भारत–अमेरिका व्यापार करार और कपास का सवाल: संतुलन की कठिन परीक्षा

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल में हुए व्यापारिक समझौते ने कपास उत्पादकों और वस्त्र उद्योग से जुड़े हितधारकों के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। इस करार के तहत भारतीय परिधानों पर अमेरिकी बाज़ार में 18 प्रतिशत आयात शुल्क लागू किया गया है। दूसरी ओर, बांग्लादेश को शून्य शुल्क की सुविधा दी गई है, बशर्ते वह अमेरिकी कपास का आयात करे। यह परिस्थिति भारत के लिए नीति निर्धारण की जटिल चुनौती बनकर सामने आई है।
विवाद की पृष्ठभूमि
1. घरेलू कपास उत्पादकों पर संभावित प्रभाव
यदि भारत अमेरिकी कपास के आयात को बढ़ावा देता है, तो घरेलू किसानों की उपज की मांग घटने की आशंका रहेगी। इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी दबाव आ सकता है और किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
2. वस्त्र उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक चिंता
भारत विश्व के प्रमुख कपास उत्पादक और वस्त्र निर्यातक देशों में से एक है। 18 प्रतिशत टैरिफ के कारण भारतीय परिधान अमेरिकी बाजार में महंगे पड़ सकते हैं, जिससे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कम हो सकती है।
3. बांग्लादेश को रणनीतिक लाभ
बांग्लादेश पहले से ही रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र में मजबूत स्थिति रखता है। यदि उसे शून्य टैरिफ का लाभ मिलता है, तो वह कम लागत में अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती और बढ़ेगी।
आर्थिक और सामाजिक आयाम
रोजगार पर प्रभाव
भारत में कपास खेती और वस्त्र उद्योग लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़े हैं। उत्पादन, कताई, बुनाई, प्रसंस्करण और निर्यात—यह पूरी श्रृंखला रोजगार का बड़ा स्रोत है। किसी भी प्रकार का व्यवधान व्यापक सामाजिक असर ला सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता
कपास उत्पादन मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रित है। यदि किसानों को अपेक्षित मूल्य नहीं मिलता, तो ग्रामीण उपभोग और निवेश दोनों प्रभावित हो सकते हैं, जिससे स्थानीय अर्थचक्र कमजोर पड़ सकता है।
विदेशी मुद्रा अर्जन
भारत का वस्त्र निर्यात विदेशी मुद्रा आय का एक महत्वपूर्ण आधार है। प्रतिस्पर्धा में गिरावट का असर देश के व्यापार संतुलन पर भी दिख सकता है।
राजनीतिक विमर्श
इस समझौते पर राजनीतिक मतभेद भी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आए हैं।
- ने इसे किसानों और वस्त्र उद्योग के हितों के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि सरकार को पारदर्शिता के साथ यह स्पष्ट करना चाहिए कि बांग्लादेश को शून्य टैरिफ का लाभ किन शर्तों पर मिला।
- सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि वैश्विक व्यापार की जटिलताओं में रणनीतिक समझौते आवश्यक होते हैं।
नीति के विकल्प और संभावित समाधान
1. किसानों की आय सुरक्षा
घरेलू कपास उत्पादकों को मूल्य स्थिरता, बीमा सुरक्षा और निर्यात प्रोत्साहन जैसी नीतियों से सहारा दिया जा सकता है।
2. अमेरिकी पक्ष से पुनर्विचार
भारत अमेरिका के साथ पुनः बातचीत कर शुल्क दरों में राहत या चरणबद्ध कमी की मांग कर सकता है।
3. वैकल्पिक बाजारों का विस्तार
यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे उभरते बाजारों में भारतीय वस्त्र निर्यात की संभावनाओं को मजबूत किया जा सकता है।
4. गुणवत्ता और वैल्यू एडिशन
केवल कच्चे कपास पर निर्भर रहने के बजाय उच्च मूल्य वाले तकनीकी वस्त्र, ऑर्गेनिक टेक्सटाइल और ब्रांडेड परिधानों पर ध्यान केंद्रित करना दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।
निष्कर्ष
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता मात्र आयात-निर्यात की शर्तों तक सीमित विषय नहीं है; यह कृषि, उद्योग और रोजगार के व्यापक हितों से जुड़ा है। एक ओर किसानों की आय संरक्षण का प्रश्न है, तो दूसरी ओर निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखने की आवश्यकता। संतुलित, पारदर्शी और दूरदर्शी नीति ही इस दुविधा का समाधान दे सकती है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह वैश्विक व्यापार में सक्रिय भागीदारी बनाए रखते हुए अपने किसानों और उद्योग दोनों के हितों की रक्षा कर सके।
