खून का रिश्ता नहीं, इंसानियत बनी सहारा: पत्रकार विजय शंकर यादव की अंतिम यात्रा में दिखी संवेदना

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अमरेश त्रिपाठी

हिट एंड हॉट न्यूज़ ब्यूरो चीफ कानपुर देहात

वाराणसी। जीवन की भागदौड़ में इंसान अक्सर अपने परिवार, रिश्तों और परिचितों के बीच अपनी पहचान बनाता है। लेकिन किसी व्यक्ति के जीवन की असली परीक्षा कई बार उसके अंतिम समय में होती है। वाराणसी में वरिष्ठ पत्रकार विजय शंकर यादव के निधन के बाद सामने आई घटना ने समाज में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। बताया गया कि उनकी अंतिम यात्रा के समय परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। ऐसे कठिन समय में कुछ ऐसे लोग आगे आए, जिनसे उनका कोई खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी।

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जानकारी के मुताबिक विजय शंकर यादव लंबे समय तक पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े रहे। जीवन के अंतिम वर्षों में वह वाराणसी के शिरगोवर्धन क्षेत्र स्थित एक मकान में रह रहे थे। उनके निधन की सूचना मिलने के बाद जब उनके बारे में जानकारी जुटाई गई तो उनके पास मिले दस्तावेजों के माध्यम से उनकी पहचान की गई। इसके बाद उनके परिजनों तक सूचना पहुंचाने और उन्हें अंतिम संस्कार के लिए बुलाने का प्रयास किया गया।

अंतिम समय में नहीं पहुंच सका कोई परिजन

बताया गया कि विजय शंकर यादव का पारिवारिक जीवन भी कई कठिन परिस्थितियों से गुजरा था। उनकी पत्नी से तलाक हो चुका था। निधन की जानकारी सामने आने के बाद संबंधित लोगों ने उनके परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन अंतिम संस्कार के समय तक कोई परिजन मौके पर नहीं पहुंच सका।

ऐसी स्थिति में उनके अंतिम संस्कार को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती थी। लेकिन इसी दौरान अमन कबीर सेवा न्यास से जुड़े सदस्यों और समाज के कुछ लोगों ने आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने यह नहीं देखा कि दिवंगत व्यक्ति उनका रिश्तेदार था या नहीं। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि एक इंसान की अंतिम विदाई सम्मान के साथ होनी चाहिए।

संस्था के सदस्यों ने विजय शंकर यादव को अपना मानते हुए अंतिम संस्कार की आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी कीं। इसके बाद उन्हें हरिश्चंद्र घाट ले जाया गया, जहां हिंदू रीति-रिवाजों और विधि-विधान के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया।

रिश्ते की परिभाषा को नया अर्थ

विजय शंकर यादव की अंतिम यात्रा से जुड़ी यह घटना केवल एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार की कहानी नहीं है। यह समाज में मौजूद उस मानवीय भावना को भी सामने लाती है, जिसके कारण लोग बिना किसी निजी स्वार्थ के किसी जरूरतमंद के साथ खड़े होते हैं।

आमतौर पर अंतिम समय में परिवार और करीबी रिश्तेदारों की मौजूदगी को स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति के जीवन में परिस्थितियां ऐसी बन जाएं कि उसके अंतिम समय में परिवार उसके साथ न हो, तब समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इस मामले में संस्था के सदस्यों ने आगे आकर यह साबित किया कि इंसानियत का रिश्ता किसी परिचय या पारिवारिक संबंध का मोहताज नहीं होता।

अंतिम संस्कार में शामिल लोगों के लिए विजय शंकर यादव एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें सम्मानपूर्वक विदाई देना जरूरी था। यही भावना उन्हें आगे लेकर आई। उनके इस कदम ने यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की जिंदगी में रिश्तों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जरूरत पड़ने पर उसके साथ कौन खड़ा होता है।

संघर्षों से भरा रहा पत्रकारिता का सफर

विजय शंकर यादव के निधन की खबर सामने आने के बाद लेखक एवं पत्रकार कांति शरण निगम ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने पत्रकार के जीवन और पत्रकारिता के संघर्षों को याद करते हुए इस घटना को समाज के लिए विचार करने वाला विषय बताया।

