वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही सड़कें
राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण केवल वाहनों की आवाजाही को सुगम बनाने तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक सड़क परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना और प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखने के उपाय अपनाना भी जरूरी होता जा रहा है। खासकर उन क्षेत्रों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, जहां बाघ, हाथी, तेंदुए, हिरण और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही होती है।

जब किसी राजमार्ग का रास्ता जंगल या वन्यजीव गलियारे से होकर गुजरता है, तो सड़क वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन में बाधा बन सकती है। तेज गति से चलने वाले वाहन जानवरों के लिए खतरा पैदा करते हैं। इसके अलावा, सड़क की आवाज, रात में वाहनों की रोशनी और लगातार बढ़ता यातायात भी उनके व्यवहार तथा प्राकृतिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए वन्यजीव संरक्षण से संबंधित संरचनाओं का विकास महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनका उद्देश्य जानवरों को सड़क पर आने से रोकना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने प्राकृतिक आवास के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक सुरक्षित पहुंचने का रास्ता देना भी है।
क्या हैं वन्यजीव संरक्षण संरचनाएं?
वन्यजीव संरक्षण संरचनाएं ऐसी विशेष व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें सड़क और राजमार्ग परियोजनाओं में जानवरों की सुरक्षित आवाजाही को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। इनका स्वरूप क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, वहां पाए जाने वाले वन्यजीवों और उनकी आवाजाही के तरीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
इन संरचनाओं में मुख्य रूप से निम्नलिखित व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं:
- वन्यजीव अंडरपास: सड़क के नीचे बनाए गए रास्ते, जिनसे जानवर वाहनों के संपर्क में आए बिना एक ओर से दूसरी ओर जा सकते हैं।
- वन्यजीव ओवरपास: राजमार्ग के ऊपर तैयार किए गए विशेष मार्ग, जिन्हें प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप बनाया जा सकता है।
- सुरक्षा बाड़: सड़क के निर्धारित हिस्सों पर लगाई जाने वाली बाड़, जो जानवरों को सीधे यातायात वाले क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकने में मदद करती है।
- विशेष निकासी मार्ग: कुछ स्थानों पर ऐसे रास्तों की आवश्यकता होती है, जहां फंसे हुए जानवर सुरक्षित तरीके से सड़क क्षेत्र से बाहर निकल सकें।
- चेतावनी और निगरानी व्यवस्था: संवेदनशील इलाकों में संकेतक, निगरानी उपकरण और गति नियंत्रण जैसे उपाय दुर्घटनाओं की आशंका कम करने में सहायक हो सकते हैं।
हालांकि, हर संरचना हर प्रकार के वन्यजीव के लिए उपयुक्त नहीं होती। उदाहरण के लिए, हाथियों और छोटे स्तनधारी जीवों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। इसलिए इनका डिजाइन स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तैयार करना जरूरी है।
₹19,700 करोड़ से अधिक का निवेश क्यों महत्वपूर्ण है?
PIB की साझा की गई जानकारी के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण से जुड़े बुनियादी ढांचे पर ₹19,700 करोड़ से अधिक निवेश किया गया है। यह आंकड़ा सड़क विकास के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को जोड़ने के महत्व को रेखांकित करता है।
इस तरह के निवेश का लाभ केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं रहता। यदि संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाओं की आशंका कम होती है, तो वाहन चालकों और यात्रियों की सुरक्षा भी बेहतर हो सकती है। रात के समय राजमार्ग पार करने वाले जानवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकना सड़क सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि जारी जानकारी में बताए गए निवेश को केवल वन्यजीव अंडरपास या ओवरपास के निर्माण की लागत नहीं समझना चाहिए। उपलब्ध पोस्ट इसे वन्यजीव सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित बुनियादी ढांचे पर किए गए निवेश के रूप में बताती है।
इसके अतिरिक्त, किसी योजना की सफलता का आकलन केवल खर्च की गई राशि से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी आवश्यक है कि संरचनाओं का उपयोग वन्यजीव कितनी प्रभावी तरीके से कर रहे हैं और दुर्घटनाओं में कितनी कमी आई है।
2,150 से अधिक संरचनाओं पर काम
NHAI से संबंधित पोस्ट में देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर 2,150 से अधिक वन्यजीव संरक्षण संरचनाओं के निर्माण पूरा होने या प्रस्तावित होने का उल्लेख किया गया है। यह संख्या सड़क परियोजनाओं में वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखने के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।
हालांकि, इस आंकड़े में पूरी हो चुकी और प्रस्तावित संरचनाओं का संयुक्त उल्लेख है। इसलिए इसे सभी संरचनाओं के निर्माण पूरा होने की संख्या नहीं माना जाना चाहिए। अलग-अलग परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति, स्थान और निर्माण की प्रगति जानने के लिए संबंधित आधिकारिक विवरण देखना जरूरी है।
इन संरचनाओं का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि उनका निर्माण सही स्थान पर हुआ है या नहीं। यदि किसी अंडरपास का स्थान वन्यजीवों के नियमित आवागमन से मेल नहीं खाता, तो उसके प्रभावी उपयोग की संभावना कम हो सकती है। इसी कारण परियोजना शुरू होने से पहले वन्यजीवों की गतिविधियों, प्राकृतिक जल स्रोतों और जंगलों के बीच संपर्क का अध्ययन महत्वपूर्ण होता है।
सड़क विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन
भारत जैव विविधता के लिहाज से समृद्ध देश है। यहां अनेक राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और वन क्षेत्र मौजूद हैं। इन क्षेत्रों के आसपास सड़क संपर्क बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन और परिवहन को लाभ मिल सकता है, लेकिन अनियोजित निर्माण प्राकृतिक आवासों को नुकसान भी पहुंचा सकता है।
इस चुनौती का समाधान विकास परियोजनाओं को रोकना भर नहीं है, बल्कि उन्हें बेहतर योजना और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाना है। सड़क की दिशा तय करते समय संवेदनशील वन क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना, जहां संभव हो वहां नुकसान कम करने वाले विकल्प चुनना और निर्माण के बाद नियमित निगरानी करना आवश्यक है।
वन्यजीव संरक्षण संरचनाओं के साथ-साथ यातायात की गति नियंत्रित करना, संवेदनशील हिस्सों पर चेतावनी संकेत लगाना और स्थानीय प्रशासन तथा वन विभाग के बीच समन्वय बढ़ाना भी उपयोगी कदम हो सकते हैं।
निगरानी और रखरखाव की भी होगी अहम भूमिका
वन्यजीवों के लिए रास्ता तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। इन संरचनाओं का नियमित रखरखाव भी जरूरी है। यदि किसी अंडरपास में पानी भर जाए, रास्ता मलबे से बंद हो जाए या आसपास मानवीय गतिविधियां बढ़ जाएं, तो जानवर उसका इस्तेमाल करने से बच सकते हैं।
इसी तरह, सुरक्षा बाड़ में टूट-फूट होने पर वन्यजीव सीधे राजमार्ग तक पहुंच सकते हैं। इसलिए संबंधित एजेंसियों को समय-समय पर निरीक्षण करना चाहिए और आवश्यक मरम्मत सुनिश्चित करनी चाहिए।
कैमरा ट्रैप, क्षेत्रीय सर्वेक्षण और वन विभाग के आंकड़ों की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-सी संरचनाएं प्रभावी साबित हो रही हैं। इन निष्कर्षों के आधार पर भविष्य की परियोजनाओं में सुधार किया जा सकता है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। जंगलों के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों की गतिविधियों और उनके पारंपरिक रास्तों के बारे में उपयोगी जानकारी दे सकते हैं। इस जानकारी को वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जोड़कर संरक्षण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय राजमार्गों पर वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी NHAI की पहल भारत में सड़क विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पिछले पांच वर्षों में ₹19,700 करोड़ से अधिक के निवेश और 2,150 से ज्यादा संरचनाओं के निर्माण पूरा होने या प्रस्तावित होने का उल्लेख इस विषय पर किए जा रहे प्रयासों की व्यापकता को सामने लाता है।
फिर भी, दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल निर्माण और निवेश पर्याप्त नहीं होंगे। संरचनाओं का वैज्ञानिक चयन, समय पर रखरखाव, वन विभाग के साथ समन्वय और वन्यजीवों की आवाजाही की लगातार निगरानी भी जरूरी है।
यदि इन उपायों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो राष्ट्रीय राजमार्गों को अधिक सुरक्षित बनाने के साथ-साथ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और जैव विविधता की रक्षा में भी मदद मिल सकती है। विकास का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब बेहतर परिवहन व्यवस्था के साथ प्रकृति और वन्यजीवों के अस्तित्व को भी समान महत्व दिया जाए।