डूबना: एक मौन वैश्विक संकट जो ले चुका है लाखों ज़िंदगियाँ

प्रकाशन तिथि: 26 जुलाई 2025
हर साल लाखों लोग बिना किसी शोर-शराबे के पानी में डूबकर अपनी जान गंवा देते हैं। यह मौतें इतनी चुपचाप होती हैं कि अक्सर इन्हें “मौन आपदा” (Silent Crisis) कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने “विश्व डूबन रोकथाम दिवस” (World Drowning Prevention Day) के अवसर पर एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे पर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है।
डूबना: एक अनदेखी लेकिन जानलेवा समस्या
पिछले एक दशक में 30 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु केवल डूबने से हुई है। यह संख्या वैश्विक महामारी जैसी ही भयावह है, फिर भी इसे वैसी प्राथमिकता नहीं दी जाती जैसी अन्य स्वास्थ्य संकटों को मिलती है। विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में यह आकस्मिक मृत्यु का एक प्रमुख कारण बन गया है।
WHO की ओर से जारी संदेश इस बार बेहद सीधा और प्रभावशाली है:
“कोई भी डूब सकता है, लेकिन किसी को भी डूबना नहीं चाहिए।”
कहां और कैसे हो रही हैं ये मौतें?
डूबने की घटनाएं केवल समुद्रों या नदियों में ही नहीं होतीं। ये हमारे आस-पास के रोज़मर्रा के स्थानों में होती हैं —
- घरों में रखे पानी के बर्तन,
- बारिश के बाद भरे हुए गड्ढे,
- ग्रामीण इलाकों के तालाब,
- शहरी बस्तियों की जलजमाव वाली सड़कों,
- और बाढ़ के पानी से भरे इलाके।
कम और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति और भी भयावह है, जहां न तो तैराकी सिखाने की व्यवस्था है और न ही आपातकालीन बचाव संसाधन।
समाधान क्या हैं?
संयुक्त राष्ट्र और WHO ने निम्नलिखित उपायों को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है:
- बच्चों को तैराकी और जल सुरक्षा का प्रशिक्षण देना
- जलस्रोतों के चारों ओर सुरक्षा बाधाएं लगाना
- सार्वजनिक जल निकायों पर निगरानी की व्यवस्था
- बचाव उपकरण और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रशिक्षण
- पानी की सुरक्षा पर जन जागरूकता अभियान
जलवायु परिवर्तन से बढ़ता खतरा
जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, तूफान और भारी वर्षा जैसी घटनाएं अधिक सामान्य होती जा रही हैं, जिससे डूबने का खतरा और बढ़ गया है। ऐसे में यह और भी जरूरी हो गया है कि डूबने से सुरक्षा को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लिया जाए।
निष्कर्ष: अब नहीं तो कब?
“विश्व डूबन रोकथाम दिवस, 25 जुलाई” हमें याद दिलाता है कि डूबना कोई नियति नहीं है — इसे रोका जा सकता है। इसके लिए केवल सरकारी नीतियों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी की आवश्यकता है।
अब समय आ गया है कि हम चुप न रहें, बल्कि आवाज़ उठाएं —
“कोई भी डूब सकता है, लेकिन किसी को भी डूबना नहीं चाहिए।”
