नोएडा डीएम मेधा रूपम मामले की सुनवाई पर उठे सवाल, वकीलों के संगठन ने CJI को लिखा पत्र
नई दिल्ली/नोएडा। गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़े एक मामले की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर न्यायिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। Lawyers Association for Constitution (LAFC) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि मेधा रूपम की याचिका को सामान्य रोस्टर से अलग तरीके से एक विशेष पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया। संगठन ने सुनवाई के दौरान वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट किए जाने पर भी आपत्ति जताई है।

यह पूरा विवाद उस मामले से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करते हुए ₹5 लाख मुआवजे का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए हाई कोर्ट की कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों और मुआवजे की वसूली संबंधी निर्देश पर रोक लगाई। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रा की NSA हिरासत रद्द करने वाले हाई कोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है।
विशेष पीठ के सामने सूचीबद्ध करने पर सवाल
LAFC के पत्र का मुख्य केंद्र इस मामले की सूचीबद्धता है। संगठन का कहना है कि याचिका को मौजूदा रोस्टर के अनुसार सामान्य तरीके से सूचीबद्ध करने के बजाय एक विशेष पीठ के सामने रखा गया। रिपोर्टों के अनुसार इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने की।
वकीलों के संगठन ने इस व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अदालतों में मामलों की सूचीबद्धता को लेकर पारदर्शिता और समान प्रक्रिया न्याय व्यवस्था में सार्वजनिक भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है। संगठन ने इसे विशेष व्यवहार के रूप में देखने की आशंका जताई है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आरोप संगठन की ओर से उठाई गई आपत्तियां हैं; पत्र अपने आप में यह स्थापित नहीं करता कि सूचीबद्धता में किसी प्रकार का अनुचित प्रभाव पड़ा था।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त से पारिवारिक संबंध का उल्लेख
LAFC ने अपने पत्र में मेधा रूपम के पारिवारिक संबंध का भी उल्लेख किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मेधा रूपम भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। संगठन ने इसी तथ्य को संदर्भ में रखते हुए कहा है कि सार्वजनिक पद पर कार्यरत किसी अधिकारी से जुड़े मामले में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर किसी भी तरह की आशंका को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी अधिकारी का किसी संवैधानिक पदाधिकारी से पारिवारिक संबंध अपने आप में किसी न्यायिक प्रक्रिया में पक्षपात या अनुचित प्रभाव का प्रमाण नहीं है। LAFC ने इस संबंध का उल्लेख मुख्य रूप से सार्वजनिक विश्वास और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता के संदर्भ में किया है।
सुनवाई के दौरान वीडियो फीड म्यूट होने पर भी आपत्ति
वकीलों के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा के म्यूट होने का मुद्दा भी उठाया। रिपोर्टों के अनुसार 23 सितंबर को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के निर्देश पर सुनवाई की लाइव पहुंच और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग फीड को बंद किया गया था। इसके बाद LAFC ने अदालत के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में इस व्यवस्था पर सवाल उठाए।
संगठन का तर्क है कि अदालतों की कार्यवाही में पारदर्शिता न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, अदालतों के पास कुछ परिस्थितियों में कार्यवाही के प्रसारण या पहुंच को सीमित करने से संबंधित प्रक्रियात्मक अधिकार हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में फीड म्यूट किए जाने के कारण और उसका न्यायिक औचित्य अदालत के रिकॉर्ड और आदेशों के संदर्भ में ही पूरी तरह समझा जा सकता है।
कहां से शुरू हुआ पूरा विवाद?
यह विवाद अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए औद्योगिक श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान मजदूर वेतन बढ़ाने सहित अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। इसी घटनाक्रम से जुड़े मामलों में दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास स्नातक छात्रा आकृति चौधरी को हिरासत में लिया गया था और बाद में उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया।
आकृति चौधरी की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। अदालत ने NSA के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया और ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने यह राशि संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूलने की बात भी कही थी। मामले में जिलाधिकारी मेधा रूपम सहित अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी अदालत ने कड़ी टिप्पणियां की थीं।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भी हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान 23 सितंबर को अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई।
शुरुआती आदेश के बाद यह धारणा बनी कि हाई कोर्ट के पूरे फैसले पर रोक लगा दी गई है। हालांकि, 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि रोक मुख्य रूप से मेधा रूपम के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और ₹5 लाख मुआवजे की वसूली संबंधी निर्देश पर है। छात्रा की NSA हिरासत को रद्द करने वाले हाई कोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने का अवसर दिया है और आगे की सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध किया गया है। इसका अर्थ है कि फिलहाल विवाद का अंतिम न्यायिक निपटारा नहीं हुआ है। मुआवजे और हाई कोर्ट की टिप्पणियों से संबंधित मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट आगे विस्तृत सुनवाई करेगा।
दूसरी ओर, LAFC की ओर से उठाए गए सवाल न्यायिक प्रशासन और अदालतों की कार्यवाही में पारदर्शिता से जुड़े हैं। संगठन ने मुख्य न्यायाधीश से मामले की सूचीबद्धता और सुनवाई के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर ध्यान देने का आग्रह किया है। इन आपत्तियों पर आगे कोई संस्थागत या न्यायिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
न्यायिक पारदर्शिता बनी चर्चा का केंद्र
मेधा रूपम मामले ने एक साथ कई कानूनी और प्रक्रियात्मक मुद्दों को सामने ला दिया है। एक ओर छात्रा की NSA हिरासत को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती है, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में मामले की सूचीबद्धता और सुनवाई की प्रक्रिया पर वकीलों के संगठन की आपत्ति सामने आई है।
फिलहाल उपलब्ध न्यायिक स्थिति के अनुसार छात्रा की हिरासत रद्द करने का हाई कोर्ट का फैसला प्रभावी है, जबकि मेधा रूपम के खिलाफ हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और ₹5 लाख की व्यक्तिगत वसूली से जुड़े निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई है। मामले की अंतिम स्थिति आगे होने वाली सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगी।