घाघरा बैराज में डॉल्फिन संरक्षण की मुहिम, मछुआरों की भागीदारी पर जोर
कमलेश कुमार
हिट एंड हॉट न्यूज़ संवाददाता बहराइच
बहराइच। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग की कतर्नियाघाट रेंज में घाघरा बैराज क्षेत्र को केंद्र में रखते हुए जलीय जैव विविधता और डॉल्फिन संरक्षण को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में नदी से जुड़े मछुआरा समुदाय को डॉल्फिन के महत्व, उसके प्राकृतिक आवास और संरक्षण की जरूरत के बारे में जानकारी दी गई। अधिकारियों और संरक्षण कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि नदी में रहने वाले जीवों की सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी से ही संरक्षण अभियान को प्रभावी बनाया जा सकता है।

कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य उन परिस्थितियों को लेकर मछुआरों को जागरूक करना रहा, जब मछली पकड़ने के दौरान डॉल्फिन अनजाने में जाल में फंस जाती है। ऐसी स्थिति में जल्दबाजी या लापरवाही के बजाय संबंधित विभाग को सूचना देने की अपील की गई। अधिकारियों ने बताया कि समय पर जानकारी मिलने से प्रशिक्षित बचाव दल मौके पर पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई कर सकता है और डॉल्फिन को सुरक्षित रूप से नदी में वापस छोड़ा जा सकता है।
नदी के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेत है डॉल्फिन
जागरूकता कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि नदी केवल पानी की धारा नहीं है। उसके भीतर और आसपास अनेक प्रकार के जीव-जंतु, वनस्पतियां और सूक्ष्मजीव एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। इस पूरे तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में प्रत्येक प्रजाति की अपनी भूमिका होती है। डॉल्फिन भी नदी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
घाघरा, गेरुआ और कौड़ियाला जैसी नदियों में डॉल्फिन की मौजूदगी क्षेत्र की जलीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए डॉल्फिन को बचाने का प्रयास केवल एक वन्यजीव प्रजाति के संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से नदी के पर्यावरण, जलीय आवास और उससे जुड़े अन्य जीवों की सुरक्षा का व्यापक उद्देश्य भी पूरा होता है।
कार्यक्रम में आशीष ने डॉल्फिन संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नदी में इस जीव की मौजूदगी पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उन्होंने मछुआरों से अपील की कि यदि मछली पकड़ने के दौरान कोई डॉल्फिन जाल में फंस जाए तो उसे नुकसान पहुंचाने के बजाय तत्काल वन विभाग या संबंधित अधिकारियों को सूचना दी जाए।
उन्होंने कहा कि नदी के किनारे और पानी के आसपास नियमित रूप से रहने वाले मछुआरे जलीय जीवों की गतिविधियों को सबसे करीब से देखते हैं। इसलिए उन्हें संरक्षण अभियान का सहभागी बनाना बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
मछुआरों को बताया गया बचाव में सहयोग का महत्व
कार्यक्रम में मछुआरों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि डॉल्फिन के जाल में फंसने की घटना को सामान्य दुर्घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी परिस्थिति में प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि विभाग को तत्काल सूचना मिलती है तो विशेषज्ञ और प्रशिक्षित कर्मचारी स्थिति के अनुसार बचाव की कार्रवाई कर सकते हैं।
मछुआरों को यह भी बताया गया कि यदि किसी जलीय जीव को जाल से निकालने के दौरान नुकसान पहुंचने की आशंका हो तो बिना उचित जानकारी के प्रयास करने से बचना चाहिए। प्रशिक्षित कर्मियों की सहायता से बचाव करना जीव और उसे बचाने वाले दोनों के लिए अधिक सुरक्षित हो सकता है।
वन विभाग की ओर से यह संदेश भी दिया गया कि नदी में काम करने वाले लोग यदि डॉल्फिन की मौजूदगी, असामान्य गतिविधि या किसी संकट की स्थिति के बारे में समय पर जानकारी साझा करें, तो संरक्षण व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
स्थानीय समुदाय बन सकता है संरक्षण का मजबूत आधार
कार्यक्रम में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी दबीर हसन ने भी मछुआरों से संवाद किया। उन्होंने डॉल्फिन के व्यवहार, उसके संरक्षण की आवश्यकता और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि किसी भी संरक्षण अभियान की सफलता के लिए स्थानीय लोगों का सहयोग जरूरी है। विभागीय स्तर पर निगरानी और कार्रवाई अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन नदी के किनारे रोजाना रहने वाले समुदाय की भागीदारी से संरक्षण कार्य अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
