SIR प्रक्रिया पर वोटों की गड़बड़ी और चोरी का मुद्दा: विपक्ष की संसद में चर्चा की मांग

नई दिल्ली, 6 अगस्त 2025: संसद के मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बिहार में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों और वोट चोरी के मामलों को उठाने के लिए चर्चा की मांग की है। उन्होंने सरकार और संसद अध्यक्ष से आग्रह किया कि इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर विस्तृत और निष्पक्ष चर्चा की जाए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए खड़गे ने कहा, “हम चाहते हैं कि संसद में SIR प्रक्रिया पर चर्चा हो। यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है। विपक्ष लगातार शांतिपूर्वक तरीके से सरकार, स्पीकर और चेयरमैन से अनुरोध कर रहा है कि हमारे मतों की चोरी न हो। हमें इस पर चर्चा के लिए समय मिलना चाहिए ताकि गड़बड़ियों और वोट चोरी को उजागर किया जा सके।”
लोकतंत्र की रक्षा के लिए विपक्ष की सक्रियता
खड़गे ने यह भी स्पष्ट किया कि विपक्ष का उद्देश्य केवल आलोचना करना नहीं है, बल्कि SIR प्रक्रिया में हुईं त्रुटियों को उजागर कर सुझाव देना है ताकि लोकतंत्र मजबूत हो और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। उन्होंने कहा, “अगर पूरी तरह से चर्चा होती है तो हम यह बता सकते हैं कि कहाँ पर गलतियाँ हुई हैं और कौन से कदम असंवैधानिक रूप से उठाए गए हैं। इससे हम उन मतदाताओं की रक्षा कर सकते हैं जिनके अधिकार छीने जा रहे हैं।”
2023 की राज्यसभा बहस और वर्तमान विरोधाभास
खड़गे ने 2023 की एक घटना का हवाला देते हुए बताया कि उस समय राज्यसभा के चेयरमैन जगदीप धनखड़ ने कहा था कि “संसद में हर विषय पर चर्चा की जा सकती है।” इसके विपरीत, अब उपसभापति हरिवंश पुराने नियमों का हवाला देकर SIR पर चर्चा से इनकार कर रहे हैं, जिसे खड़गे ने असंगत और लोकतंत्र विरोधी बताया।
अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों की चिंता
खड़गे ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के जरिए अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और प्रवासी मजदूरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया, “किसके वोट काटे जा रहे हैं? अल्पसंख्यकों के, दलितों के, आदिवासियों के, मनरेगा मजदूरों के और प्रवासी श्रमिकों के। इनके अधिकारों का हनन हो रहा है।”
निष्कर्ष
SIR प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल केवल एक राज्य या एक वर्ग के नहीं हैं, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा हुआ मुद्दा बनता जा रहा है। विपक्ष की यह मांग कि इस विषय पर संसद में खुली चर्चा हो, न केवल संविधान सम्मत है बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी भी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इस विषय पर पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ती है या विपक्ष की आवाज को अनसुना किया जाता है।
