बिहार में चुनावी रोस्टर पर सन्नाटा: क्या वाकई कोई आपत्ति नहीं है?

पटना/नई दिल्ली, 7 अगस्त 2025:
बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग द्वारा 1 अगस्त को प्रकाशित चुनावी रोस्टर के मसौदे पर अब तक कोई भी राजनीतिक दल औपचारिक रूप से आपत्ति या दावा दर्ज नहीं कर पाया है। यह स्थिति कई सवालों को जन्म दे रही है — क्या यह पारदर्शिता का प्रमाण है, या राजनीतिक चुप्पी किसी गहरी रणनीति का हिस्सा?
चुनाव आयोग (EC) ने स्पष्ट किया है कि रोस्टर को अंतिम रूप देने से पहले हर योग्य मतदाता को शामिल किया जाएगा, और अयोग्य नामों को सूची से हटाया जाएगा, लेकिन पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष पूछताछ और अवसर प्रदान करने के बाद ही होगी।
अब तक क्या हुआ?
चुनाव आयोग के अनुसार:
- विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के अंतर्गत अब तक 5,015 दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।
- 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के नए मतदाताओं से 27,517 नए आवेदन (फॉर्म 6) प्राप्त हुए हैं।
- दावे-आपत्तियों का निपटान संबंधित चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ERO) अथवा सहायक पंजीकरण अधिकारी (AERO) द्वारा 7 दिन की समयसीमा पूरी होने के बाद किया जाएगा।
विरोधी खेमा क्या कहता है?
हालांकि आयोग का दावा है कि प्रक्रिया निष्पक्ष और कानूनी है, लेकिन इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) समेत कई विपक्षी दलों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि यह गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया कुछ खास क्षेत्रों और समुदायों के मतदाताओं को सुनियोजित ढंग से हटाने का प्रयास हो सकती है।
उन्होंने यह भी चेताया है कि यदि पारदर्शिता नहीं बरती गई, तो चुनाव की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ सकती है।
आयोग की सफाई
आयोग ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि:
- नाम हटाने से पहले पूरी प्रक्रिया में प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाएगा।
- किसी भी नाम को केवल उचित जांच और कानूनी आधार पर ही हटाया जा सकता है।
निष्कर्ष
बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में चुनावी रोस्टर की पारदर्शिता और निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जबकि आयोग ने प्रक्रिया को वैध और निष्पक्ष बताया है, विपक्षी दलों की चिंता भी अनदेखी नहीं की जा सकती।
आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सन्नाटा टिकता है या फिर कोई बड़ा राजनीतिक मोड़ आता है।
लेखक का दृष्टिकोण:
चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं। चुनावी सूचियों में निष्पक्षता और समावेशन लोकतंत्र की साख को बनाए रखते हैं। अगर कोई भी मतदाता, चाहे वह किसी वर्ग या क्षेत्र से हो, जानबूझकर बाहर कर दिया जाए, तो यह गंभीर लोकतांत्रिक संकट को जन्म दे सकता है।
