फ़रवरी 12, 2026

‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ: लोकतंत्र की रक्षा का आह्वान

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Anoop singh

नई दिल्ली, 25 जून 2025 — भारत ने आज 1975 में लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) की 50वीं वर्षगांठ को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया। इस दिन को याद करते हुए पूरे देश में लोकतंत्र की महत्ता और संविधान की रक्षा के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इस अवसर पर सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा करते हुए कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक “कष्टदायक अध्याय” था। उन्होंने कहा कि इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताएं छीनी गईं, संस्थानों को कमजोर किया गया और शासन से जवाबदेही लगभग गायब हो गई थी।

डॉ. जयशंकर ने लिखा, “आपातकाल हमें यह सिखाता है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग होता है और नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया जाता है, तब स्वतंत्रता कितनी नाजुक हो सकती है। यह दिन हमें सतर्क रहने और संविधान की रक्षा के लिए निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देता है।”

क्या था आपातकाल?

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा की गई थी, जो लगभग 21 महीनों तक चला। इस दौरान राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, प्रेस सेंसरशिप, न्यायपालिका पर दबाव और नागरिक अधिकारों के दमन जैसी घटनाएँ हुईं। यह समय भारत के लोकतंत्र के लिए एक काले अध्याय के रूप में देखा जाता है।

संविधान और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का संकल्प

सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस दिन संविधान के मूल तत्वों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—की रक्षा के लिए लोगों से जागरूक और सक्रिय रहने की अपील की। देशभर में संगोष्ठियों, जनसभाओं और ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित न रखें, बल्कि इसकी आत्मा को समझें और उसकी रक्षा करें।

लोकतंत्र की सीख

इस दिन की स्मृति में यह बात एक बार फिर दोहराई गई कि लोकतंत्र कोई स्थायी प्राप्ति नहीं है, बल्कि यह निरंतर सतर्कता और भागीदारी से ही जीवित रह सकता है। आपातकाल की भयावहता से सबक लेते हुए भारत ने बीते दशकों में अपने लोकतंत्र को मज़बूत किया है, लेकिन चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं।


निष्कर्ष:
‘संविधान हत्या दिवस’ केवल अतीत की त्रासदी को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह भविष्य की चेतावनी भी है। यह दिन हर भारतीय को याद दिलाता है कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझी जवाबदेही है।


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