पत्रकारिता को अक्सर लोकतंत्र और समाज के बीच संवाद का माध्यम माना जाता है। पत्रकार अपने पेशे के दौरान समाज की समस्याओं, प्रशासनिक चुनौतियों और आम लोगों से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का प्रयास करते हैं। कई पत्रकार अपने पेशे में लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों के बीच काम करते हैं। इसके बावजूद व्यक्तिगत जीवन में उन्हें हमेशा वह पारिवारिक या सामाजिक सहारा मिले, यह जरूरी नहीं है।

विजय शंकर यादव के जीवन का अंतिम अध्याय भी इसी तरह की परिस्थितियों की ओर संकेत करता है। उनके पत्रकारिता जीवन में संघर्ष रहे और व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें कठिन दौर से गुजरना पड़ा। उनकी अंतिम यात्रा में सामने आई परिस्थिति ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया कि समाज उन लोगों के लिए कितना संवेदनशील है, जो जीवन के किसी पड़ाव पर अकेले पड़ जाते हैं।

अकेलेपन के बीच समाज की जिम्मेदारी

यह घटना समाज में बढ़ते अकेलेपन की समस्या पर भी ध्यान आकर्षित करती है। आज बड़ी संख्या में लोग रोजगार, पारिवारिक परिस्थितियों, वैवाहिक विवाद, स्थान परिवर्तन या अन्य कारणों से अपने परिवार से दूर रह रहे हैं। कई बुजुर्ग और अकेले रहने वाले लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास संकट के समय मदद के लिए कोई करीबी व्यक्ति उपलब्ध नहीं होता।

ऐसे में सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और आसपास रहने वाले लोगों की भूमिका बढ़ जाती है। किसी व्यक्ति की बीमारी, परेशानी या मृत्यु के समय संवेदनशीलता दिखाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है।

विजय शंकर यादव के मामले में भी यही देखने को मिला। उनके अंतिम समय में परिवार की अनुपस्थिति के बावजूद कुछ लोगों ने आगे बढ़कर उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली। इस कदम ने न केवल दिवंगत पत्रकार को सम्मानजनक विदाई दी, बल्कि समाज के सामने मानवीय जिम्मेदारी का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

अंतिम विदाई ने छोड़ा बड़ा संदेश

हरिश्चंद्र घाट पर हुए अंतिम संस्कार ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। जिन लोगों ने विजय शंकर यादव को अंतिम विदाई दी, उनके लिए यह केवल एक सामाजिक दायित्व पूरा करना नहीं था। यह उस सोच का हिस्सा था, जिसमें किसी व्यक्ति को उसके जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेला नहीं छोड़ा जाता।

इस घटना से यह संदेश भी निकलता है कि रिश्तों की पहचान केवल खून के संबंधों से नहीं होती। कई बार अनजान लोग भी जरूरत के समय ऐसे कदम उठा देते हैं, जो करीबी रिश्तेदारों से अपेक्षित होते हैं। संवेदना, सहयोग और मानवीय जिम्मेदारी ऐसे संबंध बना सकते हैं, जिनका आधार पारिवारिक पहचान नहीं बल्कि इंसानियत होती है।

विजय शंकर यादव का जीवन और उनकी अंतिम यात्रा समाज के सामने कई सवाल छोड़ गई है। क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके परिवार और रिश्तेदारों से होती है? क्या किसी अकेले व्यक्ति के अंतिम समय में समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? और क्या मानवीय संवेदना को रिश्तों की सीमाओं से बाहर नहीं देखा जाना चाहिए?

इन सवालों के बीच उनकी अंतिम यात्रा का दृश्य एक सकारात्मक संदेश देता है। जब अपनों की मौजूदगी नहीं थी, तब कुछ लोगों ने उन्हें अपना समझकर अंतिम विदाई दी। यही वह भावना है, जो समाज को केवल लोगों का समूह नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होने वाली व्यवस्था बनाती है।

विजय शंकर यादव अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा से जुड़ी यह घटना लंबे समय तक याद की जा सकती है। उनकी विदाई ने यह बात सामने रखी कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर किसी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा सहारा हमेशा खून का रिश्ता ही हो, यह जरूरी नहीं। कई बार इंसानियत ही सबसे बड़ा रिश्ता बन जाती है।

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