अकृति चौधरी NSA मामला: सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा DM मेधा रूपम को मिली राहत, ₹5 लाख वसूली के आदेश पर रोक
नई दिल्ली/नोएडा, 24 सितंबर 2026: नोएडा की छात्र कार्यकर्ता अकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हुई हिरासत को लेकर चल रहा मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें अकृति चौधरी की हिरासत को रद्द करने के साथ-साथ ₹5

लाख का मुआवजा देने और इसकी राशि नोएडा के गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम तथा मामले से जुड़े अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया गया था। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को प्रस्तावित है।
मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है पूरा मामला
यह विवाद अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों से जुड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान शुरू हुआ। इसी घटनाक्रम से जुड़े मामलों में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की पढ़ाई कर चुकीं छात्र कार्यकर्ता अकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था। बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया।
NSA एक ऐसा कानून है जिसके तहत कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। इस कानून के इस्तेमाल को लेकर न्यायिक जांच भी होती है, क्योंकि इसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल शामिल होते हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को मामले की सुनवाई करते हुए अकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द कर दिया था। अदालत ने मामले में तैयार की गई रिपोर्ट और हिरासत के आधार पर गंभीर सवाल उठाए तथा अधिकारियों की भूमिका पर भी टिप्पणियां कीं।
हाईकोर्ट ने ₹5 लाख मुआवजे का दिया था निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में अकृति चौधरी को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा था कि यह राशि उन अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए जो हिरासत की प्रक्रिया से जुड़े थे। इसमें गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम सहित अन्य अधिकारियों का उल्लेख था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में जिलाधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों के आचरण को लेकर कड़ी टिप्पणियां भी की थीं। अदालत ने यह भी कहा था कि हिरासत जैसे गंभीर कदम उठाने से पहले उपलब्ध रिकॉर्ड और सामग्री की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए।
अदालत ने अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारियों पर भी जोर दिया था। उसके अनुसार प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून और संविधान के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वहन करें।
मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया दरवाजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भी संबंधित याचिका दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ के समक्ष हुई।
सुनवाई के दौरान इस सवाल पर भी चर्चा हुई कि क्या हिरासत का निर्णय केवल जिलाधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी माना जा सकता है, जबकि पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों के अधिकारी शामिल होते हैं। अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा गया कि रिपोर्ट तैयार होने से लेकर अंतिम निर्णय तक कई अधिकारियों की भूमिका रही थी।
रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर सवाल उठाया कि यदि किसी हिरासत के निर्णय की प्रक्रिया कई अधिकारियों की जांच और मंजूरी से होकर गुजरती है, तो केवल जिलाधिकारी को अलग करके जिम्मेदार ठहराना उचित होगा या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के हिस्सों पर लगाई रोक
23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 27 से 33 के संचालन पर रोक लगा दी। इन्हीं हिस्सों में मुआवजे की वसूली और अधिकारियों के खिलाफ की गई कड़ी टिप्पणियां शामिल थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। अदालत ने मामले को 7 अक्टूबर को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इसका अर्थ यह है कि फिलहाल हाईकोर्ट के उस हिस्से पर रोक प्रभावी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अंतिम गुण-दोष पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है।
इस अंतरिम आदेश के बाद मामले की कानूनी स्थिति एक नए चरण में पहुंच गई है। अब आगे की सुनवाई में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क और रिकॉर्ड अदालत के सामने रखेंगे।
अकृति चौधरी की हिरासत पर भी कानूनी बहस
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू अकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर में उनकी हिरासत को रद्द करते हुए अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत सामग्री की पर्याप्तता पर सवाल उठाया था। अदालत का कहना था कि इस तरह के कठोर कानून के इस्तेमाल से पहले प्रशासन को उपलब्ध सामग्री की गंभीरता से समीक्षा करनी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण हाईकोर्ट के संबंधित निर्देशों पर फिलहाल रोक है। आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणियों और आदेश की कानूनी स्थिति को किस तरह देखता है।
कौन हैं मेधा रूपम?
मेधा रूपम उत्तर प्रदेश कैडर की 2014 बैच की IAS अधिकारी हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में पढ़ाई की है। उपलब्ध प्रोफाइल और रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने 2013 की सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुईं।
मेधा रूपम को जुलाई 2025 में गौतम बुद्ध नगर का जिलाधिकारी नियुक्त किया गया था। वह जिले की पहली महिला जिलाधिकारी बनीं। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर काम कर चुकी हैं और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं।
उनके प्रशासनिक करियर में हापुड़ और कासगंज जैसे जिलों में जिलाधिकारी के रूप में कार्य करना तथा ग्रेटर नोएडा क्षेत्र से जुड़े प्रशासनिक दायित्व निभाना शामिल रहा है।
अब 7 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर
अकृति चौधरी की NSA हिरासत और अधिकारियों की जिम्मेदारी से जुड़ा यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है। फिलहाल अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई है और पक्षकारों से जवाब मांगा है।
7 अक्टूबर की अगली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि उस दौरान दोनों पक्ष अदालत के सामने अपना पक्ष और संबंधित दस्तावेज रख सकते हैं। हालांकि अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष की कानूनी स्थिति को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
यह मामला एक ओर निवारक हिरासत में प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी सामने लाता है कि जब किसी प्रशासनिक फैसले में कई अधिकारियों की भूमिका होती है, तो व्यक्तिगत जवाबदेही किस आधार पर तय की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई में इसी तरह के कानूनी प्रश्नों पर आगे स्पष्टता आने की उम्मीद है।