सिंधु घाटी सभ्यता: भारत की गौरवशाली प्राचीन संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता (Harappan Civilization) भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीनतम और सबसे संगठित सभ्यताओं में से एक मानी जाती है। यह सभ्यता लगभग 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई और अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और शहरी व्यवस्थाओं के कारण विश्व इतिहास में एक अद्वितीय स्थान रखती है।
भौगोलिक विस्तार
सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार आज के पाकिस्तान और पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से में था। इसका केंद्र बिंदु सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों का क्षेत्र था। इस सभ्यता के प्रमुख स्थलों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, राखीगढ़ी, लोथल और कालीबंगा शामिल हैं। इन स्थलों की खुदाई से पता चलता है कि सिंधु घाटी के लोग उन्नत नगर नियोजन और जल निकासी व्यवस्था में निपुण थे।
विशेषताएँ
सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसका सुव्यवस्थित नगर नियोजन था। यहाँ की गलियाँ सीधी और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। ईंटों से बने घर, सार्वजनिक स्नानागार (विशेष रूप से मोहनजोदड़ो का ‘ग्रेट बाथ’), कुएं, जल निकासी की पक्की नालियाँ और अन्न भंडार इसकी वैज्ञानिक दृष्टि का प्रमाण हैं।
आर्थिक और व्यापारिक जीवन
यह सभ्यता कृषि पर आधारित थी। गेहूं, जौ, कपास जैसी फसलें उगाई जाती थीं। सिंधु घाटी के लोग कुशल कारीगर थे और धातु, मनके, मिट्टी के बर्तन और मुहरें बनाते थे। वे व्यापार में भी दक्ष थे और मेसोपोटामिया जैसी विदेशी सभ्यताओं से उनके व्यापारिक संबंध थे।
धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष
सिंधु घाटी के लोगों में मातृदेवी पूजा, पशुपति जैसी मूर्तियों की उपासना और प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आस्था के प्रमाण मिले हैं। यहाँ के शिल्प, मूर्तियाँ और मुहरें उनकी कला और संस्कृति की उन्नत स्थिति को दर्शाती हैं।
पतन के कारण
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारणों पर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विशेषज्ञ प्राकृतिक आपदाओं, जैसे बाढ़ या सूखा, को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि अन्य आक्रांताओं के हमले अथवा पर्यावरणीय परिवर्तन को कारण मानते हैं।
