मालदा में बाढ़ राहत के नाम पर करोड़ों की अनियमितता: व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले से जुड़ा एक मामला राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करता नज़र आ रहा है। बाढ़ पीड़ितों के लिए आवंटित राहत धन के वितरण में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने इसे लगभग ₹100 करोड़ का घोटाला बताते हुए राज्य सरकार और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
इन आरोपों की आधारशिला भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट को बताया जा रहा है, जिसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
ऑडिट रिपोर्ट से सामने आए असहज तथ्य
कथित CAG ऑडिट के अनुसार, राहत वितरण प्रक्रिया में कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई:
- हजारों मामलों में एक ही बैंक खाते में बार-बार भुगतान किए जाने के संकेत मिले। एक प्रकरण में तो एक लाभार्थी को दर्जनों बार राहत राशि मिलने का उल्लेख है।
- बड़ी धनराशि ऐसे घरों के “नुकसान” के नाम पर जारी की गई, जिनके क्षतिग्रस्त होने की प्रशासनिक रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं थी।
- सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारी और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के नाम भी लाभार्थी सूची में पाए गए, जबकि वे पहले से ही नियमित आय प्राप्त कर रहे थे।
- कुछ भुगतान ऐसे व्यक्तियों को किए गए, जिन्होंने कभी औपचारिक रूप से राहत के लिए आवेदन ही नहीं किया था। इसके साथ ही, कई खंड कार्यालयों से संबंधित फाइलों के गायब होने की बात भी सामने आई, जिससे रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की आशंका गहराती है।
विपक्ष का आरोप: जवाबदेही से भागने की कोशिश
भाजपा ने इन तथ्यों को “व्यवस्थित और सुनियोजित दुरुपयोग” बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि आपदा राहत जैसी मानवीय मदद को राजनीतिक और व्यक्तिगत लाभ का साधन बना दिया गया। उनका दावा है कि वास्तविक ज़रूरतमंद लोग सहायता से वंचित रह गए, जबकि प्रभावशाली लोगों को अनुचित लाभ मिला।
राज्य सरकार पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि पूरे मामले पर चुप्पी साधकर जवाबदेही से बचने का प्रयास किया जा रहा है।
चुनावी माहौल में बढ़ती राजनीतिक गरमाहट
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है, जब राज्य में 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले महीनों में राजनीतिक विमर्श का एक बड़ा केंद्र बन सकता है। विपक्ष इसे सरकार की कथित विफलताओं के उदाहरण के रूप में पेश कर सकता है, जबकि सत्तारूढ़ दल के लिए यह मामला छवि को नुकसान पहुँचा सकता है।
निष्कर्ष
मालदा से जुड़ा यह कथित बाढ़ राहत मामला केवल वित्तीय अनियमितता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शासन में पारदर्शिता, निगरानी और नैतिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह न सिर्फ संबंधित अधिकारियों और नेताओं के लिए परेशानी का कारण बनेगा, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।
आपदा के समय राहत, भरोसे का प्रतीक होती है—और जब उसी पर प्रश्न उठें, तो उसका असर दूरगामी होता है।
