विकास से जुड़ी विशेषज्ञता को साझा करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य समुद्री परिवहन को अधिक कुशल बनाना और भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले विकल्पों को बढ़ावा देना है।

हरित नौवहन के अंतर्गत स्वच्छ ईंधन, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत के लिए इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय अनुभव का लाभ उठाना अपनी बंदरगाह सुविधाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है।

भूटान के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए अवसर

भारत और भूटान के बीच समुद्री सहयोग की चर्चा मुख्य रूप से अंतर्देशीय जलमार्गों और क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था पर केंद्रित रही। भूटान एक स्थलरुद्ध देश है, इसलिए उसके लिए पड़ोसी देशों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाना विशेष महत्व रखता है।

बैठक में राष्ट्रीय जलमार्ग-2 और जोगीघोपा टर्मिनल की उपयोगिता पर चर्चा की गई। ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े इस मार्ग को भूटान के व्यापारिक संपर्कों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

इसके अलावा मानस और संकोश नदियों की संभावनाओं तथा राष्ट्रीय जलमार्गों के साथ उनके बेहतर संपर्क पर भी विचार हुआ। यदि संबंधित परियोजनाओं और व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से विकसित किया जाता है, तो क्षेत्र में माल परिवहन के अतिरिक्त विकल्प तैयार हो सकते हैं।

दोनों देशों ने भूटान के युवाओं को समुद्री क्षेत्र से संबंधित प्रशिक्षण देने की संभावनाओं पर भी चर्चा की। डिब्रूगढ़ में विकसित किए जा रहे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से प्रशिक्षण और कौशल विकास में सहयोग बढ़ाने का विषय सामने आया।

समुद्री क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी पर जोर

भारत के समुद्री उद्योग को मजबूत बनाने के लिए प्रशिक्षित और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है। जहाजों का संचालन, बंदरगाह प्रबंधन, माल परिवहन, समुद्री सुरक्षा और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें प्रशिक्षित युवाओं के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं।

सरबानंद सोनोवाल ने युवाओं को भारत के समुद्री भविष्य का प्रमुख आधार बताया। उनका जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर रहा, जिसमें समुद्री क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को उचित प्रशिक्षण, व्यावहारिक अनुभव और आगे बढ़ने के अवसर मिलें।

इस दिशा में शिपयार्ड और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) के बीच सहयोग भी महत्वपूर्ण है। सरकारी जानकारी के अनुसार, शिपयार्ड-आईटीआई साझेदारी के तहत प्रशिक्षुओं को 150 घंटे का ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा सामान्य उद्देश्य रेटिंग और समुद्री खानपान से जुड़े प्रशिक्षुओं के लिए छह महीने का जहाज पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया गया है।

ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों से युवाओं को कक्षा में प्राप्त ज्ञान को वास्तविक कार्यस्थल की जरूरतों से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

समुद्री क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

समुद्री उद्योग लंबे समय तक पुरुष-प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन अब महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। सागर में सम्मान जैसी पहल महिलाओं को समुद्री क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सक्रिय महिला नाविकों की संख्या वर्ष 2021 में 1,599 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 7,033 हो गई। सरकार ने वर्ष 2030 तक समुद्री क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ‘मिशन 20 प्रतिशत’ का लक्ष्य भी सामने रखा है।

सागरमंथन के दौरान महिला अधिकारियों के अनुभवों और उपलब्धियों को भी महत्व दिया गया। महिला कैडेटों को प्रेरित करने के लिए तीनों सेनाओं की महिलाओं से जुड़े नौकायन अभियान की भागीदारी उल्लेखनीय रही।

महिलाओं के लिए प्रशिक्षण, सुरक्षित कार्यस्थल और समान अवसर सुनिश्चित करना इस क्षेत्र में दीर्घकालिक बदलाव के लिए आवश्यक है। इससे न केवल रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे, बल्कि समुद्री उद्योग को अधिक विविध और प्रतिभाशाली कार्यबल भी मिलेगा।

भारत के समुद्री बुनियादी ढांचे में बदलाव

भारत की अर्थव्यवस्था के विकास में बंदरगाहों और समुद्री परिवहन की महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकारी जानकारी के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में देश की बंदरगाह क्षमता 1,561 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़कर 2,817 मिलियन टन प्रतिवर्ष हो गई है।

इसी अवधि में बंदरगाहों पर संभाले जाने वाले माल की मात्रा 1,052 मिलियन टन से बढ़कर 1,668 मिलियन टन पहुंच गई। अंतर्देशीय जलमार्गों से माल परिवहन भी 29 मिलियन टन से बढ़कर 218 मिलियन टन हुआ।

कंटेनर जहाजों के बंदरगाह पर ठहरने के औसत समय में भी सुधार दर्ज किया गया है। सरकारी आंकड़ों में इस अवधि के दौरान औसत समय 35 घंटे से घटकर 23 घंटे होने की जानकारी दी गई है।

ये आंकड़े समुद्री परिवहन की बढ़ती क्षमता और परिचालन दक्षता में सुधार की दिशा को दर्शाते हैं। हालांकि, इस प्रगति को आगे बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक, कुशल कर्मचारियों, बेहतर संपर्क व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण पर लगातार काम करना होगा।

हरित ऊर्जा और भविष्य की तैयारी

भारत समुद्री क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को भी बढ़ावा देना चाहता है। हरित हाइड्रोजन, हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल जैसे ईंधनों की उपलब्धता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।

सरकार की योजना भारतीय बंदरगाहों को भविष्य में हरित ईंधन की आपूर्ति और जहाजों में ईंधन भरने के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित करने की है। यह प्रयास भारत के वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य के व्यापक संदर्भ से भी जुड़ा है।

हालांकि, इन विकल्पों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए तकनीकी विकास, निवेश, सुरक्षित भंडारण और पर्याप्त आपूर्ति जैसी चुनौतियों का समाधान करना होगा। अंतरराष्ट्रीय साझेदारी इन चुनौतियों से निपटने में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष

सरबानंद सोनोवाल की सऊदी अरब, बेल्जियम और भूटान के प्रतिनिधियों के साथ हुई बातचीत भारत की समुद्री विकास रणनीति के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाती है। इसमें बंदरगाहों में संभावित निवेश, हरित नौवहन, क्षेत्रीय व्यापार, कौशल विकास और महिलाओं की भागीदारी शामिल हैं।

भारत के लिए समुद्री क्षेत्र को मजबूत बनाना केवल बंदरगाहों का विस्तार करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए कुशल युवा, प्रशिक्षित महिला नाविक, आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां भी आवश्यक हैं।

यदि इन पहलों को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाता है, तो भारत अपने समुद्री उद्योग की क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकता है। इससे व्यापारिक संपर्कों को मजबूत करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था में देश की भूमिका को विस्तार देने में सहायता मिल सकती है।