एफआरए सेल को केंद्र सरकार की मंजूरी: जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक पहल

भारत सरकार द्वारा हाल ही में वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) सेल को मंजूरी देना एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम माना जा रहा है। यह निर्णय न केवल अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मजबूती प्रदान करेगा, बल्कि भारत में वन संसाधनों के न्यायपूर्ण और टिकाऊ उपयोग की दिशा में भी एक नई सोच का संकेत देता है।
एफआरए सेल क्यों है विशेष?
भारत में लाखों की संख्या में जनजातीय और वनवासी समुदाय पीढ़ियों से वनों पर निर्भर रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक उनके अधिकारों को कानूनी मान्यता नहीं दी गई। वर्ष 2006 में लागू किया गया वन अधिकार अधिनियम (FRA) इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम था। हालांकि, इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ और विलंब सामने आए।
एफआरए सेल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य इन बाधाओं को दूर कर, अधिकारों की पहचान, सत्यापन और वितरण की प्रक्रिया को तेज़, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना है। यह एक नोडल इकाई की तरह काम करेगा जो विभिन्न राज्यों, विभागों और हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित करेगा।
‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ से जुड़ाव
केंद्र सरकार की यह पहल विशेष रूप से ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DAJGUA)’ के परिप्रेक्ष्य में अहम मानी जा रही है। यह अभियान भारत के आदिवासी बहुल ग्रामों को सशक्त बनाने, उनकी आजीविका को टिकाऊ बनाने और सामाजिक विकास को गति देने के लिए प्रारंभ किया गया है।
FRA सेल, इस अभियान के तहत चयनित गांवों में भूमि अधिकारों से जुड़े मामलों का निपटारा कर, जनजातीय समाज को स्वामित्व और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगा। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, बल्कि वे सामाजिक रूप से भी सशक्त बनेंगे।
वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006: एक पुनरावलोकन
वन अधिकार अधिनियम 2006, वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को उनके ऐतिहासिक अधिकारों की कानूनी मान्यता देता है। इसमें दो प्रकार के अधिकार मान्यता प्राप्त हैं:
- व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) – वन भूमि पर खेती और निवास का अधिकार।
- सामुदायिक वन अधिकार (CFR) – वन उपज, जल स्रोत, चारागाह और अन्य पारंपरिक संसाधनों पर सामूहिक उपयोग और प्रबंधन का अधिकार।
यह अधिनियम वन संरक्षण के साथ-साथ वनवासियों के अधिकारों और जीवनस्तर में सुधार का भी संतुलन स्थापित करता है।
एफआरए सेल की प्रमुख भूमिकाएँ
- दावों की प्रोसेसिंग – वन अधिकारों के लिए किए गए दावों की जांच, सत्यापन और निपटान को तेज करना।
- समन्वयकारी एजेंसी – जनजातीय मंत्रालय, राज्य सरकारों और अन्य विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना।
- सूचना एवं प्रशिक्षण – जनजातीय समुदायों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, दस्तावेज़ तैयार करने में मदद करना।
- जमीनी निगरानी – FRA के क्रियान्वयन की प्रगति की निगरानी और रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना।
जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में नया अध्याय
एफआरए सेल का गठन केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं है, यह एक नीतिगत प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसमें भारत सरकार वनवासियों को मुख्यधारा में लाने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें नीति-निर्माण का सक्रिय भागीदार बनाने के लिए गंभीर है।
निष्कर्ष
एफआरए सेल की स्थापना भारत में जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा और सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है, बशर्ते इसका क्रियान्वयन प्रभावी, समावेशी और पारदर्शी हो। इससे न केवल ऐतिहासिक अन्याय का समाधान होगा, बल्कि यह देश के सामाजिक न्याय, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
