20 सितंबर 1932: महात्मा गांधी का ऐतिहासिक अनशन और पूना पैक्ट

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भारतीय इतिहास में 20 सितंबर का महत्व

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल ब्रिटिश शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, प्रतिनिधित्व और समाज के वंचित वर्गों के अधिकारों को लेकर चले लंबे विमर्श का भी इतिहास है। 20 सितंबर 1932 इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तारीख बन गई। इस दिन महात्मा गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन आरंभ किया।

गांधीजी उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित कम्यूनल अवॉर्ड के एक महत्वपूर्ण प्रावधान का विरोध कर रहे थे। इस व्यवस्था में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ यानी उस समय सामाजिक रूप से वंचित और अस्पृश्य माने जाने वाले वर्गों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था का प्रावधान किया था। गांधीजी को आशंका थी कि अलग निर्वाचन व्यवस्था हिंदू समाज के भीतर स्थायी राजनीतिक विभाजन को बढ़ा सकती है। गांधी हेरिटेज पोर्टल की ऐतिहासिक समयरेखा में 17 अगस्त 1932 को कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा और 20 सितंबर को गांधीजी के अनशन की शुरुआत दर्ज है।

कम्यूनल अवॉर्ड की पृष्ठभूमि

1930 और 1931 के दौर में भारत के राजनीतिक भविष्य को लेकर ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच कई महत्वपूर्ण चर्चाएं हुईं। लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यकों के अधिकार और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

महात्मा गांधी ने 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया था। सम्मेलन से लौटने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां फिर तनावपूर्ण हो गईं और जनवरी 1932 में गांधीजी को गिरफ्तार करके यरवदा जेल भेज दिया गया। गांधी हेरिटेज पोर्टल की समयरेखा के अनुसार 4 जनवरी 1932 को उनकी गिरफ्तारी हुई थी।

इसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 17 अगस्त 1932 को कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा की। इसमें विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान किए गए। दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचन की व्यवस्था भी इसी घोषणा का हिस्सा थी।

गांधीजी ने अलग निर्वाचन का विरोध क्यों किया?

गांधीजी का विरोध दलित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के विचार से नहीं था। उनका मुख्य मत अलग निर्वाचन व्यवस्था को लेकर था। उनका मानना था कि यदि दलित वर्गों के लिए हिंदू समाज से अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाते हैं, तो इससे सामाजिक विभाजन और गहरा हो सकता है।

गांधीजी स्वयं अस्पृश्यता को भारतीय समाज की गंभीर समस्या मानते थे। वे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाते रहे और दलित समुदाय के सम्मान तथा सामाजिक समानता को अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते थे।

इसलिए उनका तर्क था कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हुए भी ऐसा रास्ता खोजा जाना चाहिए जिससे समाज में स्थायी राजनीतिक विभाजन न पैदा हो।

हालांकि इस मुद्दे पर सभी नेता गांधीजी से सहमत नहीं थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर दलित वर्गों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्वपूर्ण मानते थे। उनके विचार में सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को अपनी राजनीतिक आवाज मजबूत करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता थी।

यही मतभेद आगे चलकर गांधीजी और डॉ. आंबेडकर के बीच ऐतिहासिक बातचीत का आधार बना।

20 सितंबर 1932 को शुरू हुआ अनशन

20 सितंबर 1932 को गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन आरंभ किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल इसे कम्यूनल अवॉर्ड के विरोध में किया गया अनशन बताता है।

गांधीजी का यह कदम देशभर में चर्चा का विषय बन गया। राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत तेज हो गई। उद्देश्य था कि ऐसा समझौता निकाला जाए जिसमें दलित वर्गों को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले और साथ ही अलग निर्वाचन की व्यवस्था से बचा जा सके।

गांधीजी के अनशन ने इस प्रश्न को पूरे देश के सामने प्रमुखता से ला दिया। मंदिर प्रवेश, अस्पृश्यता, सामाजिक समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर भी व्यापक बहस होने लगी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे दलित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों के प्रमुख प्रतिनिधियों में से एक थे और उनका जोर इस बात पर था कि सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए।

गांधीजी और आंबेडकर के दृष्टिकोण में अंतर था, लेकिन दोनों ही दलित समुदाय की स्थिति में सुधार और उनके अधिकारों के प्रश्न को महत्वपूर्ण मानते थे। अंतर मुख्य रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व के तरीके और अलग निर्वाचन के प्रश्न पर था।

इसी कारण 1932 का यह घटनाक्रम भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संबंध को समझने के लिए आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

पूना पैक्ट की ओर बढ़ते कदम

गांधीजी के अनशन के बाद विभिन्न नेताओं के बीच समझौते के प्रयास तेज हुए। कई दौर की बातचीत के बाद 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट पर सहमति बनी। गांधी हेरिटेज पोर्टल की ऐतिहासिक समयरेखा में 24 सितंबर को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर और 26 सितंबर को गांधीजी द्वारा अनशन समाप्त करने की तारीख दर्ज है।

भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव से जुड़े आधिकारिक डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में भी उल्लेख है कि यरवदा जेल में गांधीजी के अनशन के बाद 24 सितंबर को गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर से जुड़े ऐतिहासिक समझौते, यानी पूना पैक्ट, पर हस्ताक्षर हुए।

पूना पैक्ट के तहत अलग निर्वाचन की जगह संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था को स्वीकार किया गया, जबकि दलित वर्गों के लिए विधानमंडलों में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी। इस प्रकार राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न एक अलग स्वरूप में आगे बढ़ा।

26 सितंबर को समाप्त हुआ अनशन

समझौते के बाद गांधीजी ने 26 सितंबर 1932 को अपना अनशन समाप्त किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार उस अवसर पर रवींद्रनाथ टैगोर भी मौजूद थे।

अनशन समाप्त होने के बाद सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ गांधीजी के अभियान को नई दिशा मिली। 30 सितंबर 1932 को हरिजन सेवक संघ की स्थापना भी इसी व्यापक सामाजिक अभियान के संदर्भ में हुई। गांधी हेरिटेज पोर्टल इसकी स्थापना को गांधीजी के अनशन और अस्पृश्यता उन्मूलन के आह्वान से जोड़ता है।

पूना पैक्ट का ऐतिहासिक महत्व

पूना पैक्ट भारतीय इतिहास में कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, इसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर एक महत्वपूर्ण समझौते का रास्ता तैयार किया। दूसरा, इसने दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को संवैधानिक और राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया।

इस समझौते को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक विचारकों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं। कुछ इसे तत्कालीन परिस्थितियों में राजनीतिक समझौते के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसके दीर्घकालिक प्रभावों और दलित राजनीतिक स्वायत्तता पर इसके असर को अलग दृष्टि से देखते हैं।

इसलिए पूना पैक्ट को केवल एक समझौते के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भारतीय समाज में समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुधार को लेकर चले बड़े ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा था।

गांधीजी के सामाजिक अभियान पर प्रभाव

1932 के अनशन के बाद गांधीजी ने अस्पृश्यता विरोधी अभियान को अपने सार्वजनिक कार्यों में और प्रमुख स्थान दिया। इसी दौर में ‘हरिजन’ शब्द का इस्तेमाल उनके लेखन और सामाजिक अभियान में व्यापक रूप से हुआ तथा हरिजन सेवक संघ जैसी संस्था के माध्यम से सामाजिक सुधार की गतिविधियां आगे बढ़ीं।

गांधीजी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार को पूरी तरह अलग-अलग विषयों के रूप में देखना उचित नहीं था। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का निर्माण तभी सार्थक होगा जब समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को सम्मान तथा समान अधिकार मिलें।

इतिहास से मिलने वाला संदेश

20 सितंबर 1932 का घटनाक्रम भारतीय इतिहास में यह दिखाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति ही प्रमुख प्रश्न नहीं था। भारतीय समाज के भीतर समानता और प्रतिनिधित्व का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण था।

गांधीजी का अनशन, डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक दृष्टि और उसके बाद हुआ पूना पैक्ट—इन सभी घटनाओं ने भारत में सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस को गहराई दी।

इस घटनाक्रम को समझने के लिए गांधीजी और आंबेडकर दोनों के विचारों को उनके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में देखना आवश्यक है। दोनों के बीच मतभेद थे, लेकिन उनके विचारों ने आगे चलकर भारत में सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समानता से जुड़े विमर्श को प्रभावित किया।

निष्कर्ष

20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में शुरू हुआ महात्मा गांधी का ऐतिहासिक अनशन भारतीय इतिहास की ऐसी घटना है जिसने देश की राजनीति और सामाजिक सुधार की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला। यह अनशन कम्यूनल अवॉर्ड में अलग निर्वाचन व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ और 24 सितंबर के पूना पैक्ट के बाद 26 सितंबर को समाप्त हुआ।

इस घटना ने गांधीजी, डॉ. बी.आर. आंबेडकर और अन्य भारतीय नेताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक समानता के कठिन प्रश्न पर एक साथ बातचीत करने के लिए प्रेरित किया। पूना पैक्ट तत्कालीन परिस्थितियों में निकला एक महत्वपूर्ण समझौता था, जिसने दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को नई दिशा दी।

आज 20 सितंबर 1932 की घटना को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक बहसों की याद दिलाती है जिनमें समानता, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक भागीदारी जैसे प्रश्न केंद्रीय रहे। यरवदा जेल से शुरू हुआ यह घटनाक्रम केवल एक अनशन की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के भारत में सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रहे जटिल संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय है।

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