दिल्ली हाईकोर्ट का संवेदनशील निर्णय: नवजात की देखभाल के लिए महिला कैदी को 90 दिन की अंतरिम जमानत

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सराहनीय और मानवीय निर्णय लेते हुए एक महिला कैदी को 90 दिनों की अंतरिम जमानत दी है, ताकि वह जेल में जन्मे अपने दो माह के शिशु की उचित देखभाल कर सके। यह फैसला न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने 25 जून 2025 को सुनाया, जो कानून के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के संतुलन का एक अनुकरणीय उदाहरण माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
महिला आरोपी 2019 के एक पॉक्सो (POCSO) मामले में आरोपी है और वर्तमान में तिहाड़ की केंद्रीय जेल नंबर 6 में बंद है। उसके साथ उसके दो अन्य नाबालिग बच्चे भी जेल में हैं। पहले उसे नियमित जमानत दी गई थी, लेकिन वह अदालत में पेश नहीं हुई, जिसके चलते उसके खिलाफ 24 सितंबर 2024 को गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। बाद में 12 दिसंबर 2024 को उसे पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और उसे घोषित अपराधी घोषित किया गया।
12 मई 2025 को महिला ने जेल में एक नवजात शिशु को जन्म दिया, जिसके बाद उसने अंतरिम जमानत की याचिका दायर की। अदालत ने इस याचिका पर विचार करते हुए बच्चे की देखभाल को सर्वोपरि माना।
अदालत की मानवीय दृष्टिकोण
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक नवजात शिशु के लिए उसकी मां की उपस्थिति और देखभाल अत्यंत आवश्यक होती है। जेल में बच्चे के पालन-पोषण की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि मां को अस्थायी रूप से रिहा किया जाए ताकि वह अपने शिशु की देखभाल घर के सुरक्षित वातावरण में कर सके।
इस अंतरिम जमानत के लिए अदालत ने ₹25,000 के निजी मुचलके और इतने ही राशि के एक जमानतदार की शर्त रखी। साथ ही, महिला को जमानत की अवधि समाप्त होते ही पुनः न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।
न्यायिक प्रणाली में मानवीयता की झलक
यह फैसला यह दर्शाता है कि भारतीय न्याय प्रणाली केवल कठोर कानूनी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक संवेदनाओं पर भी आधारित है। विशेष रूप से जब मुद्दा बच्चों और उनकी परवरिश से जुड़ा हो, तो अदालतें न्याय की व्यापक परिभाषा को अपनाते हुए, भावनात्मक पक्ष को भी महत्व देती हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय एक उदाहरण है कि कैसे न्यायपालिका न केवल कानून के पालन की दृष्टि से, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों — विशेषकर बच्चों और महिलाओं — के कल्याण की दिशा में भी जिम्मेदार भूमिका निभा रही है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम करेगा, जहाँ न्याय का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि करुणा और सहानुभूति भी है।
