फ़रवरी 14, 2026

भारत की ऊर्जा क्षमता में ऐतिहासिक छलांग: 2030 तक 780 गीगावाट का लक्ष्य

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नई दिल्ली (एएनआई): देश में बिजली की मांग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही है। जैसे-जैसे हर कोने तक बिजली पहुंचाने के प्रयास तेज हो रहे हैं, अनुमान है कि कुल मांग 335 गीगावाट के स्तर पर पहुंच जाएगी। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने बिजली उत्पादन क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि का लक्ष्य तय किया है।

यूबीएस की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2030 तक 780 गीगावाट की कुल स्थापित क्षमता हासिल करने के लिए भारत को हर साल लगभग 10% की दर से क्षमता बढ़ानी होगी। यह दर FY15 से FY25 के बीच की 6% औसत जीडीपी वृद्धि दर से कहीं अधिक है। रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि अब बिजली की खपत और जीडीपी वृद्धि के बीच का अनुपात बदल रहा है — पहले बिजली की मांग जीडीपी वृद्धि की तुलना में लगभग 0.85 गुना बढ़ती थी, लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों में तेज विद्युतीकरण से यह आंकड़ा 0.92 गुना तक पहुंच सकता है।

अगले पांच वर्षों में बिजली उत्पादन क्षमता में करीब 305 गीगावाट की अतिरिक्त वृद्धि का अनुमान है, जो FY20–FY25 की तुलना में लगभग तीन गुना होगी। इस विस्तार का सबसे बड़ा हिस्सा सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से आएगा। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए थर्मल ऊर्जा की भूमिका निकट भविष्य में कम नहीं होगी, क्योंकि नवीकरणीय स्रोत निरंतर बिजली आपूर्ति नहीं दे सकते।

यह परिदृश्य निवेशकों के लिए बड़े अवसर पैदा कर रहा है। पहले बिजली उत्पादन का नियंत्रण मुख्यतः सरकारी और राज्य-स्वामित्व वाले उपक्रमों के पास था, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा के उदय ने निजी क्षेत्र को भी प्रमुख खिलाड़ी बना दिया है।

रिपोर्ट कहती है, “वर्तमान आर्थिक माहौल निजी निवेश के लिए अनुकूल है, इसलिए निजी कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा में पूंजी लगाना जारी रखेंगी, जबकि सरकार थर्मल ऊर्जा में निवेश को बढ़ावा देगी।”

मध्यम अवधि में नए बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी लगभग 40% रहने की संभावना है, जिसमें करीब 80 गीगावाट थर्मल क्षमता सरकार के लक्ष्यों में शामिल है। इसके साथ ही, सौर पैनल निर्माण उद्योग को पूंजी, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यूबीएस के आकलन के अनुसार, आवश्यक पूंजी और विशेषज्ञता के मद्देनजर लगभग 60% उत्पादन क्षमता कुछ चुनिंदा कंपनियों के पास केंद्रित हो सकती है।

निष्कर्षतः, भारत की ऊर्जा यात्रा अब एक नए मोड़ पर है, जहां नवीकरणीय और थर्मल ऊर्जा का संतुलन बनाए रखते हुए, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र को मिलकर अभूतपूर्व लक्ष्य हासिल करने होंगे।


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