दबीर हसन के अनुसार, मछुआरों का नदी से लगातार संपर्क रहता है। वे जलस्तर, नदी की स्थिति और जलीय जीवों की गतिविधियों में होने वाले बदलावों को प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं। यदि उन्हें जरूरी जानकारी और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो वे संरक्षण एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं।
आजीविका और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी
घाघरा बैराज और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका किसी न किसी रूप में नदी से जुड़ी है। मछली पकड़ना स्थानीय समुदाय की रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा है। ऐसे में संरक्षण संबंधी प्रयासों को स्थानीय लोगों की आजीविका की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाना जरूरी है।
कार्यक्रम में इसी बात पर जोर दिया गया कि संरक्षण और आजीविका को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मछुआरे अपनी नियमित गतिविधियां जारी रखते हुए जलीय जीवों के प्रति सावधानी बरत सकते हैं। इसके लिए जागरूकता, संवाद और आवश्यक प्रशिक्षण की निरंतरता महत्वपूर्ण होगी।
मछुआरों से अपील की गई कि वे जाल डालते समय अतिरिक्त सतर्कता रखें और यदि डॉल्फिन अथवा कोई अन्य संरक्षित जलीय जीव संकट में दिखाई दे तो तत्काल संबंधित विभाग को जानकारी दें।
कई विभागों और संस्थाओं की भागीदारी
इस जागरूकता कार्यक्रम में वन विभाग के अलावा संरक्षण और अन्य संबंधित संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। नेचर एनवायरमेंट एंड वाइल्ड लाइफ सोसाइटी (NEWS) के प्रतिनिधि जैनुल आबदीन, डब्ल्यूटीआई के प्रतिनिधि संजय सिंह, सिंचाई विभाग की एसडीओ जूथिका नायक, वन दारोगा राधेश्याम और राजा हसन सहित संबंधित विभागों के कर्मचारी उपस्थित रहे।
विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी से यह संदेश सामने आया कि जलीय वन्यजीवों का संरक्षण बहुस्तरीय सहयोग की मांग करता है। वन विभाग, सिंचाई विभाग, संरक्षण संस्थाएं और स्थानीय समुदाय यदि समन्वय के साथ काम करें तो नदी से जुड़े संरक्षण प्रयासों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
डॉल्फिन संरक्षण से जुड़ेगा नदी का व्यापक संरक्षण
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि किसी नदी की जैव विविधता को समझने के लिए उसमें मौजूद विभिन्न जलीय जीवों की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। मछलियों, कछुओं, डॉल्फिन और अन्य जीवों का अस्तित्व नदी के पर्यावरण से जुड़ा हुआ है।
इसलिए डॉल्फिन की सुरक्षा को नदी के व्यापक संरक्षण अभियान के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। स्वच्छ और स्वस्थ नदी जलीय जीवों के लिए बेहतर आवास उपलब्ध कराती है, जबकि जलीय जीवों की विविधता नदी के पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती है।
निरंतर जागरूकता से मजबूत होगी मुहिम
कार्यक्रम के समापन पर संरक्षण कार्यकर्ताओं ने कहा कि एक दिन का जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं है। स्थानीय स्तर पर लगातार संवाद, प्रशिक्षण और जानकारी का आदान-प्रदान आवश्यक है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां लोगों की आजीविका सीधे नदी से जुड़ी है, वहां संरक्षण संबंधी संदेश नियमित रूप से पहुंचाना उपयोगी होगा।
घाघरा बैराज में आयोजित यह कार्यक्रम इसी दिशा में एक प्रयास रहा। मछुआरों को संरक्षण प्रक्रिया का भागीदार बनाकर डॉल्फिन समेत अन्य जलीय जीवों की सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है। यदि नदी से जुड़े लोग किसी संकट की स्थिति में तुरंत सूचना देने और आवश्यक सावधानी बरतने की आदत विकसित करें, तो कई जलीय जीवों को समय रहते बचाया जा सकता है।
डॉल्फिन संरक्षण की यह पहल इस बात को भी रेखांकित करती है कि नदियों की रक्षा केवल उनके जल को बचाने तक सीमित नहीं है। नदी से जुड़े पूरे जीवन-तंत्र को सुरक्षित रखना आवश्यक है। घाघरा बैराज क्षेत्र में स्थानीय समुदाय और संरक्षण एजेंसियों के बीच सहयोग जितना मजबूत होगा, उतनी ही बेहतर संभावना जलीय जैव विविधता के संरक्षण की बनेगी।