भारत का आत्मविश्वासी व्यापारिक उभार: नई अर्थनीति की पहचान

भारत आज वैश्विक व्यापार के मंच पर पहले से कहीं अधिक दृढ़ और आत्मविश्वासपूर्ण रूप में खड़ा है। हाल के वर्षों में देश की आर्थिक नीतियों, संरचनात्मक सुधारों और वैश्विक साझेदारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक निर्णायक शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। के नेतृत्व में बार-बार यह संदेश दिया गया है कि भारत प्रतिस्पर्धा से डरने वाला नहीं, बल्कि उसे दिशा देने वाला देश बनना चाहता है।
सुधारों से सशक्त हुई आर्थिक नींव
पिछले एक दशक में भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। बजट अब केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं, बल्कि परिणामों और लक्ष्यों पर केंद्रित एक रणनीतिक खाका बन चुका है।
- सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी गई।
- डिजिटल प्रौद्योगिकी को प्रशासन और व्यापार दोनों का आधार बनाया गया।
- स्टार्टअप, नवाचार और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देकर रोजगार सृजन पर बल दिया गया।
- कर प्रणाली को सरल बनाने और निवेश आकर्षित करने के लिए नीतिगत सुधार किए गए।
इन पहलों का परिणाम यह हुआ कि भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद स्थिरता बनाए रखी और विकास दर में निरंतर सुधार दर्ज किया।
मुक्त व्यापार समझौतों में नई सक्रियता
एक समय था जब विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते भारत के लिए चुनौतीपूर्ण माने जाते थे। उस दौर में भारत को अक्सर सतर्क और सीमित भूमिका निभाने वाला देश समझा जाता था। आज स्थिति पूरी तरह बदली हुई है।
भारत अब स्पष्ट नीतियों, मजबूत बाज़ार क्षमता और तकनीकी दक्षता के साथ व्यापारिक समझौतों में भागीदारी कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल निर्यात बढ़ाना नहीं, बल्कि वैश्विक मूल्य श्रृंखला में अपनी भागीदारी का विस्तार करना है।
भारत की युवा जनसंख्या, तेज़ी से बढ़ता मध्यम वर्ग और डिजिटल बुनियादी ढाँचा उसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए आकर्षक बनाते हैं। यही कारण है कि भारत अब केवल उत्पादों का उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि उत्पादन और नवाचार का केंद्र भी बनता जा रहा है।
बदलती विश्व व्यवस्था और भारत की भूमिका
दुनिया में भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक ढाँचे में दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। “एक मॉडल सबके लिए” की सोच अब अप्रासंगिक होती जा रही है। हर देश अपनी आर्थिक सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दे रहा है।
भारत इस परिवर्तनशील माहौल को अवसर के रूप में देख रहा है। आत्मनिर्भरता और वैश्विक सहभागिता के संतुलन के साथ भारत एक ऐसे मॉडल को आगे बढ़ा रहा है जो घरेलू उद्योग को सशक्त बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को भी मजबूत करता है।
भविष्य की दिशा
आगामी वर्षों में भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समावेशी विकास और टिकाऊ प्रगति पर भी रहेगा। हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे का विस्तार और कौशल विकास ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत वैश्विक नेतृत्व की संभावनाएँ रखता है।
निष्कर्ष
भारत का वर्तमान व्यापारिक दृष्टिकोण आत्मविश्वास, सुधार और वैश्विक सहभागिता पर आधारित है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि दीर्घकालिक नीतिगत सोच और ठोस कदमों का परिणाम है। आज भारत विश्व मंच पर मजबूती से यह संदेश दे रहा है कि वह केवल परिवर्तन का सहभागी नहीं, बल्कि परिवर्तन का मार्गदर्शक बनने की क्षमता रखता है।
